स्वस्थ रहने के 63 नियम – Health Tips in Hindi

स्वस्थ रहने के नियम (Health Tips in Hindi) – Hello दोस्तों, कल मैंने इसका पहला पार्ट आपके साथ शेयर किया और आज ये दूसरा पार्ट है की कैसे हम कुछ नियमों को अपने डेली हैबिट में अपनाकर 100 साल तक स्वस्थ रह सकते है, इसके पहले पार्ट में मैंने 70 ऐसे नियमों के बारे में बताये हैं, और आज इस पोस्ट में 63 नियमों के बारे में बताया गया, अगर आप इन दोनों पार्ट को पढ़ कर अपने जिंदगी में सारे नियमों को उतारे तो आपको स्वस्थ होने से और 100 साल तक जीने से कोई रोक नहीं पायेगा।

उपरवाले भी कहेंगे की ये तो 100 साल जीने के सारे नियमों को पालन कर रहे हैं तो उनको 100 से पहले कोई बीमारी नहीं लगने देना और स्वस्थ रखना।

लेकिन हम है की ये पढ़ा और कुछ दिन नियमों का पालन किया और उसके बाद भूल गए। ऐसे में कैसे होगा ????

 

तो चलिए शुरू करते हैं –

 

स्वस्थ रहने के 63 नियम – Health Tips in Hindi

 

1. जब भी मिठाई खाए, कुल्ला अवश्य करें।

2. दोनों समय ब्रश न करें, एक समय अनामिका ऊॅंगली से सूखा-मंजन या नमक, सरसों का तेल मिला कर करें। इससे मसूड़ों की मालिश होती है।

3. प्रतिदिन मुह में पानी भरकर अथवा मुह फुलाकर जल से नेत्रों को धोएं।

4. मंजन के पश्चात् जिह्वा अवश्य साफ करें तथा हलक तक ऊॅंगली ले जाकर गन्दा पानी निकाल दें।

5. घर में तुलसी उगाकर रखें इससे सात्विक ऊर्जा में वृद्धि होती है तथा वास्तु दोष दूर होते हैं। समय-समय पर तुलसी का सेवन करते रहें।

6. भोजन के साथ पानी का प्रयोग कम करें। इससे पाचक अग्नि मन्द होने का भय रहता है।

7. भोजन सादा करो एवं उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करो, शांत, प्रसन्न और निश्चिन्तता पूर्वक करो और उसे अच्छी तरह चबाचबा कर खाओ। खाते समय न बात करो और न हंसो। एकाग्र चित्त होकर भोजन करना चाहिए।

8. आवले का उपयोग करें। यह बहुत ही उच्च कोटि का स्वास्थ्यवर्धक रसायन है।

9. जल पर्याप्त मात्रा में पिए।

10. भोजन करने के पश्चात् एक दम न सोए, न दिन में, न रात में।

11. भोजन के उपरान्त वज्रासन में बैठना बहुत लाभकारी होता है।

12. भोजन के पश्चात् दाई सास चलाना अच्छा होता है। इससे जठाराग्नि तीव्र होती है व पाचन में मदद मिलती है।

13. प्रातःकाल सूर्योदय के समय सभी देवता को प्रणाम कर उत्तम स्वास्थ्य की कामना करें व गायत्री मन्त्र पढ़ें। इससे सूर्य स्नान होता है। नस नाडि़यों के रोग जैसे सर्वाइकल आदि नहीं होते।

14. सूर्योदय के समय प्राणवायु सघन होती है। उस समय गहरी-गहरी श्वास लेते हुए टहलें अथवा प्राणायाम खुले में करें। इससे बल में वृद्धि होती है व प्रसन्नता बढ़ती है।

15. भोजन शान्त मन से चबा-चबा कर व स्वाद ले-लेकर करें। यदि भोजन में रस आए तो वह शरीर को लगता है अन्यथा खाया-पीया व बेकार निकल गया तथा पचने में मेहनत और खराब हो गई।

16. प्रातः टहलने के बाद भूख अच्छी लगती है। इस समय पौष्टिक पदार्थों का सेवन करें। अंकुरित अन्न, भीगी मूंगफली, आंवला या इससे बना कोई पदार्थ, संतरा या मौसम्मी का रस अच्छे नाश्ता का अंग होते हैं।

17. पानी सदा बैठकर धीरे-धीरे पिए, एकदम न गटकें।

18. आटा चोकर समेत खाओ, सम्भव हो तो हाथ का पिसा हुआ खाओ। जौ, गेहूं, चना, सोयाबीन का मिस्सी रोटी का आटा सुपाच्य एवं पौष्टिक होता है। पौष्टिकता की दृष्टि से रोटी में हरी सब्जी, पालक, मेथी, बथुआ आदि पत्तीदार सब्जी मिलाकर बनायें/खायें। दलिया/खिचड़ी में भी पत्तीदार एवं हरी सब्जियाँ मिलाकर पौष्टिकता बढ़ाई जा सकती है। सब्जियों के सूप का नित्य सेवन पौष्टिक एवं हलके भोजन का अच्छा अंग हो सकता है।

19. प्रकृति विरुद्ध, मौसम विरुद्ध और शरीर विरुद्ध भोजन से वचना चाहिए। भोजन ज्यादा गरम या ज्यादा ठंडा भी नही होना चाहिए। बसी भोजन से परहेज करना चाहिए।

20. सप्ताह में एक दिन उपवास भी आवश्यक है, उस दिन अन्न का सेवन न करें, कुछ फल के रस का ही सेवन करें। इससे हमारा स्वास्थ ठीक रहता है, पेट सबंधी बीमारियों से बचाव होता है।

21. भोजन के तुरंत बाद सोना कई बिमारियों को न्योता देना है।

22. रात्रि का भोजन सोने के तीन घंटे पहले करें। यदि रात्रि फल, दूध लेना है तो भोजन के एक घंटे बाद लें।

23. खाने के तुरंत बाद सहवास से बचना चाहिए। सहवास के तुरंत बाद शिशु को माँ का दूध वर्जित है।

24. सोने से पहले हाथ-पैर धोकर पोंछ ले, अपने इष्टदेव का स्मरण करते हुए सो जाएँ। सर्वप्रथम चित होकर दस सांसे ले, फिर दायें करवट छः गहरी सांसे लें, फिर बायीं करवट लेकर सो जाएँ।

25. सोने के समय मुहँ ढँक कर नही सोना चाहिए। सोने का कमरा भी हवादार हो तो बहुत ही अच्छा है।

26. सोने से पहले संगीत सुनना भी लाभप्रद है।

27. यदि स्वस्थ रहना है तो शराब,धूम्रपान और बुरे व्यसनों से दूर रहना चाहिए।

28. दिन में सोने से जठराग्नि मंद पड़ जाती है। जिससे शरीर में भारीपन, शरीर टूटना, जी मिचलाना, सिरदर्द, ह्रदय में भारीपन आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते है।

29. जो लोग शारीरिक श्रम से वंचित रहते हैं वो आसन, प्राणायाम एवं पैदल चलने का अभ्यास अवश्य करें। आरामपरक जीवन जीने से शरीर के महत्वपूर्ण अंग जैसे लीवर, यकृत, अग्नाश्य, एवं हृदय धीरे-धीरे करके कमजोर होते चले जाते हैं।

30. जो लोग शारीरिक श्रम कम करते हैं परन्तु मीठा खाने के शौकीन हैं उनको मधुमेह रोग होने का खतरा बना रहता है। अतः उतना ही खाया जाए जितना आवश्यक है।

31. गतिशीलता ही जीवन है और गतिहीनता ही मृत्यु। गतिशील जीवन ही भविष्य में पल्लवित और पुष्पित होता हुआ संसार को सौरभमय बना देता है। मन की प्रफुल्ता से हमारा स्वास्थ भी सुन्दर और निरोग रहता है। जीवन जीना और स्वस्थ रहना एक मानवीय आवश्यकता के साथ साथ एक कला भी है, यदि सही तरीके से कुछ नियमानुसार जिन्दगी को ढाल ले तो बहुत हद तक हम सुखी एंव निरोग रह सकते है। जैसे की कोई भी काम एक प्लान के अनुसार शुरू करते हैं उसी प्रकार हमारी दिनचर्या या जीवन शैली भी एक प्लान के अनुसार होनी चाहिए।

32. सूर्योदय से दो घंटे पहले हमे अवश्य जग जाना चाहिए। देर तक सोना स्वस्थ के लिए बहुत ही हानिकारक है। इस समय प्रकृति मुक्तहस्त से स्वास्थ्य, प्राणवायु, प्रसन्नता, मेघा, बुद्धि की वर्षा करती है।

33. सुबह उठ कर तांबे के लोटे में भरा पानी का सेवन करें जो रात्रि में ही रखा हो करना चाहिए, कम से कम दो ग्लास की मात्रा होनी चाहिए। बासी मुँह 2-3 गिलास शीतल जल के सेवन की आदत सिरदर्द, अम्लपित्त, कब्ज, मोटापा, रक्तचाप, नैत्र रोग, अपच सहित कई रोगों से हमारा बचाव करती है।

34. नित्य क्रिया के पश्चात सुबह में एक मील तक टहलने अवश्य ही जाये। उसके बाद प्राणायाम, आसन और व्यायाम 15 से 20 मिनट करना चाहिए।

35. प्रतिदिन हो सके तो गुनगुने पानी से रगड़ रगड़ स्नान करना सेहत के लिए बहुत ही लाभदायक है। स्नान के समय सर्वप्रथम जल सिर पर डालना चाहिए, ऐसा करने से मस्तिष्क की गर्मी पैरों से निकल जाती है।

36. सूर्य स्नान भी शरीर के लिए बहुत ही लाभप्रद है। इससे प्राकृतिक रूप से विटामिन \’डी\’ की प्राप्ति होती है। सुबह में आधे घंटे धुप में बैठे।

37. मौसम की ताजा हरी सब्जी और ताजे फल खूब खाओ। जितना हो सके कच्चे खाओ अन्यथा आधी उबली/उबली तथा कम मिर्च-मसाले, खटाई की सब्जियां खाओ। एक रोटी के साथ चार गुना सब्जी के अनुपात का प्रयास रखो।

38. हो सके तो प्रतिदिन नही तो सप्ताह में सरसों तेल या ओलिव आयल से शरीर की अच्छी तरह से मालिस करनी चाहिए।

39. मोबाईल पर लम्बी बातें न करें। यह दिमाग में टयूमर व अन्य व्याधियां उत्पन्न कर सकता है।

40. पैदल चले, साइकिल चलाने से जी न चुराएं। अपना काम स्वयं करने का अभ्यास करें।

41. देसी गाय के दूध घी का सेवन करें। देसी गौ का सान्निधय भी बहुत लाभप्रद रहता है।

42. दस-पन्द्रह दिन में एक बार घर में यज्ञ अवश्य करें। अथवा प्रतिदिन घी का दीपक जलाएं।

43. इन्द्रिय संयम विशेषकर ब्रह्मचर्य का उचित पालन करें। यह निरोग जीवन के लिए अनिवार्य है। अश्लील मनोरंजन के साधनों का प्रयोग न करें।

44. मच्छर से बचाव के लिए मच्छरदानी सर्वोतम है। दूसरे साधन लम्बे समय प्रयोग से कुछ न कुछ नुक्सान अवश्य करते हैं।

45. ध्यान रहे लम्बे समय तक वासना, ईष्र्या, द्वेष, घृणा, भय, क्रोध के विचार मन में न रहें अन्यथा ये आपका स्नायु तन्त्र विकृत कर सकते हैं। यह बड़ा ही दर्दनाक होता है न व्यक्ति जीने लायक होता है न मरने लायक।

46. धन ईमानदारी से कमाने का प्रयास करें। सदा सन्मार्ग पर चलने का अभ्यास करें। इससे आत्मबल बढ़ता है।

47. सदा सकारात्मक सोच रखे। यदि आपने किसी का बुरा नहीं सोचते तो आपके साथ बुरा कैसे हो सकता है। यदि आपसे गलतिया हुई हैं तो उनका प्रायश्चित करें। इससे उनका दण्ड बहुत कम हो जाता है। जैसे डाकू वाल्मिकी ने लोगों को लूटा तो सन्त हो जाने पर बेसहारों को सहारा देने वाला आश्रम बनाया।

48. दो ठोस आहारों के बीच 6 घण्टें का अन्तर रखें। 3 घण्टें से पहले ठोस आहार न लें। अन्यथा अपच होगा जैसे हाण्डी में यदि कोई दाल पकाने के लिए रखी जाए उसके थोड़ी देर बाद दूसरी दाल डाल दी जाए तो यह सब कच्चा पक्का हो जाएगा। बार-बार खाने से भी यह स्थिति उत्पन्न होती है। भोजन के पश्चात् 6 घण्टें से अधिक भूखे न रहें। इससे भी अम्लता इत्यादि बढ़ने का खतरा रहता है।

49. भूख से कम खाओ अथवा आधा पेट खाओ, चौथाई पानी के लिए एवं चौथाई पेट हवा के लिए खाली छोड़ो।

50. सामान्य परिस्थितियों में जल इतना पीए कि 24 घण्टें में 6 बार मूत्र त्याग हो जाए। मूत्र त्याग करते समय अपने दात बीच कर रखें।

51. दिन में भोजन के पश्चात् थोड़ी देर विश्राम व सायंकाल लगभग 100-200 कदम अवश्य चलें।

52. घर का निर्माण इस प्रकार करें कि सूर्य का प्रकाश पर्याप्त रहे। अन्धेरे वाले घर में जीवनी शक्ति का क्षय अधिक होता है।

53. दीर्घ आयु के लिए भोजन का क्षारीय होना आवश्यक है। क्षार व अम्ल का अनुपात 3ः1 होनी चाहिए। जो लोग अम्लीय भोजन करते हैं उसमें उनको रक्त-विकार अधिक तंग करते हैं। कुछ शोधों के निष्कर्ष यह भी बताते हैं कि भोजन में क्षार तत्व बढ़ाकर हृदय की धमनियों के ब्लॉकेज भी खोलें जा सकते हैं।

54. यदि व्यक्ति को जुकाम रहता है तो रात्रि में नाक में कड़वे तेल की अथवा गाय के घी की दो बूंदे सोने से पूर्व डालें। इससे जुकाम दूर होता है व नेत्र व मस्तिष्क मजबूत बनते हैं। जिनको जुकाम न हो उनके लिए भी यह प्रयोग उत्तम है।

55. रात्रि में सोने से पूर्व पैर के तलवों पर तेल मलना लाभप्रद रहता है इससे शरीर की नस नाडि़या मजबूत होती हैं।

56. सोने से पूर्व यदि पैरों को ताजे पानी से धो लिया जाए तो नींद बहुत अच्छी आती है।

57. जो लोग पेट से सांस लेते हैं वो शान्त प्रकृति के होते हैं व दीर्ध आयु होते हैं। सांस सदा गहरी लेनी चाहिए। गहरी सांस का अर्थ है कि सांस को नाभि तक लेने का प्रयास करें। इससे नाभि चक्र सक्रिय रहता है। नाभि चक्र की सक्रियता पर ही हमारा पाचन तन्त्र निर्भर है।

58. जिन लोगों को उच्च रक्त चाप की समस्या है यह छोटा से प्रयोग करके देखें। रक्तचाप मापें व नोट करें। फिर श्वास को 2-4 बार नीचे नाभि की तरफ धकेंले। फिर रक्तचाप नापें। रक्तचाप में कुछ न कुछ कमी अवश्य प्रतीत होगी।

59. आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य की प्रकृति तीन प्रकार की होती है। वात, पित, कफ। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी प्रकृति को पहचानने का प्रयास अवश्य करना चाहिए। अपनी प्रकृति पहचानने के उपरान्त उसी अनुसार खान-पान, रहन-सहन व दवाओं का उपयोग करना चाहिए। उदाहरण के लिए पित्त प्रकृति का व्यक्ति गरम चीजों जैसे लहसुन आदि का प्रयोग बिल्कुल न करे। अधिक जानकारी के लिए स्वस्थ भारत नामक पुस्तक पढ़ें।

60. भोजन में रोज अंकुरित अन्न अवश्य शामिल करें। अंकुरित अन्न में पौष्टिकता एवं खनिज लवण गुणात्मक मात्रा में बढ़ जाते हैं। इनमें मूंग सर्वोत्तम है। चना, अंकुरित या भीगी मूंगफली इसमें थोड़ी मेथी दाना एवं चुटकी भर – अजवायन मिला लें तो यह कई रोगों का प्रतिरोधक एवं प्रभावी ईलाज है।

61. जब भी व्यक्ति को कोई रोग हो तो उसको हल्के उपवास व वैकल्पिक चिकित्सा का सहारा लेकर दूर करने का प्रयास करें। आज समाज में एक गलत परम्परा बन गई है जैसे ही व्यक्ति को छोटी-मोटी कोई बीमारी होती है अतः इनका उपयोग विवश्ता में करना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि व्यक्ति का रक्तचाप बढ़ा हुआ है तो नमक कम करें। आवलाँ, ब्राह्मी अथवा सर्पगन्धा का प्रयोग करके उसको नियन्त्रित करे। तुरन्त अंग्रेजी दवाईयों की ओर न दौड़ें।

62. वर्ष की आयु के उपरान्त प्रोटीन का उपयोग सीमित रखें। नमक व चीनी भी कम लें। मीठे की पूर्ति के लिए फलों का उपयोग करें।

63. व्यायाम के समय बातचीत न करें, व्यायाम के समय चुप रहने से फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है।

 

 

Conclusion

 

तो दोस्तों अगर आप इन सारे 63 नियमों को अपने डेली हैबिट में अपनाते हैं तो आपको स्वस्थ रहने से कोई रोक नहीं सकता।

 

इनके आलावा भी अगर आपने इसके पार्ट – 1 नहीं पढ़ा है तो जरूर पढ़े उसमें मैंने और भी 70 पॉइंट्स बताये हुए हैं। और ये लास्ट पार्ट है।

 

तो आपको आज का यह पोस्ट “स्वस्थ रहने के नियम – Health Tips in Hindi” कैसा लगा ?

 

क्या आप ऐसे नियम पहले से अपने हैबिट में डाल दिए हैं या नहीं ?

 

क्या आप इस प्रकार के नियम अपने डेली हैबिट में अपनाना चाहेंगे ?

 

आपका कोई भी सवाल या सुझाव है तो मुझे नीचे कमेंट करके जरूर बताये।

 

इस पोस्ट “स्वस्थ रहने के नियम – Health Tips in Hindi” को अपने दोस्तों के साथ साझा करना ना भूलना दोस्तों।

 

आपका बहुमूल्य समय देने के लिए दिल से धन्यवाद,

Wish You All The Very Best.

 

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