भगवान कैसे दिखते हैं | Cosmic Krishna According Bhagavad Geeta

भगवान कैसे दिखते हैं – श्री कृष्ण जिन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना गया, लेकिन बाद में उन्होंने अपना सत्य सबके सामने लाया। वो था श्री कृष्ण का विराट स्वरुप। उनकी कॉस्मिक फॉर्म जो पुरे संसार में विराजमान है।

दोस्तों मैं आपको श्री कृष्ण का वो विराट रूप तो नहीं दिखा सकता, लेकिन इसकी explain करके आपको कुछ परसेंट का आभास दे सकता हूँ।

इससे आप भी भगवान के निराकार स्वरुप को समझ सकेंगे और आप श्रीमद भागवद गीता की ओर बढ़कर अपना जीवन सफल कर पाएंगे।

 

भगवान कैसे दिखते हैं ?

 

महाभारत में जब अर्जुन ने श्री कृष्ण का अनंत स्वरुप देखना चाहा तब श्री कृष्ण ने कहा –

 

“न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा।

दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम।।”

– श्रीमद्भगवद गीता अध्याय 11

 

यानी हे अर्जुन ! तू मुझे अपने आँखों से अर्थात बौद्धिक दृष्टि द्वारा देखने में असमर्थ है, इसलिए मैं तुम्हें दिव्य अर्थात अलौकिक दृष्टि प्रदान करता हूँ। जिससे तुम मेरे प्रभाव और दिव्य योगशक्ति देख सकते हो।

 

इसके बाद श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपना विराट स्वरुप दिखाया, जिस कारण समय भी रुक गया यह पूरी सृष्टि का स्वरुप था जिसे अर्जुन ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा।

 

“अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्‌।।
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्‌।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्‌।।”

 

यानी अर्जुन ने देखा यहाँ पर अनेक मुख और अनेक ऑंखें थे, वहां अनेक अद्भुत दर्शनों वाले, अनेक दिव्य भूषणों से युक्त और अनेक दिव्य शस्त्रों को हाथों में उठाये हुए थे।

वहां पर दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किये हुए, दिव्य गंध, सब प्रकार आश्चर्यों से युक्त, सीमारहित विराट स्वरुप परमदेव को देखा। उनका चेहरा हर तरफ था।

 

 

“दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः।।”

 

अगर हज़ारों सूर्य भी एक साथ रौशनी कर दे तब भी इसका मुकाबला नहीं कर सकते। ये रूप इस तरह से प्रकाशवान है।

 

“तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा।।”

 

अर्जुन ने वहां पर पुरे ब्रह्माण्ड को एक ही जगह में समाये देखा, सारी सृष्टि एक ही रूप में समायी थी।

 

“ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत।।”

 

अर्जुन ने इस स्वरुप को देखा और अपने हाथ जोड़े और सर झुका लिया।

 

अर्जुन उवाच

 

“पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्‍घान्‌।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्‌।।”

 

तब अर्जुन ने वर्णन किया श्री कृष्ण मैंने आपके शरीर में सभी देव, भगवानों को एक साथ देखा। मैंने कमल में ब्रह्मा को देखा, मैंने शिव को देखा, सब ऋषियों देखा।

 

“अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रंपश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्‌।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिंपश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप।।”

 

मैंने अनेक हाथ, अनंत पेट, अनेक मुख और अनेकों ऑंखें देखि, वो हर दिशाओं ओर थी, जिसका कोई अंत नहीं था। ये खुद में ब्रह्माण्ड था, मैंने यहाँ कोई शुरुवात, कोई मध्य या अंत नहीं देखा।

 

“किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्‌।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्‌।।”

 

मैंने आपको पहचान लिया, आप ही अटल सत्य है। आप ही जीवन का कारक और रक्षक है। आप सनातन धर्म रक्षक और हमेशा रहने वाली परम सच्चाई है।

यह तो वो कुछ लोग हैं जो श्री कृष्ण की कॉस्मिक फॉर्म की जानकारी देती है। यही परमात्मा का रूप है, जिसका कोई एक नाम कोई एक रूप नहीं है।

आप खुद श्रीमद्भगवद गीता पढ़कर इससे भी कही ज्यादा श्लोकों से इसकी जानकारी खुद ले सकते हैं।

आप अपने जिंदगी में श्रीमद्भगवद गीता को एक बार जरूर पढ़ें। हमारा लक्ष है पूरी दुनिया के सभी लोगों को श्रीमद्भगवद गीता के बारे में जानकारी देना और उसको फ्री में देना।

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श्रीमद्भगवद गीता

 

 

 

 

Conclusion

 

दोस्तों आपको आज का यह spiritual नॉलेज कैसा लगा ?

अगर आपके मन में कुछ भी सवाल या सुझाव है तो मुझे नीचे कमेंट करके जरूर बताये।

मुझे उम्मीद है की आपको श्री कृष्ण की विराट स्वरुप को समझ में आ गया होगा।

आपका बहुमूल्य समय देने के लिए दिल से धन्यवाद,

Wish You All The Very Best.

 

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