आत्मरक्षा – Hindi Poem

आत्मरक्षा – Hindi Poem

 

अरमानों को काबू करो

महामारी का ये जो दोर हैं |

पैसे कमा लेना फुर्सत से

आज मोत चारों ओर हैं ||

क्यों दोष दें हम किसी ओर को

क्या पाई हमनें शिक्षा हैं ?

दूसरों की बातें छोड़ो

फ़कत जरूरी आत्मरक्षा हैं ||

जिम्मेदार नागरिक है हम भी

महामारी से हमें बचना हैं |

मास्क, दूरी दोनों ही जरूरी

क्योंकि हम भी किसी का सपना हैं ||

आत्मरक्षा की मुहिम से

यदि जिन्दगी कोई बच जाती हैं |

तो ये मुहिम हम छेड़ देंगे

यही सोच आत्मनिर्भर बनाती हैं ||

महामारी के प्रतिरोध में

 यह कलम उठा रहा हूँ |

वायरस को जो बढावा दें

उन दरिंदों को ललकार रहा हूँ ||

आत्मरक्षा न हो सके तो ठीक हैं

दूसरों की जिंदगी अमुल्य हैं बता रहा हूँ |

यह मुमकिन नहीं हर जरूरत पूरी होगी

शब्द कड़वे हैं किन्तु समझों दर्द जता रहा हूँ ||

 

संजय डारा बिश्नोई पता सांचौर जालोर राजस्थान

 

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