Book Review in Hindi - Bouncing Back (Complete) | Thoughtinhindi.com

Hello दोस्तों, ये है Linda Graham की किताब “Bouncing Back - Rewiring Your Brain For Maximum Resilience and Well-Being” की Review. ये बहुत ही interesting बुक Review है अगर आपके पास कुछ time है तो ये पूरा Review पढ़े।

Bouncing Back Book Review in Hindi (Complete)

हम इस book Review से क्या सीखेंगे -

1. क्या आप कभी चेंज से घबराए है ? ज़वाब देने की ज़रुरत नहीं क्योंकि आप ही नहीं ऐसे बहुत से लोग है जो चेंज से डरते है, और इसकी सबसे बड़ी प्रॉब्लम ये है कि जाने- अनजाने हम सब कहीं ना कहीं लाइफ में आने वाले चेंजेस को अवॉयड करना चाहते है। तो क्या आप जानना चाहेंगे ऐसा क्यों होता है ? अगर आपको इस टॉपिक पर और ज्यादा जानकारी चाहिए तो हमारे साथ रहिये।

 यहाँ हम आपको बताएँगे कि चेंज को रोकने के लिए कौन-कौन से डिफरेंट टाइप की रुकवाते है और ऐसी सिचुयेश्न्स कौन सी है जब आप एक्टिवली इन चेंजेस को होने से रोकन चाहते है। इसके अलावा हम आपको एंगर प्रॉब्लम यानि गुस्से पर कुछ बढ़िया एडवाइस भी देंगे और साथ ही बताएँगे कि कैसे इस पर कंट्रोल किया जाये।


2. क्या आपने कभी अपनी अनस्टेबल इमोशनल लाइफ के बारे में सोचा है? क्या आपको कभी ऐसा महसूस हुआ कि ओवररिएक्शन से बचना बहुत मुश्किल काम है ? या फिर क्या आपने कभी गौर किया है कि कुछ सिचुएशन में चीज़े बैटर हो सकती थी अगर आप ज्यादा ओवररिएक्ट ना करते ?


 इस Review में हम आपको मूड को regulate करने के लिए कुछ बेस्ट टेक्नीक्स बताने वाले है। हम ये भी discuss करेंगे की स्ट्रेस, एन्जाईटी, और डर जैसे इमोशंस को कैसे handle करे और ऐसे लोगो का रियल लाइफ एक्जाम्पल भी देंगे जो इन इमोशंस पर कंट्रोल कर पाए और इनके मास्टर बन गए। मगर अच्छी चीज़े बस यही खत्म नहीं होती।


 जब आपकी लाइफ में बुरी चीज़े होती है तो सब कुछ बदल जाता है। जैसे कि लाइफ में आने वाले उतार-चढावो का आपके स्लीपिंग पैटर्न पर भी गहरा असर पड़ता है, और अगर आप ढंग से सोयेंगे नहीं तो चीज़े और बुरी होती चली जाती है।


 इसलिए हम आपको यहाँ कुछ प्रेक्टिकल एडवाइस देंगे जिससे आप बैटर और बढ़िया क्वालिटी की नींद ले पाए। फिर आप पूरे दिन ना सिर्फ कम थकान महसूस करेंगे बल्कि पहले से ज्यादा एफिशिएंट और बैटर तरीके से अपना दिन गुज़ार पायेंगे।


तो चलिए, शुरू करते है !



Bouncing Back Book Review in Hindi



चेंज का प्रोसेस -

 जैसा कि हमने पहले कहा अपनी लाइफ में किसी भी तरह का चेंज लाने से पहले हमें ये पता होना चाहिए कि चेंज क्यों ज़रूरी है। जब कोई इंसान इस बात को समझेगा उसके बाद ही जाकर इस चेंज के लिए तैयार होगा।

 अब जैसे कि बहुत से लोग स्ट्रेस में आकर या इमोशनल होकर ड्रिक लेना शुरू कर देते है। उनको लगता है कि ड्रिंक लेने से उन्हें रीलेक्स फील होगा और उनकी लाइफ में जो भी प्रॉब्लम चल रही है वो दूर हो जायेगी।


 हालांकि वे इस बात से इंकार कर देते है कि प्रॉब्लम सोल्व करने के चक्कर में वे एक और प्रॉब्लम में फंस रहे है। ये प्रोब्लम है ड्रिंकिंग की बाद में धीरे-धीरे उनकी एक बुरी आदत बन जायेगी।


 अब होता ये है कि वे अपनी ओन्गोइन्ग परेशानियों का इलाज़ एक और बुरी आदत (ड्रिंकिंग) में ढूंढ रहे है। ऐसा करने से उनकी पुरानी प्रोब्लम्स तो सोल्व होती नहीं बल्कि एक और बुरी आदत उनके गले पड़ जाती है। तो आप देख सकते है कि इस तरह प्रॉब्लम जहाँ की तहां रहती है और कोई सोल्यूशन भी नहीं निकलता है।


 लाइफ में चेंज लाना या खुद को चेंज करना इतना भी आसान नहीं होता। चेंज जितना बड़ा होगा साइकोलोजिकल रेजिस्टेंस भी उतना ही ज्यादा होगा। मगर फिर भी इसका एक सोल्यूशन निकल सकता है।


 अपनी डिफिक़ल्टीज़ को रीज़ोल्व करने के बजाये आप अपनी सारी प्रोबल्म्स को कुछ डिफरेंट तरीके से समझने की कोशिश करे। सबसे पहले उन सबकी एक लिस्ट बनाकर लिख ले, हो सकता है आपकी लिस्ट कुछ इस तरह दिखे:



1. कम नींद
2. लोगो के साथ कम्युनिकेशन करते वक्त घबराना
3. काम में मन ना लगना
4. प्रोमोशन ना मिलना
5. जितनी होनी चाहिए उतनी एक्सरसाइज़ ना हो पाना


 अब इन सबको एक साथ take all करने के बजाये सबसे पहले अर्जेंट प्रोब्लम्स को छांट ले। अगर आपको ढंग से नींद नहीं आती तो ये आपकी सबसे अर्जेंट प्रॉब्लम है।

 इसके लिए एक टेक्नीक जिसे हम बाद में समझायेंगे, उसका इस्तेमाल करे। सोने से दो घंटे पहले सारे डीवाइसेस जैसे फोन, कम्प्यूटर्स, टीवी वगैरह बंद कर दे। कुछ दिनों तक ये तरीका आजमाए फिर आप देखेंगे कि कैसे आपको बढ़िया नींद आने लगेगी।

 तो अब जब आपको नींद अच्छी आ रही है तो बाकी प्रोब्लम्स पर ध्यान दे सकते है। अगली प्रोब्लम है वर्क एफिशियेंशी यानी दिल लगाकर बढ़िया काम करना।

 अब ये एक मानी हुई बात है कि जो रातो को चैन से सोता है वही सुबह उठकर पूरी एनर्जी के साथ काम कर सकता है, और जब आपका काम बढ़िया होगा तो प्रोमोशन तो मिलेगा ही मिलेगा और promotion आपकी चौथी problem थी।



स्ट्रेस और एन्जाईटी

 हम आपको इन इमोशन पर वही घिसे पिटे लेक्चर नहीं देंगे जो बहुत बोरिंग होते है, और बाद में जब आप इन इमोशंस से गुज़र रहे होंगे, खासकर जब ये काफी इंटेंश हो तो उस टाइम आप कुछ भी क्लीयरली नहीं सोच पायेगे।

 इसलिए हम आपको ऐसी सिचुएशन की लिस्ट बता रहे है जिसमे स्ट्रेस और एन्जाईटी होना कॉमन बात है। इन सिचुएशन को माइंड में रखकर हो सकता है कि आप फ्यूचर में आने वाली कुछ इसी तरह की सिचुएशन को भांप ले और उसी हिसाब से खुद को तैयार कर ले।



1. पेन

2. फिजिकल इन्जरीज़

3. बीमारी

4. रीलेशनशिप र्पोब्लम्स

5. अपने किसी बेहद करीबी की मौत या फिर आपके काम में आने वाले कुछ अनवांटेड चेंजेस जैसे जॉब छूट जाना या फिर जॉब में आपकी पोजीशन छिन जाना


 चलो देखते है कुछ ऐसी ही रियल लाइफ सिचुएशंस। स्कीइंग करते हुए एनी की टांग टूट गयी। बेशक उसको काफी दर्द हुआ लेकिन कुछ दिन हॉस्पिटल में रहकर जब वो लौटी तो सब पहले जैसा ही नार्मल हो गया।

 उसकी जॉब कुछ ऐसी थी कि टांग टूटने से उसे कोई खास फर्क नहीं पड़ा। कम से कम उसे तो यही लगता था। मगर जल्द ही एनी को पता लग गया कि सब कुछ पहले जैसा नहीं रहा।

 दिन गुज़रते गए और हालात बद से बदतर होते चले गए। अब छोटी-छोटी बातो पर भी वो अपने कलीग्स से लड़ पड़ती थी और घर आकर इस बारे में सोचती रहती थी।

 वो ये नहीं समझ पा रही थी कि पहले वो काफी चुस्त थी इसलिए हमेशा इधर से उधर भागती रहती थी मगर टूटी टांग की वजह से अब वो पहले जैसी नहीं रही और इसीलिए उसे बाकी लोगो से जलन हो रही थी। यहाँ तक कि अपने कोवर्कर्स से भी।

 साथ ही इस हालत में उससे ठीक से सोया नहीं जा रहा था और ऊपर से टांग की लगातार खुजली ने उसे तंग कर दिया था। इन सब चीजों की वजह से एनी का स्ट्रेस लेवल इतना बड गया था कि वो हमेशा टेंशन में रहती थी और लड़ने का बहाना ढूंढती थी।

 किस्मत से एक ऐसी ही स्लीपलेस नाईट के बाद उसे अपनी सारी प्रोब्लम्स की वजह पता चल गयी और उसने कसम खाई कि जो उसने पिछले कुछ दिनों में किया वैसा अब वो बिलकुल नहीं करेगी।

 इस तरह एनी ने इनडायरेक्ट तरीके से अपनी प्रोब्लम सोल्व की। वही दूसरी तरफ आप इस लिस्ट में से कुछ टेक्निक्स यूज़ करके अपने स्ट्रेस और एन्जाईटी से डायरेक्ट छुटकारा पा सकते है,




1.    अपने मसल्स रीलेक्स करके

2.    ब्रीदिंग एक्सरसाइज़ से

3.    फिजिकल एक्सरसाइज़ से

4.    अपने इमेजिनेशन में अच्छी बाते सोचकर 

5.    मेडिटेशन करके


 ऑफकोर्स हम आपको ये नहीं कहेंगे कि आप इनमे से हर एक टेक्नीक यूज़ करे या फिर सब एक साथ ट्राई करे। मगर हां, स्ट्रेसफुल टाइम में इनमे से एक भी करेंगे तो आपको पक्का हेल्प मिलेगी।

 यही एनी ने भी किया जब वो अपने जॉब में काफी स्ट्रेस हो गयी थी..ऐसी सिचुएशंस में उसे सबसे पहले अपनी मसल्स खिंची-खिची लगती थी तो उसने पहले अपनी कम्प्लीट बॉडी रीलेक्सिंग पर फोकस किया।

 वो चुपचाप एक जगह पे बैठ गयी और अपनी पूरी बॉडी को रीलेक्स छोड़ देती। वो धीरे-धीरे और गहरी सांस ले रही थी। उसे महसूस हुआ कि उसकी हर साँस के साथ बॉडी का टेंशन दूर हो रहा है और मसल्स भी रीलेक्स होते जा रहे थे।

 कुछ मिनट बाद ही वो फिर से रीफ्रेशड और काम डाउन हो गयी थी और काम के किसी भी प्रेशर को झेल सकती थी। दुसरो वर्ड्स में कहे तो उसने मसल्स रीलेक्सेसन और ब्रीथिंग एक्सरसाइज़ का बहुत बढ़िया यूज़ किया था। ये एक्सरसाइज़ेस एक तरह से एनशियेंट मेडिटेशन प्रेक्टिस की तरह होती है।

 मगर कामनेस और पीस पाने के और भी कई तरीके है। ये आपको थोडा पैराडोक्सिक्ल लग सकता है लेकिन साथ में कुछ फिज़िकल एक्सरसाइजेस करने से शायद कुछ काम बने।


 ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब हम कोई ट्रेनिंग फिनिश करते है तो हमारा दिमाग एक सब्सटेंस रिलीज करता है जिसे एन्डरोफिन्स कहते है जो कि एक तरह का ट्राक्विंलाइजर है।


 अब आपको एक एक्जाम्पल देते है, हालांकि एनी काम से थकी हारी घर लौटी थी फिर भी वो थोड़ी देर घर के बाहर वाक् करती रही। उसे अच्छा फील हुआ क्योंकि अपने काम के दौरान वो ज़्यादातर बैठी रहती है और जब से उसकी टांग टूटी थी उसका चलना फिरना तो जैसे बंद ही हो गया था,


 और जब वो वाक् करके आई तो उसकी वजह से उसके दिमाग में जो एन्डरोफिन्स रिलीज़ हुए उससे उसका सारा स्ट्रेस और टेंशन चला गया। तो हम देख सकते है कि एक छोटी सी वाक्भी कितनी हेल्दी हो सकती है, आपको अपने एन्डरोफिन्स रिस्पोंस के लिए किसी एथलीट की तरह हार्ड प्रेक्टिस की ज़रुरत नहीं है, बस एक वाक् ही काफी है।


 अब लास्ट बट नोट लिस्ट वाली बात, जब भी आपको लगे कि आप इतने आंकशियस है कि एक वर्ड भी नहीं बोल पा रहे तो आप ये सिम्पल सी इमेजिनेटिव एक्सरसाइज़ ट्राई कर सकते है - अपने सेफ स्पेस में जाने की।


 ये कोई जोक नहीं है, पहले बताई गयी टेक्नीक्स की तरह ही ये भी न्यूरोलोजी और कोगनिटिव साइंस पर बेस्ड है। ऐसा देखा गया है कि कोई पार्टिक्यूलर चीज़ देखने पर आपका दिमाग जो रिस्पोंस देता है वही उसे इमेजिन करने पर भी देता है।


 तो जब आप आंकशियस होने लगते है तो खुद को अपने सेफ स्पेस में इमेजिन करने से आप सच में खुद को उस सेफ स्पेस में ले जाते है। एनी को केलिफोर्निया के बड़े-बड़े बीचेस बहुत पसंद थे।


 एक दिन उसका एक को-वर्कर उसके पास आकर किसी काम के लिए एनी को खामखा क्रिटिसाइज़ करने लगा जिसमे एनी की कोई गलती थी ही नहीं। उस कलीग के साथ उलझकर बेकार की बहस करने के बजाये एनी ने अपनी आँखे धीरे से बंद कर ली और अपने माइंड में केलिफोर्निया के वही शानदार बीचेस इमेजिन करने लगी जहाँ उसे बचपन में खेलना अच्छा लगता था।


 कहने की ज़रुरत नहीं कि जब उसने आँखे खोली तो वो बिलकुल वैसा ही महसूस कर रही थी जब वो बीस साल पहले रेत में खेलती एक छोटी सी लड़की हुआ करती थी।


 एंगर कंट्रोल–गुस्सा सबसे ज्यादा डिसट्रकटिव ह्युमन इमोशन है। गुस्सा आपके रीलेशनशिप्स बर्बाद कर सकता है, किसी की जान को सीरियसली खतरे में डाल सकता है, और इसका नतीजा कभी-कभी बेहद शर्मनाक, दुखद और पछतावे से भरा हो सकता है।


 लेकिन कुछ तरीके है जिनसे आप इन तरह के रीयेक्शन को रोक सकते है.. इससे पहले कि हम यहाँ कुछ रियल लाइफ एक्जाम्पल दे, आपको ये बात जाननी होगी कि किसी भी दुसरे इमोशन की तरह गुस्से का भी कोई कम्प्लीट इलाज़ नहीं है। इसे पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता।


 आखिरकार कई बार कुछ फ्रस्ट्रेटिंग बातो में इंसान को गुस्सा आ ही जाता है। मगर इम्पल्स में आकर कुछ भी करने और सोच समझने के बाद एक्शन लेने के बीच बहुत फर्क होता है। यहाँ कुछ ऐसी टेक्नीक्स है जो एंगर कंट्रोल करने में यूज़ की जाती है।



1. टाइम आउट -


 ये वाला तरीका सबसे ज्यादा पॉपुलर है और शायद सबसे आसन भी। यहाँ ये जानना बहुत ज़रूरी है कि आपको कब सबसे ज्यादा गुस्सा आता है और जब ऐसा होता है तो स्लोली 10 तक काउंट करे। इस तरह आप इम्पल्स में आकर एक्शन लेने से बच जायेगे और आपको सोचने का थोडा टाइम भी मिल जाएगा कि आपको क्या करना चाहिए।




2. लोगो से कम expectations रखे:-


 हम में से ज्यादा तर लोगो को गुस्सा इसलिए आता है क्यूंकि हम लोगो से ज्यादा expect करते है, की वो disciplined हो, सही actions ले। लेकिन अगर हम ये मान के ही चलेंगे की लोग ऐसा कुछ नहीं करने वाले, तो हमारी उनसे expectation कम हो होगी और इसलिए हमारे पास गुस्सा करने की बहुत कम वजह रह जाएगी।




3. assertive (असेर्टिव) कम्यूनिकेशन -


 इसका मतलब है बिना कोई एग्रेसन दिखाए अपने और दुसरो के राइट्स के लिए काम और पोजिटिव तरीके से खड़े होने के काबिल बनना। इस तरह आप अपने एग्रेसन पर काबू पा सकते है और इसे किसी कंस्ट्रक्टीव पर्पज में यूज़ कर सकते है।


 असेर्टिव कम्यूनिकेशन बहुत इम्पोर्टेंट है क्योंकि इसमें आपकी सारी एनर्जी का सही इस्तेमाल होता है जो वर्ना यूँ ही बेकार चली जाती।


 अब इन तीनों principles का example ले लेते है जिससे हम इन्हे life में use कर सकते है।


 एलेक्स को अपने गुस्से की आदत के चलते बहुत सी प्रोब्लम्स थी। वैसे वो अक्सर शांत और अच्छा रहता था मगर अपने काम को लेकर वो कुछ ज्यादा ही डिफेंसिव हो जाता था।


 उसे इतना भी नहीं पता था कि खुले आम किसी की इन्सल्ट करने और कंस्ट्रक्टिव क्रिटिसाइज में बहुत फर्क होता है, और ऐसे ही कुछ उलटे सीधे सिचुएशन से गुजरने के बाद उसे फील हुआ कि कुछ तो चेंज करना पड़ेगा,


 और अब जब भी उसे लगता है कि कोई उसे फ़ालतू का लेक्चर देने वाला है तो बजाये गुस्सा करने के वो अपने माइंड में धीरे-धीरे 10 तक काउंट करता है। वो हर वर्ड पर जोर देता है बहुत स्लोली और कुछ और नहीं सोचता। 10 या उससे ज्यादा सेकंड बाद वो फिर से उस सिचुएशन को अप्रोच करता है मगर एक डिफरेंट एंगल के साथ।


 अगली बार एलेक्स जब पार्किंग में गाड़ी लगाने जा रहा था कि तभी एक आदमी ने आकर उससे पहली अपनी गाडी लगा दी। ऐसा नहीं था कि उस आदमी ने एलेक्स को देखा ना हो पर उसने उसे कोई भाव नहीं दिया।


 अगर कोई दूसरा मौका होता तो एलेक्स को गुस्सा आ जाता वो शायद कुछ ऐसे सोचता - उसका क्या हक बनता है कि वो मेरे साथ ऐसा करे ? ये कोई तरीका नहीं है!


 मगर यहाँ कुछ अलग था, उसे पता था कि लोगो को सही बनने के लिए या सही करने के लिए फ़ोर्स नहीं किया जा सकता, और अगर उसकी एक्सपेक्टेशन कम होंगी तो ऐसी छोटी मोटी बातो पर उसे गुस्सा नहीं आएगा।


 फाइनली असेर्टिव कम्यूनिकेशन एक ऐसी चीज़ है जो एलेक्स को बड़े काम की लगती है। अंदर ही अंदर अपने गुस्से को पीते रहना काफी डेंजरस होता है। इससे कई सारी प्रोब्लम्स आ सकती है जैसे अचानक से गुस्से का पहाड़ टूट पड़ना, स्ट्रेस की वजह से बीमार पड़ जाना वगैरह इसलिए अपनी बॉडी से गुस्सा बाहर निकलना बेहद ज़रूरी है मगर एक कंट्रोल्ड और सबटल तरीके से।


 जैसा हमने बताया कि एलेक्स ने इम्पल्स में आकर एक्ट करने के बजाये एक टाइम आउट लेना चूज़ किया जिससे वो 10 तक काउंट कर सके और जिस पर उसे गुस्सा आ रहा है उसे कुछ भी कहने से पहले उसे थोडा सोचने का टाइम मिल सके।


 मगर कई बार ऐसी भी सिचुएशन आती है जहाँ लोगो की गलत हरकतों पर सच में गुस्सा आता है। हालांकि बुरा बिहेवियर भी बहुत बार अनकांशस होता है।


 लेकिन इन सिचुएशन में भी जहाँ सामने वाला बेशक अन्प्लीजेंट है, आपका इम्पल्स में आकर एक्ट करना गलत होगा। बजाये इसके एलेक्स शांती से इंतज़ार करता है कि उसकी भी बारी आएगी अपनी बात कहने के लिए और तब वो अपना बहुत ही अच्छे तरीके से दूसरे इंसान को उसकी गलतिया बताता और उन गलतियों को improve करने का method भी यानी असेरटिव कम्यूनिकेशन, और इस तरह वो अपनी  बेड एनर्जी को कंस्ट्रकटिव पर्पज के लिए यूज़ करता है।



मेमोरी एन्हांसमेंट जितने भी इम्प्रूव्मेंट्स हमने अब तक बताये है लगभग सारे किसी इमोशनल प्रोब्लम और चेंजेस के इर्द गिर्द घुमते है। ये कोगनिटिव इंटरवेंशन का एक एक्जाम्पल है जो सच में काम आता है और जिसे आप अपनी डेली लाइफ में प्रेक्टिस भी कर सकते है।


 याद कीजिये जब आप कुछ पढना चाहते है मगर किताब हाथ में लेते ही आपके दिमाग में कितने ही ख्याल आने लगते है और आप इक पेज भी पूरा नहीं पढ़ पाते। ये अगली टेक्नीक ऐसी ही सिचुएशन में काम आएगी। और साथ ही आपकी मेमोरी भी इम्प्रूव करेगी।


इसमें 5 स्टेप्स है :



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1. फर्स्ट रीडिंग -


 जब आप कोई किताब पहली बार पढ़ते है तो ये बहुत फोकस्ड या अटेंटिव नहीं होनी चाहिए। बस हेडिंग्स पर थोडा ध्यान दे, सब हेडिंग्स पढ़े और खास-खास आडिया पढ़े।



2. क्वेश्चंस -


 text को पूरा पढने के बाद जो क्वेश्चन पढ़ते वक्त आपके दिमाग में आये उन्हें नोट करना ना भूले।



3. सेकेण्ड रीडिंग -


 ये स्टेप बहुत फोकस्ड होना चाहिए और सबसे लंबा भी। अगर एक ही पैसेज को कई बार पढना पड़े तो हेजिटेट ना करे। क्योंकि पॉइंट ये है कि आप चीजों को अच्छे से समझ सके।



4. रीप्रोडक्शन -


 जब आप सेकंड रीडिंग फिनिश करे तो ट्राई करे कि जितना पोसिबल हो बुक को उतना डीटेल में रीप्रोड्यूस कर सके। ये कई मीडियम से आप कर सकते है। आप चाहे तो समरी लिख सकते है या अपने दोस्तों से इस बारे में डिस्कस कर सकते है, मतलब इसका हर तरीका काम आ सकता है।



5. कीपिंग द नोट्स -


 इतना श्योर रहे कि आप नोट्स बनाये और बीच-बीच में उन्हें चेक करते रहे, और थोड़े लंबे टाइम बाद आप जितना हो सके उतना रीप्रोड्यूस करने के लिए ट्राई करे और देखे आपको कितना समझ आया।



 एंड्रील को ये सिस्टम बड़े काम का लगा। वो अपना रीडिंग टाइम का पूरा यूज़ करना चाहता था क्योंकि उसे जोर्डन पीटरसन की बुक  “12 Rules for Life: an Antidote to Chaos” का ज़्यादातर हिस्सा याद करना था।


 बजाये इसके कि वो बुक में पूरी तरह डूब जाये उसने डीसाइड किया कि वो पहले ये बुक सुपरफिशियेली यानी सिर्फ headlines वगैरह पढ़ेगा। मगर उसने बुक के मोस्ट इम्पोर्टेंट आईडियाज़ पर भी ध्यान दिया।


 उसने काम के सारे क्वेश्चन लिख लिए ताकि सब्सीक्वेंट रीडिंग में उसे उनका ज़वाब लिख सके। फिर उसने एक डेप्थ रीडिंग की जिसमे कई बार पूरा महीना लग जाता है। खासकर ऐसी बड़ी किताब में।


 पढ़ते टाइम वो लगातार बुक में से इंट्रेस्टिंग नोट्स और फेक्ट्स लिखता गया। लास्ट में जब वो पूरी किताब पढ़ चूका तो उसका काम अभी खत्म नहीं हुआ था।


 उसने उस बुक के बारे में जो कुछ पढ़ा सीखा था वो अपने कलीग्स को बताया और शायद उन सबको इसे पढने के लिए क्यूरियस कर दिया। इस तरह ना सिर्फ उसने अपनी नॉलेज दुसरो से शेयर की बल्कि अपनी इस नॉलेज से उसका कांफिडेंस भी बड गया था।


 उसने वो नोट्स ऐसी जगह रखे जहाँ वो उन्हें रोज़ देख सके, और जब चाहे तब वो उठाकर उन्हें पढ़ सके।



स्लीप रेगुलेशन

 स्लीप और स्लीप रेगुलेशन के बारे में थोड़ी डिस्कसन पहले भी हो चुकी है। नींद हमारे लिए सबसे इम्पोर्टेंट है, और हम अक्सर बाकी कामो के लिए इसे ही नेगलेक्ट करते रहते है।

 एक तरह से बोले तो हम क्रोनिक स्लीप डेप्रीवेशन के टाइम में रह रहे है। हम सबके साथ ये प्रॉब्लम है। आप देर से सोने जाते है और सुबह जल्दी उठाना पड़ता है।


 तो इसका मतलब है कि जब आप बेड पर लेटते है आपको नींद आनी चाहिए। लेकिन ऐसा होता नहीं है, और जैसे ही आपकी आँख लगती है तभी अलार्म बजने लगता है। ये अच्छी बात नहीं है।



तो चले देखते है कि हम कैसे खुद ही अपनी नींद के दुश्मन बनते है :


1. ऐसे डीवाईस यूज़ करना जिनसे ब्राइट लाइट निकलती है - फोंस, कंप्यूटर्स जैसी चीज़े, अच्छा होगा कि सोने से पहले ऐसे किसी डिवाइस का यूज़ ही ना किया जाए। खासकर फोन जिसे आप अपनी आँखों के एकदम क्लोज़ रखके देखते है।


 रीसर्च में बताया गया है कि सोने से दो घंटे पहले इन चीजों से दूर रहे। होता क्या है कि गेजेट्स की आर्टीफिशियल लाइट आपके दिमाग को ये धोखा देती है कि ये डे-लाइट यानि दिन की light है। तो इमेजिन कीजिये कि इससे आपके दिमाग में क्या उथल पुथल मचती होगी।


2. डे टाइम तक बेड पर पड़े रहना - बहुत से लोगो की आदत होती है कि दिन के टाइम बेड पे लेट कर टीवी देखते है या बुक्स पढ़ते रहते है लेकिन ये एक अच्छी आदत नहीं है क्योंकि इससे आपका ब्रेन बेड और आपकी नींद के बीच रिलेशन नहीं बना पाता है। ऐसा देखा गया है कि जब बेड को सिर्फ सोने के लिए यूज़ किया जाता है तो आपकी नींद की क्वालिटी अपने आप बैटर हो जाती है।


3. दोपहर के टाइम लंबी नीद लेना - दिन के वक्त सोने में मज़ा तो आता है मगर ये एक बुरी आदत है। खासकर जब आप देर तक सोये रहते है, इससे आपका स्लीपिंग पैटर्न ख़राब होता है। ऐसा नहीं कि आप बिलकुल नींद ना ले। मगर कोशीश करे बस 20 या 30 मिनट के लिए ही सोये।


4. आपके कमरे में डार्कनेस की - Science prove कर चुकी है की जब आप अपने room में बिलकुल अँधेरा रखते है तो आपको सबसे अच्छी quality की नींद आती है।



 मारिया को तो ये लिस्ट अपनी सारी प्रोब्लम्स के लिए रेलेवेंट लगी क्योंकि अब तक वो सब कुछ गलत ही करती आई थी। अब जैसे सबसे पहली और ज़रूरी चीज़ जो वो करती थी कि सोने से पहले अपने बेड पर लेटकर सोशल नेटवर्क चेक करना.. इस तरह से उसने दो मिस्टेक एक साथ की,


 और उसके कमरे में एक कंप्यूटर भी था जो हमेशा ओन रहता था और उसकी लाईट पूरे कमरे में पड़ती रहती थी। अब ये एक अच्छी नींद के लिए परफेक्ट एन्वायरमेंट तो बिलकुल नहीं है - उसपर जब वो सुबह उठती थी तो दिन की शुरुवात में एक बड़ा मग भरकर कॉफ़ी पीती थी।


 शाम के 6 बजे ऑफिस से आते ही उसे अपनी थकान मिटाने के लिए कुछ देर सोना पड़ता था, और कभी कभी तो वो 2 या 3 घंटो तक सोयी रहती थी जिसके बाद उठने पर उसकी पूरी बॉडी में दर्द रहता। दिन भर काम के चलते उसे लंच करने का मौका नहीं मिलता था इस वजह से वो डिनर में ओवरईटिंग करने लगी,


 और रात के 11 बजे खाना हजम होने का बाद वो थोडा बहुत एक्सरसाइज़ करती जिससे वो और भी ज्यादा थक जाया करती। कुल मिलाकर उसकी इस लाइफ स्टाइल ने उसे निचोड़ कर रख दिया था जिससे वो बिलकुल भी सो नहीं पाती थी।



तो अब मारिया ने अपना दिन का schedule बदलना start किया -



1) उसने सोने से 2 घंटे पहले phone use करना बंद कर दिया।


2) उसने दोपहर में सोना बंद कर दिया और बाकी काम study table पर ही करती थी।


3) और अब सोते वक़्त वो अपने कमरे में पूरा अँधेरा रखती थी।


 जब मारिया ने इस schedule को follow करना शुरू किया तो उसकी नींद की quality बहुत ज्यादा improve हो गयी। जिस से उसकी work life और love life भी improve हो गयी।



क्नक्ल्यूजन


अब हम इस समरी के लास्ट में आ गए है। लाइफ स्टाइल इम्प्रूव करने के बहुत से तरीके है जिनमे से कुछ हमने आपको यहाँ बताये। चलो एक बार फिर सबसे important चीजों को रीपीट कर लेते है जिनके बारे में हमने यहाँ पर बात की थी :



1. हम अपने में Change कहा पे ला सकता है।

2. Mood को कैसे change कर सकते है।

3. Guess को कैसे control कर सकते है।

4.    Book कैसे पढ़े ताकि हमे ज्यादा से ज्यादा portion याद रहे।

5.   Sleep की quality कैसे improve करे। जिससे हमारा पूरा दिन productive रहे।


 हालांकि हम जानते है कि इनमे से हर एक एस्पेक्ट बहुत complex है और इन्हें गहराई से समझकर approch करने की ज़रूरत है। लेकिन हमें यकीन है कि यहाँ डिसक्राइब की गयी इन टेक्नीक्स से आप अपनी रोज़मर्रा की लाइफ को काफी हद तक improve कर सकते है।


 तो दोस्तों आपको ये Bouncing Back Book Review in Hindi कैसी लगी नीचे कमेंट करके जरूर बताये। और इस बुक Review को अपने दोस्तों के साथ शेयर करे।

आपका बहुमूल्य समय देने के लिए दिल से धन्यवाद।

Wish You All The Very Best.

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