Book Review in Hindi - Original : How Non Conformists Move The World | Thoughtinhindi.com

Book Review in Hindi - Original : How Non Conformists Move The World. Hello दोस्तों, ये है Author Adam Grant की बुक Original : How Non Conformists Move The World बुक की Review/Summary.

 ये बुक ऐसे लोगो की इम्पोर्टेंस के बारे में बताती है जिन्होंने वेल एस्टेबिलिश्ड सिस्टम और इसके रूल्स फ़ॉलो करने के बजाये अपने खुद के थौट्स और एक्शन की फ्रीडम के लिए रिस्क लेना ज्यादा पसंद किया.


 इतिहास गवाह है कि कैसे हमारे इन करेजियस और कॉंफिडेंट इंडीविजुएल्स ने सबसे अलग कुछ ऐसा करने की हिम्मत की जो कोई और सोच नहीं नहीं सकता था.

 उन्हें बदले में कम्प्लीट रिजेक्शन मिले और कई बार उन्हें मेंटली और फिजिकली हेरेसमेंट देकर तोड़ने की कोशिश भी की गयी. गेलिलियो जैसे कुछ पायोनियर्स को उनकी इंडिपेंडेंट थिंकिंग की वजह से मौत की सज़ा का डर भी दिखाया गया और कुछ का तो खूब मज़ाक भी उड़ाया गया जैसे आइन्स्टाइन जिनको पहले कोई समझ ही नही पाया था.

 फाइनली कुछ लोगो को अपनी फ्री थिंकिंग के लिए अनइमेजिनेब्ल टॉर्चर तक सहना पड़ा. जैसे एक्जाम्पल के लिए नेल्सन मंडेला. उन्होंने अपनी लाइफ के कई साल जेल में गुज़ारे क्योंकि उन्होंने साउथ एफ्रिका के इंडीपेंडेंस पर सवाल उठाने की हिम्मत दिखाई थी.

 इस बुक में एडम ग्रांट ने कुछ ऐसे ही प्रज्युम्प्शन डेवलप किये है जो बताएँगे कि ऐसे लोगो की थिंकिग कैसी थी. और सबसे इम्पोर्टेन्ट बात जोकि एडम ग्रांट सिखाते है वो ये कि हम भी कैसे खुद की सोच को इंडिपेंडेंट और नॉन - कांफिर्मिस्ट रख सकते है.. क्या आप इस बारे में कुछ टिप्स जानना चाहते है कैसे हम अपनी सोच सबसे अलग रखे, कुछ ऐसा सोचे जो पहले कोई ना सोच पाया हो ?

 अगर आपका जवाब है हाँ तो बने रहिये हमारे साथ. हम पूरी कोशिश करेंगे कि ऐसी ही कुछ रियल लाइफ स्टोरीज़ के थ्रू आपको ऐसे न्सेप्ट्स एक्सप्लेन कर सके जो काफी इम्पोर्टेन्ट है. ताकि आप भी ईजीली उन कॉन्सेप्ट्स को अपनी रियल लाइफ में उतार सके. कई बार ऐसा होता है कि बड़े आईडियाज को एवरीडे लाइफ में लाना हमारे लिए थोडा मुश्किल हो जाता है. लेकिन आपके लिए हम इसे थोडा आसान बनाना चाहेंगे.

Book Review in Hindi - Original : How Non Conformists Move The World

Book Review in Hindi - Original : How Non Conformists Move The World


 जो एक सबसे ज्यादा इम्पोर्टेन्ट टर्म एडम ग्रांट यूज़ करते है वो है वर्ड” ओरिजिंल्स”. ओरिजिंल्स सिर्फ वही नहीं होते जिनमे कोई टेलेंट हो, पैसन हो, कोई मोटिवेशन हो बल्कि हर कोई ओरिजिनल बन सकता है, एक बेहद मामूली इंसान भी. मगर किसी भी इंसान को ओरिजिनल बनने के पहले सबसे ज़रूरी है कि वो अपना वे ऑफ़ थिंकिंग चेंज करे. ये करने का एक सिंपल तरीका है कि खुद से एक क्वेश्चन पूछे: “मै इस तरह क्यों सोचता हूँ?’ क्या हर कोई मेरी तरह सोचता होगा या फिर मै ही अकेला इस कोंनक्ल्यूजन पर पहुंचा हूँ? ये सिंपल क्वेश्चन बहुत हेल्पफुल साबित हुआ है जब कभी हमें सोशल नॉर्म पर बेस्ड थौट्स और आईडियाज़ और इंडीविजुएल और ओरिजिनल आईडियाज़ के बीच डिफरेंट समझना होता है. एक एक्ज़म्प्ल से इसे समझते है. अलेक्जेंडर को अपने होम टाउन क्लब से बड़ा प्यार था. उसने वहां फ़ुटबाल खेलना सीखा था और वो रेगुलर मैचेस रेगुलर अटेंड करता था. उसने अपने रूम को भी अपने फेवरेट क्लब के कलर से डेकोरेट किया हुआ था. हालांकि जैसे-जैसे वो बड़ा होता गया वो और उसके दोस्त ट्रेवल की वजह से गेम्स से दूर होते गए..


 वैसे तो कभी कोई प्रॉब्लम नहीं आई थी मगर एक बार एलेक्जेंडर की होम क्लब के सपोर्टर्स के साथ एक फाईट हो गयी. बाद में उसे रिएलाइज हुआ कि ये फाईट किस हद तक डेंजरस हो सकती थी क्योंकि एलेक्जेंडर और बाकी होम टाउन क्लब के फैन्स बहुत कम थे. और ऊपर से उनके दुश्मन उन पर भारी पड़ सकते थे. बोटल्स, बेटस और क्या नहीं था उनके पास फाईट करने के लिए. एलेक्जेंडर ने देखा कि कैसे बातो बातो में ही इतनी सिचुएशन इतनी बिगड़ गयी थी जब उसके फ्रेंड्स गाली गलौच पर उतर आये. उसके बाद उनके ऊपर बोतले फेंकी जाने लगी थी जिससे बचने के लिए एलेक्जेंडर को भागने तक का टाइम नहीं मिला. वो तो अच्छा हुआ कि उसे कोई चोट नहीं आई मगर उसके कुछ फ्रेंड्स इंजर्ड हो गए थे. बाद में जब वे लोग घर लौटे तो एलेक्जेंडर ने इस पूरे इंसिडेंट पर गौर किया. वो इस कोंक्ल्यूजन पर पहुंचा कि ये बेमतलब की फाईट थी जिसे अवॉयड किया जा सकता था. अगर वो अपने होम टाउन क्लब को इस तरह से सपोर्ट नहीं करता तो इस फाईट को रोका जा सकता था. लेकिन अनफॉरचयूनेटली उसके बहुत से फ्रेंड्स इस पीसफुल स्टेंस के अगेंस्ट थे. वो इस फाइट का रिवेंज लेना चाहते थे. उनमे से कोई भी ये तक नहीं सोचना चाहता था कि आखिर इस हेट के पीछे क्या वजह है. पहले तो एलेक्जेंडर को ये बड़ा मुश्किल लगा कि वो इस प्रेशर को कैसे झेले. वो अपने फ्रेंड्स से एग्री नहीं कर रहा था इसलिए उसके कुछ दोस्तों ने उसके लिए कुछ इनसल्टिंग “लिटल क्राईबेबी” या “बोटेल फोबिया” जैसे निकनेम्स तक सोच लिए थे. 



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 कहने की ज़रुरत नहीं है कि एलेक्जेंडर ये सब होता देख कर बेहद सरप्राइज़ था, उसे दुःख हो रहा था कि लोग उसकी बात को नहीं समझ रहे और सबसे ज्यादा हर्ट करने वाली बात जो थी वो उसके फ्रेंड्स का बिहेवियर था. लेकिन उसने सोच लिया था कि वो अपने स्टैंड से पीछे नहीं हटेगा. “एक इंच भी नहीं” जैसा कि वो खुद से कहा करता था. उसे पता था कि उसकी बात में सिम्पल लोजिक है. उसका लोजिक यही था” ये हमारा क्लब है जो हमारे होम टाउन को, अपने छोटे से टाउन के लिए हमारे लव को रिप्रेजेंट करता है. जोकि एक अच्छी बात है तो क्या हमें अच्छी बातो को सपोर्ट करने के लिए बुरी चीज़े करनी चाहिए?’मेरे ख्याल से तो नहीं’. उसने अपने फ्रेंड्स को भी यही चीज़ कन्विंस करने की कोशिश की. हालांकि उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था. वे इस बात को लोजिक्ली देख ही नहीं पा रहे थे.


 इसलिए अब अलेक्जेंडर ने भी उनके अवे गेम्स अटेंड करना छोड़ दिया और होम गेम्स में भी वो अपने फ्रेंड्स से अलग ही बैठता था.


 और कुछ मंथ्स बाद ही चीज़े चेंज होने लगी. उसके और फ्रेंड्स भी इंजर्ड होने लगे थे कुछ तो काफी सिरियसली हुए थे. उन्हें भी अब अपने थिंकिंग पर डाउट होने लगा था. एक के बाद एक उन सबने अलेक्जेंडर के पास आकर अपनी गलती मानी और उससे बैड बिहेव करने के लिए सॉरी बोला. अलेक्जेंडर ने भी उन्हें स्माइल करके माफ़ कर दिया और एक बार सब फिर से फ्रेंड्स थे.


 जेनेरेटिंग एंड सेलेक्टिंग आईडियाज : ये दो स्टेप्स है एक इंडिपेंडेंट और नॉन कान्फ्रमिस्ट थिंकिंग के लिए. इसका सिम्पल मीनिंग है आईडियाज़ को डेवलप और स्प्रेड करने से पहले केयरफुली सेलेक्ट करके उसकी डिटेल्स में जाने की ज़रूरत है.यहाँ हम देख सकते है कि दोसेपरेट प्रोसेस है- जेनेरेटिंग आईडियाज़ और सेलेक्टिंग आईडियाज़. जेनेरेशन फेस में हम ज्यादातर क्वालिटी से ज्यादा क्वांटीटी प्रेफर करते है. दुसरे वर्ड्स में हमें इस बात पर ज्यादा इंटरेस्ट नहीं दिखाते कि आईडियाज़ कितने अच्छे है बल्कि हम उन्हें ज्यादा क्वांटीटी में चाहते है. – स्लेक्टिंग सेकेण्ड फेस है जहाँ हम अपने थौट्स को लेकर थोड़े पिकी यानी चूजी होते है. यहाँ पर हम नंबर ऑफ़ आईडियाज़ को कम करते है जो हमने फर्स्ट फेस में जेनेरेट किये थे. तो इस सेकेण्ड फेस में हम थोड़े ज्यादा सेल्फ क्रीटिकल हो जाते है. आगे जो एक्जाम्पल हम देने जा रहे है उससे आपको ये कांसेप्ट समझने में ईजीली समझ आ जाएगा.


 मार्क एक ऑर्डीनेरी स्टूडेंट था. पढ़ाई में ना तो एकदम एक्सीलेंट ना ही उतना बुरा. एकदम एवरेज. हाँ लेकिन उसमे पास बैंक में एक सिग्नीफिकेंट अमाउंट था जो उसने कुछ सालो से जमा कर रखा था. साथ ही अपने पैसे इन्वेस्ट करने के लिए उसके पास कुछ बढ़िया आईडियाज भी थे. मगर उसने अभी कहीं इन्वेस्टमेंट की नहीं थी. उसे पता था कि वो फ़ूड से रिलेटेड कामो में अपना पैसा लगा सकता है जैसे कोई रेस्तरोरेंट या टेक अवे. लेकिन शुरू में उसने इस अपोर्च्युनिटी पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था. वो बायोलोजी पढ़ रहा था और सब कुछ बढ़िया जा रहा था. मगर जब कॉलेज का लास्ट इयर खत्म होने वाला था, वो कुछ स्ट्रेंज फील करने लगा था. वो कुछ करना चाहता था, कुछ रिस्की. बायोलोजी में स्टडी के बाद एक स्लो और स्टेबल जॉब में उसे कोई थ्रिल नहीं दिख रहा था. उसे कुछ अलग करने की चाहत थी इसलिए वो बैठकर इस बारे में डीपली सोचने लगा..उसके माइंड पोसिबल बिजनेस के कई सारे आईडियाज़ आये. फिर उसने वो सारे के सारे आईडियाज़ एक पेपर में लिखे. उनकी जो लिस्ट बनी वो इस तरह थी.


1. रेस्ट्रोरेन्ट


2. टेक अवे


3. फ़ास्ट फ़ूड


4. एशियन फ़ूड


5. इटालियन फ़ूड


6. रशियन फ़ूड


 इसके बाद उसने आराम से बैठकर हर अपोर्च्यूनीटी के बारे में डिटेल्स से सोचा. सारे आल्टरनेटिव्स ले डाउन करने के बाद उसे रेस्ट्रोरेन्ट खोलने का आईडिया बढ़िया लगा. रशियन फ़ूड उसे ज्यादा अपीलिंग नहीं लग रहा था, ना ही उसे इसके बारे में कुछ पता था. “ये मेरे माइंड में आया भी कैसे ?” मार्क को हैरानी हुई.हाँ इटालियन फ़ूड ज़रूर इंट्रेस्टिंग था मगर उसे याद आया कि उसके छोटे से टाउन में रिसेंटली ही कुछ इटेलियन रेस्ट्रोरेन्ट खुले है. उसे पता था कि अगर वो भी इटेलियन रेस्त्रो खोलेगा तो कॉम्पटीशन बहुत टफ होगा. दूसरी तरफ उसे एशियन फ़ूड बिलकुल बोम्ब की तरह लग रहा था. असल में उसके टाउन में कोई एशियन फ़ूड रेस्ट्रोरेन्ट था भी नहीं. और फर्स्ट टाइम अगर कोई खोलेगा तो उसके लिए ये एक एडवांटेज होगी. उपर से उसे एशियन फ़ूड पसंद भी था और थोड़ी बहुत इसकी नॉलेज भी थी उसे. जब भी कभी वो एशियन फ़ूड खाता था तो अपने स्टाफ वालो से इसके बारे में बात करता था, यहाँ तक कि कुछ इसके इन्ग्रिडीयेंश भी शेयर करता था. उसके कुछ एशियन फ्रेंड्स भी थे. उसे लगा कि उन फ्रेंड्स से इस वारे में थोड़ी एडवाइस ली जाए. और उसके फ्रेंड्स कुछ लोगो को जानते थे जो एशियन फ़ूड रेस्त्रोरेंट्स में काम कर चुके थे. और सबसे इम्पोर्टेन्ट बात तो ये थी कि उसे एक शेफ़ भी मिल गया था जो इस टाइम जॉब ढूंढ रहा था. अब हम यहाँ देख सकते है कि कैसे अलेक्जेंडर ने पहले step में सिर्फ ideas लिखे यानी ideas generate किये उस वक़्त उसने उन ideas के बारे में कुछ सोचा नहीं, और फिर एक बार जब उसने सारे ideas generate कर दिए, सिर्फ तभी उसने हर idea के गुड और बैद एस्पेक्ट ऐनालाइज किये और इस कनक्ल्यूजन पर पहुंचा कि एशियन फ़ूड रेस्ट्रोरेन्ट खोलना ही सबसे बैटर रहेगा.



वोइसिंग एंड चैम्पिनियनिंग न्यू आईडियाज़


 ये नेक्स्ट स्टेप है अपने आईडिया को डेवलप करने का और उससे बेनिफिट लेने का, वोइसिंग और चैम्पियनिंग न्यू आईडियाज का मतलब है कि आप अपने आईडिया को कैसे ट्रांसमिट करेंगे, कैसे उन पर डिबेट करेंगे. कैसे उन्हें क्रिटिक से डिफेंड करेंगे. ये ओबियस है कि ये एक काम्प्लेक्स प्रोसेस है जिसे थोड़े ज्यादा प्रोसेस की ज़रुरत है. एडम ग्रेंट ये आर्ग्यू करते है कि अगर दूसरो को अपने आईडिया के बारे में कन्विंस करना हो तो अपने आईडिया को इतने थोरोली एनालाइज़ करो कि आपको उसके गुड और बेड दोनों साइड्स अच्छे से पता हो. इससे ये होगा कि अगर कोई डिबेट करेगा भी तो आप बेड साइड्स भी मेंशन कर सकते है और लोगो को दिखा सकते है कि आप किसी भी सिचुएशन के लिए वेल प्रीपेयर्ड है. मगर सेम टाइम में आपके पास उससे निपटने के लिए भी कोई बैकअप प्लान होना चाहिए. ये असल में एक प्रेज़ुम्पशन टेक्नोलोजी है जो पहले ही सोशल साइकोलोजी के फील्ड में रीसर्च की जा चुकी है. चलो अब इस प्रेक्टिस का एक अच्छा सा एक्जाम्पल देखते है:

 हम एक बार फिर से मार्क की बात करेंगे जो अपने छोटे से होम टाउन में एक एशियन रेस्ट्रोरेन्ट खोलना चाहता था. कहने की ज़रूरत नहीं कि उसका ये आईडिया हर किसी को पंसद नहीं आया. इस्पेश्ली उसकी माँ को ये आईडिया स्टुपिड लग रहा था. अब प्रॉब्लम तो ये थी कि मार्क को अपनी माँ को ही कन्विंस करना था क्योंकि उसे कुछ फंड्स की ज़रूरत थी और रेस्ट्रोरेन्ट बिजनेस के बारे में कुछ एडवाइस की भी. क्योंकि उसकी माँ रेस्ट्रोरेन्ट में पहले काम कर चुकी थी. वो जानता था कि यूं तो उसकी माँ एक रेशनल पर्सन है मगर जब उसने अपनी माँ को बड़े जोश में आकर अपने आईडिया के बारे में बताया तो वो काफी जिद्दी बिहेव करने लगी. उसे ये आईडिया ज़रा भी पसंद नहीं आया था इसलिए वो इस बारे में कोई बात नहीं करना चाहती थी. अब मार्क ने इस प्रोब्लम को एक डिफरेंट पर्सपेक्टिव के साथ अप्रोच करने की सोची.. उसे रियेलाईज हुआ कि अपने बिजनेस आईडिया के सिर्फ गुड साइड को मेंशन करने का कोई पॉइंट नहीं होगा. इस बात से एंकरेज होकर ओर बैठकर अपने इस एंड्यूवर के बारे में क्रीटकली सोचने लगा जो उसने अभी तक नही सोचा था. और उसे हैरानी हुई कि वाकई इसमें इतने सारे छोटे छोटे डिटेल्स है जो एकदम उसके अगेंस्ट जा सकते है. जैसे एक्जाम्पल के लिए उसका वो छोटा सा टाउन काफी कंज़र्वेटिव था - ऐसा नहीं था कि लोगो को एशियन फ़ूड नापंसद था लेकिन लोग इसे इतना पसंद भी नहीं करते थे और ना ही इसे कोई हाई रिगार्ड देते थे. वो सरप्राइज़ था कि इतना इम्पोर्टेन्ट फैक्ट वो कैसे भूल गया. उसे ये भी रियेलाईज़ हुआ कि उसका बिजनेस कुछ सालो तक तो उसे कोई प्रॉफिट नहीं देने वाला. ये भी हैरानी की बात थी क्योंकि अब तक वो यही मानकर चल रहा था कि बिजनेस स्टार्ट करते ही वो खूब कमाना शुरू कर देगा.


 अब जब वो रियेलिटी समझ चूका था तो एक बार फिर उसने अपनी माँ से बात की. लेकिन इस बार उसने अपनी बात की स्टार्टिंग में बिजनेस के बेड साइड भी गिनाने शुरू कर दिए.


 “देखो माँ” उसने कहा मुझे अच्छे से पता है कि एशियन फ़ूड के बिजनेस में भी काफी रिस्क है, मुझे तो ये सोचकर ही अजीब लग रहा है कि हमारा वो रेड नेक नेबर एक बार इसे ट्राई करने हमारे रेस्ट्रोरेन्ट में ज़रूर आएगा”. लेकिन इसका भी एक सोल्यूशन मैंने सोचा है. हम ना सिर्फ बर्गर और बाकी कॉमन चीज़े बनायेंगे बल्कि ये एडवरटीजमेंट भी देंगे कि हमारे यहाँ का खाना बड़ा स्पाइसी है. मुझे लगता है कि यही चीज़ हमारे कुजीन को एशियन फ़ूड से लिंक करती है और लोग यही सोच कर आयेंगे. मै सिर्फ इतना ही नहीं सोच रहा. प्रॉफिट की बात भी मेरे माइंड में है. मुझे पता है शुरुवात में हमारा ये बिजनेस इतना प्रॉफिट नहीं देगा कम से कम दो साल तक तो नहीं. इसलिए आपको आपका पैसा कुछ देर से वापस मिलेगा. और क्योंकि मै अपना सारा पैसा इन्वेस्ट कर रहा हूँ इसलिए हमें लोन की ज़रूरत भी नहीं है. अब सीधी सी बात है कि प्रॉफिट कमाते ही मै आपका पैसा वापस करने की सोचूंगा. और मेरे केलकुलेशन के हिसाब हाफ केपेसिटी पर रेस्ट्रोरेन्ट ऑपरेटिंग करके मै कुछ ही मंथ्स में आपको पैसा लौटा दूंगा.”


 अब ये बताने की ज़रुरत नहीं है कि उसकी माँ को सारी बात समझ आ चुकी थी और बिना किसी फर्दर आर्ग्यूमेंट के मार्क को अपनी माँ से पैसे उधार मिल गए.



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मैनेजिंग इमोशंस


 अगर आपका आईडिया चल भी गया और आपने अपना नया एडवेंचर स्टार्ट भी कर दिया है तो फिर भी अभी लड़ाई खत्म नहीं हई. बल्कि उल्टा एक दूसरी प्रॉब्लम यानी इमोशनल बैटल अभी स्टार्ट होनी बाकी है. सक्सेस पाने से पहले आपको कितना ही हर्डल्स अभी पार करने है, कुछ छोटेमोटे कुछ बड़े-बड़े. एक चीज़ तो श्योर है. हर्डल्स तो आयेंगे ही और आपको फेस भी करने पड़ेंगे. ये हर्डल्स होंगे जैसे प्रॉफिट ना होना, स्टाफ का काम छोडकर चले जाना, फ्रेंड्स का सपोर्ट ना मिलना, ये सब कुछ हो सकता है आपके साथ. और अगर आप इन सबसे ओवरकम होना नहीं सीखेंगे तो ये आपके सर का दर्द बन जायेंगे और आप खुद पर हो डाउट करने लगेगे कि आपका डिसीज़न सही है भी या नहीं. ये बुक आपको यही बात समझाएगी कि कैसे बायेस्ड इमोशनल रेस्पोंसेस की पहचान करके उसे कण्ट्रोल करे और सबसे इम्पोर्टेन्ट बात एक्टिंग आउट के चांसेस कैसे कम करे. लेकिन इमोशन मैनेज करने का मतलब सिर्फ नेगेटिव इमोशंस ही कण्ट्रोल करना नहीं है, इसमें एंगर कण्ट्रोल और दूसरो से इंसीपिरेशन लेना भी इन्वोल्व है. हम सबको स्टीव जॉब्स की स्टोरी मालूम है. अगर ये आपको थोड़ी अच्छे से पता है तो आपको ये चीज़ पता होगी. खासकर इनिशियल फेस में सब कुछ एकदम सही नहीं जाता. इसलिए स्टीव जॉब्स को भी जाने अनजाने कुछ ऐसी स्ट्रेटेटीज़ यूज़ करनी पड़ी जिससे उसे वो अपने इमोशंस को मैनेज कर पाए और सक्सेस की तरफ बढ़ते गए. ये कम लोगो को पता होगा कि 1986 में जॉन स्कूली ने जो उस वक्त एप्पल कंपनी के टॉप में थे, स्टीव जॉब्स को नौकरी से निकाल दिया था. और स्टीव जॉब्स ने इस पर कैसे रिएक्ट किया ? जब उन्हें निकाला गया तो उन्होंने ये कहा“  जॉब् से निकाला जाना मेरे लिए एक तरह से ब्लेसिंग की तरह रहा. अब मै हर तरह की बाउंड्री से फ्री हूँ और होम कंप्यूटर के बारे में अपने विजन को आज़ादी से नर्चर कर सकता हूँ”.  आप देख सकते है कि ये एक परफेक्ट एक्जाम्पल है उस चीज़ का जिसे “स्ट्रेटेज़िक ऑप्टीमिज़्म” कहा जाता है.

 बजाये इसके कि जॉब्स छोड़ने के गम में अपनी किस्मत पर रोने के उन्होंने इसके गुड साइड्स पर फोकस किया. “ठीक है, चलो उसे देखते है जो अब आगे कर सकते है, वो नहीं कि जो हो चूका है” शायद यही बात स्टीव जॉब और उनके जैसे स्ट्रेटेज़िक ओप्टीमिज़्म एम्प्लोय करने वाले लोग ऐसी सिचुएशन में सोचते है जो बाकी कॉमन लोगो की नजरो में एक प्रॉब्लमेटिक बात होती है.


 स्टीव जॉब्स इस बात के लिए भी फेमस थे कि वे अपने एम्प्लोयीज़ में एक एन्थूयाज्म और ओप्टीमिज़्म स्पार्क करने में एबल थे. हमने इस बारे में मेंशन किया था कि इमोशन मैनेज करने का ये एक सबसे इम्पोर्टेन्ट पार्ट है.


 जॉब्स लोगो को मोटिवेट करने में एक्सपर्ट थे क्योंकि वे एक बड़े अच्छे स्टोरीटेलर भी थे. उनके पास स्टोरीज़ का खजाना था जिन्हें वो रियल लाइफ प्रॉब्लम सोल्व करने में मेटाफ़र्स की तरह यूज़ करते थे. एक्जाम्पल के लिए जैसे एब्राहम लिंकन की स्टोरी काफी मोटिवेशनल है. बेशक वो बाद में प्रेजिडेंट बने लेकिन कम ही लोग जानते है कि प्रेजिडेंट बनने से पहले उनकी लाइफ कैसी थी. एक्चुअली एब्राहम लिंकन बड़े बदकिस्मत इंसान थे, जिनके सामने ऐसे कई ओकेजन आये जब वे मौत को गले लगाकर लाइफ को अलविदा कह सकते थे क्योंकि उन्हें लाइफ में उन्हें इतनी मुश्किलें आई. उनकी मदर नेंसी की जब डेथ हुई तो वो सिर्फ 9 साल के थे. उनकी स्टेप मदर सराह जिसे वो बहुत प्यार करते थे, लिंकन के फादर से शादी होने के जल्द बाद ही उसकी भी डेथ हो गयी थी. उनके 4 बेटे थे जिसमे से सिर्फ एक ही बच पाया था. लिंकन कभी भी इस लोस से ओवरकम नहीं हो पाए थे. और ना ही उनकी वाइफ मैरी. और लिंकन हालांकि इन दुखो से पूरी तरह टूट गए थे फिर भी लाइफ में आगे बढे और ऐसा मुकाम हासिल किया जो शायद बहुत कम लोगो को चांस मिलता है. एब्राहम लिकन की स्टोरी उन बहुत सी स्टोरीज़ में से है एक जिन्हें आप लोगो को सुनाकर मोटिवेट कर सकते है. कभी कभी आपको किसी कांटेक्स्ट को कंसीडर करके ऐसी स्टोरी ढूढ़ लानी होगी जो उस सिचुएशन में फिट बैठ सके. अब स्टीव जॉब्स की स्टोरी पर वापस आते है. हम बात कर रहे थे कि कैसे स्टीव जॉब्स लोगो को अपनी स्टोरी टेलिंग से मोटिवेट करते थे. लेकिन एक और कार्ड उनके पास था. जो था बोलने से भी ज्यादा सुनना. एक पर्टिक्यूलर कांफ्रेंस में जहाँ उन्हें पता था कि उन्हें हार्श क्रीटिज्म फेस करना पड़ सकता है, उन्होंने इंटेंश्नली माइक्रोफोन को पब्लिक की तरफ कर दिया और सिम्पली कहा “ मै वही बात करूँगा जिस बारे में आप बात करना चाहते है” अब कहने की ज़रूरत नहीं कि सारी क्राउड ये सुनकर कम्प्लीटली सरप्राइजड थी.


क्रिएटिंग एंड मेनेजिंक कोलिश्न्स coalitions


 ये लास्ट स्टेप है जो एडम ग्रांट ने मेंशन किया है जोकि फेयरली सिम्पल है- कोई भी सक्सेस गेन करने के लिए ये बहुत ज़रूरी है कि लोगो के साथ गुड और स्ट्रोग रिलेशन रखा जाए. ऐसा मुश्किल ही होता है कि किसी को बिना दूसरो की हेल्प मिले कोई सक्सेस अचीव हुई हो. हमने देखा कि कैसे स्टीव जॉब्स अपने कलीग्स की ओपिनियन को वैल्यू देता था. और उसकी सक्सेस के पीछे ये भी एक मेन रीजन था. अपने एन्मीज़ और अपने “फ्रेनिमी” को पहचानना इस स्टेज में क्रूशियल हो सकता है. फ्रेनीमीज़ वो होते है जो शुरू में आपको प्रेज़ करते है फिर आपकी एबिलिटीज पे डाउट करना शुरू कर देते है. असल में ये लोग ओपन एनेमीज़ से भी बुरे होते है.एडम ग्रांट ये भी बताते है कि हमे दरअसल अपने एनिमीज़ से भी बिजनेस डिस्कस करना चाहिए क्योंकि कई बार इसके फायदे भी निकलते है. और एडम ग्रांट के हिसाब से जो लोग कभी हमारे एनेमी रहे हो, वो एक बार अगर फ्रेंड बन जाए तो जिंदगी भर दोस्ती निभाते है.


कनक्ल्यूजन


 अब आपके सामने हमने इस बुक के मोस्ट इम्पोर्टेन्ट आईडियाज को समरी बनाकर रख दिया है. स्पेस रिसट्रिकशन की वजह से हम हर छोटी डिटेल्स एक्प्लेन नहीं कर पायेंगे जो बुक में मेंशन है मगर हमने पूरी कोशिश की है कि मोस्ट इम्पोर्टेन्ट कांसेप्ट्स को समरी में डालने की और उन्हें रियेल लाइफ स्टोरीज़ से एक्सप्लेन करने की. ये कुछ मोस्ट इम्पोर्टेन्ट चीज़े है जो आपको याद रहनी चाहिए:

1.  कोई भी ओरिजिनल और नॉन कनफर्मिस्ट बन सकता है : ये ऐसी चीज़ नहीं है जो पैदाइशी होती है. अपनी लाइफ में आप नॉन कनफर्मिस्ट बनते है या सिम्पली ऐसा इंसान जो भीड़ का हिस्सा हो. हालांकि ये इम्पोर्टेन्ट चीज़ जाननी ज़रूरी है कि हर बार भीड़ का हिस्सा बनना कोई बुरी बात भी नहीं है. हालाँकि बगैर सोचे समझे मेजोरिटी का ओपिनियन कभी एक्स्पेट नहीं किया जाना चाहिए.


2.  आईडियाज जेनेरेट और सेलेक्ट करना : ये दो फर्स्ट स्टेप्स है किसी भी इंडीविजुअल और ओरिजिनल आईडिया को डेवलप करने से पहले. ये दो स्टेप्स आपको अपनी चोइस नैरो डाउन करने में भी हेल्प करेंगे ताकि आपको बेस्ट आईडिया मिल सके.


3.  न्यू आईडियाज की वोइसिंग और चैम्पिनियनिंग : जैसा हमने बताया कि अपने आईडिया को ट्रांसमिट करने का ये तरीका आप अप्लाई कर सकते है. क्योंकि दूसरो की बिना सक्सेस पाना ऑलमोस्ट इम्पोसिबल होगा. आज नहीं तो कल आपको दूसरो से अपना आईडिया शेयर करना ही पड़ेगा. और आप कैसे इसे बेस्ट तरीके से करे ये जानना आपके लिए ज़रूरी होगा.


4.  मैनेजिंग इमोशंस : सक्सेस का रास्ता ईजी नहीं है. आप चाहे या ना चाहे आपको ओब्स्टेकल फेस करने हो पड़ेंगे,और ये भी पक्का है कि न जाने कितनी ही बार आपको हर्ट भी होना पड़ेगा. अपने पास्ट पर रोने के अच्छा है कि कुछ टेक्निक्स सीख ली जाए जिससे आप इन ओब्स्टेक्लस को ओवरकम कर सके


5.  कोलाईशन क्रियेट और मेंटेन करना : हमने ये पहले ही मेंशन किया है जब हमने न्यू आईडियाज के वोइसिंग और चैम्पियनिंग की बात की थी. इस सेक्शन में आप सीख सकते है कि क्यों हमें अपने एनिमीज़ के साथ भी चीज़े डिस्कस करनी चाहिए ताकि आपकी उनसे डिबेट हो और नए आईडियाज मिल सके मगर हाँ "फ्रेनीमीज़" से बचकर रहे.



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 दोस्तों आपको आज का हमारा यह Book Review in Hindi - Original : How Non Conformists Move The World कैसा लगा नीचे कमेंट करके जरूर बताये और इस Book Review in Hindi - Original : How Non Conformists Move The World को अपने दोस्तों के साथ शेयर जरूर करे।


आपका बहुमूल्य समय देने के लिए दिल से धन्यवाद,

Wish You All The Very Best.

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