Book Review in Hindi - Quiet The Power of Introverts | Thoughtinhindi.com

Book Review in Hindi - Quiet The Power of Introverts in a World That Can't Stop Talking. Hello दोस्तों, ये है Susan Cain की best selling बुक Quiet The Power of Introverts in a World That Can't Stop Talking बुक की समरी या फिर आप कह सकते है Book Review.

 अपनी इस बेस्ट सैलर बुक में सुजेन कैन इस बात को थोरोली एक्सप्लेन करती है कि इंट्रोवर्ट्स इस दुनिया को किस नज़र से देखते है. वैसे मैं भी introverts हूँ। उन्होंने इस बुक के थ्रू इंट्रोवर्ट्स के सबसे इम्पोर्टेन्ट ट्रेट को डिसक्राइब किया है. ये दुनिया, जहाँ एक से बढ़कर एक आइडियल, हाइली एस्सरटिव पर्सनेलिटी के एक्स्त्रोवर्ट्स से भरी पड़ी है वहां कभी-कभी इंट्रोवर्ट्स लोगो की एडवांटेज या तो भुला दी जाती है या नेगलेक्ट की जाती है, और यही पर सुजेन का सबसे इम्पोर्टेन्ट गोल आता है – आपको इंट्रोव्र्ट्स होने के फायदे गिनाना.

Book Review in Hindi - Quiet The Power of Introverts


 आमतौर पर हमारी सोसाइटी में इंट्रोवर्ट्स होना उतना अच्छा नहीं माना जाता. अब जैसे एक्जाम्पल के लिए इंट्रोवर्ट्स बच्चो को अपने स्कूल के दिनों में अक्सर पनिशमेंट मिलती है क्योंकि वे सबके जैसे नहीं होते, ज्यादा किसी से कम्यूनिकेट नहीं करते जैसा कि “उन्हें बाकी बच्चो की तरह करना चाहिए”.

 किसी भी सक्सेसफुल पर्सनेलिटी का वेस्टर्न आइडियल है हाइली एनरजेटिक होना, कांफीडेंट और कोम्यूनिकेटिव होना जोकि इंट्रोवर्ट्स लोगो के केरेक्टरस्टिक जैसे क्वाईटनेस, शाईनेस और आउटवार्ड एक्शन की कमी के एकदम अपोजिट है और उनकी पर्सनेलिटी की इन ख़ास बातो को नेगेटिव समझा जाता है. हालांकि, जैसा सुजेन कैन पॉइंट आउट करती है ये बस एक स्टीरियोटाइप है जो बदकिस्मती से बहुत से इंट्रोवर्ट्स लोगो को सक्सेस के उस लेवल तक पहुँचने से रोकती है जहाँ उन्हें वाकई में होना चाहिए था.

 यहाँ हम सबसे पहले तो एक्सत्रोवेर्ज़न और इंट्रोवर्ज़न क्या है, ये चीज़ एक्सप्लेन करेंगे और बाद में कुछ ऐसे मोस्ट इम्पोर्टेन्ट आईडियाज़ को एलोब्रेट करके बताएँगे जो सुजेन ने अपनी समेटिव बुक में डेवलप की है.


इंट्रोवेर्ज़न एंड एक्सत्रोवर्ज़न

 साइकोलोजी में ये दो टर्म्स काफी इम्पोर्टेन्ट होती है. वैसे एक साइंस के सब्जेक्ट के तौर पर साकोलोजी में इंट्रोवेर्ट और एक्स्त्रोवर्ट टाइप का कांसेप्ट बहुत पहले से ही इंट्रोड्यूस हो चूका था. और बाद के सालो में कई सारे रिलाएबल मॉडल्स और थ्योरीज के थ्रू इस सब्जेक्ट को ज्यादा अटेंशन मिलने लगी. कार्ल गुस्ताव जंग जो एक बहुत बड़े जाने माने साइकोनेलिस्ट थे, उनका साइकोनेलेसिस के साथ-साथ साइकोलोजी में भी काफी कंट्रीब्यूशनरहा है और उन्होंने इंट्रोवेर्ज़न और एक्स्त्रोवेर्ज़न, इन दो टाइप्स के डेवलपमेंट में काफी काम किया जो हर एक ह्यूमन बीइंग के लिए कंसर्न का मैटर है. मगर आज भी हमारे पास इन टर्म्स की कोई कंन कनक्ल्यूसिव डेफिनेशन नहीं है. हालांकि ऑथर्स इसके मोस्ट एस्पेक्ट पर एग्री होते है.

 इंट्रोवर्ट और एक्सोवर्ट के बीच का डिफ़रेंस एक्सप्लेन करने के लिए हम यहाँ दो ऐसे लोगो का एक्जाम्पल देंगे जो काफी पोपुलर है.

 जॉन लेनन जोकि पोपुलर म्यूजिक के फील्ड में एक इम्पोर्टेन्ट फिगर है, वो एक पक्के एक्सोवर्ट थे. वो हमेशा लाउड रहते थे, किसी भी चीज़ का तुरंत रीस्पोंस देते थे. उन्हें पब्लिसिटी भी बड़ी पसंद थी जो उन दिनों बीटल्स को मिला करती थी और हमेशा लोगो से घिरे रहना उनकी आदत थी. बीटल्स का ग्रुप छोड़ने के बाद भी वो मिडिया का अटेंशन खींचते रहे. अब जैसे एक्जाम्पल के लिए योको ओनो के साथ उन्होंने अपना फेमस “बेड इन्स फॉर पीस” रखा था जहाँ उन्होंने जर्नेलिस्ट्स को अपने होटल रूम में इनवाईट किया, जब वे कई दिनों के लिए बेड पे ही लेटे रहे थे. कई वीक्स तक वे सिर्फ होटल के अंदर ही घुमते रहे थे और जर्नेलिस्ट्ससे बाते करते हुए अपनी फिल्म बनवाते रहे थे. अब ये सिचुएशन तो किसी इंट्रोवर्ट के लिए किसी नाईटमेयर से कम नहीं होगी.

 हां, ये सच है कि पोपुलर लोगो को ये बात एक्सेप्ट करना ज़रूरी है कि जब वे स्ट्रीट्स पे निकलेंगे तो लोग उनके पीछे पड़ेंगे, उन्हें रोकेंगे. ओब्सेस्ड फेंस उन्हें हैरास कर सकते है. लेकिन हर कोई पोपुलर इंसान खुद जर्नेलिस्ट्सको अपने होटल सुइट में बुलाकर उनके साथ इतना नहीं घुलता-मिलता.

 अब डेनियल रेडक्लिफ एक परफेक्ट एक्जाम्पल है इंट्रोवर्ट् पर्सनेलिटी का, जो काफी पॉपुलर होने के बावजूद भी जर्नेलिस्ट्सऔर पब्लीसिटी को हर कीमत में अवॉयड करने की कोशिश करते थे. उन्हें हर एक ब्लोकबस्टर मूवी में होने का बिलकुल शौक नहीं था और ना ही वो पार्टी एनीमल थे. यहाँ तक कि लोगो से बचने के लिए वो स्ट्रीट्स में अपने कई सारे डॉग्स लेकर वाक् करते थे.

 कई सारे डॉग्स से हमारा मतलब है वाकई में बहुत सारे डॉग्स. ज़रा इमेजिन करो डेनियल रेडक्लिफ 10 कुत्तो के साथ रोड पे चल रहे है. ये उनका बड़ा मजेदार तरीका था अपने फैन्स को दूर रखने का. अब वापस जॉन की बात करते है. बीटल्स ने मिड सिक्सटीज़ में जो मूवीज़ बनाई थी उनमे जॉन की लाउड पर्सनेलिटी को थोडा और एक्ज़ाग्रेटेड करके दिखाया गया है. इन सभी फिल्मो में उन्हें एक ऐसा केरेक्टर दिखाया जाता था जो हमेशा मस्ती के मूड में रहता है, जोक्स मारता रहता है, मतलब कि जिसकी पूरी लाइफ ही एक पार्टी है. वो अपने बैंडमेट ज्योर्ज हैरीसन के पोलर अपोज़िट थे जो एक्पोज़र बिलकुल पसंद नहीं करते और ज़्यादातर चुपचाप से पीछे बैठे रहते थे.

 बीटल्स की स्टेज परफोर्मेंस में भी ज्योर्ज कहीं बैक साइड में खड़े रहते थे जबकि जॉन और पॉल मैकर्टनी हमेशा फ्रंट पे रहते थे. जॉन से बिलकुल अलग ज्योर्ज हैरीसन खुद को हेमशा काम में डुबाये रखते थे. उनका म्यूजिक भी डिफरेंट था. बीटल्स एरा के दिनों में हैरीसन के सोंग्स, आईडिया और कंटेंट वाइज़ मैकर्टनी और लेनन की कम्पोजीशन से बहुत डिफरेंट होते थे.

 मतलब कि उनके गाने कुछ अलग ही होते थे जिनमे थोड़ी फिलोसिफी और मिस्ट्री छुपी थी. और जब उनका बैंड बंद हो गया तो हैरीसन ने खुद को एक्सप्रेस करना स्टार्ट किया और फाइनली अपना मास्टर पीस रिकोर्ड किया- एक डबल एल्बम “आल थिंग्स मस्ट पास”.  उन्हें इसे परफेक्ट बनाकर रिकोर्ड करने  में कई साल लग गए थे जोकि उनकी एक और खासियत थी. हैरीसन जोकि एक परफेक्शिनिस्ट थे, अपने म्यूजिक में इतना फोकस करते थे कि अपने आस-पास की हर चीज़ भूल जाते थे. वे महीनो अपने सोशल सर्कल और बाकी सब चीजों से दूर रहते थे. उनकी इस आदत से उनके बैंडमेट्स तक परेशान हो जाते थे क्योंकि परफेक्शनिज्म के चक्कर में कई बार उनकी कम्पोजीशन भी फिनिश नहीं हो पाती थी.

 अब देखो ये दो म्यूज़िशियन आपस में कम्यूनिकेट कैसे करते थे. लगभग हर इंटरव्यू में जॉन ही पिच डोमिनेट करते थे क्योंकि वही सबसे लाउडेस्ट थे और दूसरो को इंटररप्ट करके बस अपनी बात उपर रखते थे या कोई मज़ेदार किस्सा सुनाने लगते.

 दूसरी तरफ ज्योर्ज चुपचाप रहते थे. उन्हें बोलने से ज्यादा सुनना पसंद था. और जब वो बोलते भी थे तो गुम से रहते थे, बड़ी सॉफ्ट वौइस् में बोलते थे. जॉन उन लोगो में से थे जो नजरे मिलाकर बात करते है और आपको भी अपनी दुनिया का हिस्सा बना लेते है मगर ज्योर्ज शायद ही कभी किसी को देखकर बात करते हो. और बात करते वक्त भी वो नीचे देखते रहते थे कि क्या बोलना है.

 अब पर्सनल लाइफ की बात करे तो जॉन की पर्सनल लाइफ काफी प्रोब्ल्मेटिक थी. उन्होंने लाइफ में काफी सारे अप्स-डाउन देखे थे. जॉन बहुत सोशल थे, वो रोजाना कई नए लोगो से मिलते रहते थे जिसमे कई खूबसूरत और जवान लेड़ीज़ भी होती थी.

 अब सीधी सी बात है उनके साथ कई एस्केपेड्स और सकेन्डल्स हुए जो मिडिया में काफी उछले थे. बाद में वो सेटल डाउन भी हुए लेकिन जॉन एक ऐसे इंसान रहे जिनकी लाइफ में एक से ज्यादा पार्टनर आये, कई औरतो से उनके केजुअल फ्रेंडशिप रही. वही दूसरी तरफ ज्योर्ज की पर्सनल लाइफ काफी शांत और प्रेडिक्टेबल रही थी. उनका दूसरी औरतो के साथ कोई स्केंडल नहीं रहा था.

 इंट्रोवर्ट लोगो की दोस्ती बहुत कम होती है और जिससे भी होती है वो सुपरफिशियल फ्रेंडशिप नहीं होती बल्कि एक गहरा रिलेशनशिप होता है जिसे वो हमेशा मेंटेन रखते है. ये बात समझना इम्पोर्टेन्ट है कि ये एक मिसकन्ससेप्शन है कि इंट्रोवर्ट लोग सोशल नहीं होते और लोगो से नफरत करते है, मगर ये बिलकुल गलत है. ज्य्रोर्ज की तरह ही इनकी पर्सनल लाइफ ज्यादा स्टेबल होती है. ये कम दोस्त बनांते है मगर जिससे भी दोस्ती करती है पूरी निभाते है.

 अब शायद आपको थोडा आईडिया मिल गया होता इंट्रोवर्ट लोगो के बारे में. हालांकि हम इस बात पर पूरा जोर नहीं दे सकते कि इंट्रोवर्ट होने का मतलब ये नहीं है कि आप लोगो से बात नहीं करना चाहते या उनके साथ आपकी बोन्डिंग नहीं होती.

 हमने अभी ज्योर्ज हैरीसन का एक्जाम्पल दिया. हालांकि उन्हें भीडभाड पसंद नहीं थी लेकिन वे अपने ख़ास फ्रेंड्स के साथ घुमते फिरते थे और असोशल बिलकुल भी नहीं थे. लेकिन ये बात सभी इंट्रोवर्ट्स के साथ होती है ये तो पक्का है- बेशक उन्हें बाते करना पसंद होता है लेकिन हर चीज़ के बारे में नहीं.

 एक्स्त्रोवर्ट्स यूज़वल स्माल टॉक पसंद करते है — वो अपनी लास्ट नाईट आउट के बारे में घटो बात कर सकते है, या वेकेशन में उनके साथ हुई किसी फनी बात को भी शेयर करेंगे.

 दूसरी तरफ इंट्रोवर्ट को इन सब्जेक्ट्स पर बात करना अच्छा नहीं लगता. उन्हें लाइफ, फिलोसीफी या एबस्ट्रेक्ट सब्जेक्ट्स पर डीप और मीनिंगफुल कनवेर्सशन करना पसंद आता है. उन्हें ऐसे डीप सब्जेक्ट्स ऐसे ही पसंद होते है जैसे एक्स्त्रोवर्ट्स को एवरीडे की चिट-चैट. ये को प्रोब्लेमेटिक बात नहीं है लेकिन देखा गया है कि अक्सर एक्स्त्रोवर्ट जब कोई इस तरह की बात छेड़ते है तो इंट्रोवर्ट उसमे एंगेज नहीं होते. इस बात का हम एक और एक्जाम्पल देंगे.




इंट्रोवर्ट्स भी सोशिएबल होते है मगर एक डिफरेंट तरीके से

 स्टीफन और मार्क दोनों सेम यूनिवेर्सिटी में पढ़ते थे. क्लास के बाद दोनों बाकी स्टूडेंट्स के साथ नज़दीक के एक पब में जाकर एन्जॉय करते थे. ऐसी सिचुएशन में अक्सर आपको एक्स्त्रोवर्ट्स और इंट्रोवर्ट्स के बीच के कई सारे डिफरेंसेस देखने को मिलते है. अब स्टीफन एक ओरडीनेरी एक्स्त्रोवर्ट लड़का था, लाउड और फ्लेमबोयेंट टाइप का. वो पब में ऐसे बैठता था कि सब उसे ही देखे और अगर कोई उसे नहीं देख रहा हो तो भी वो उसका अटेंशन अपनी तरफ डाइवर्ट कर देता था.

 वही मार्क था जो इंट्रोवर्ट था. हालांकि उसे अपने क्लासमेट्स के साथ अपने फेवरेट टोपिक्स पर बात करना पसंद था मगर कभी-कभी वो सबके साथ होते हुए चुपचाप बैठा रहता था. इशपेश्ली तब जब दो-चार बीयर के बाद सब लोग लूज़ और पॉइंटलेस बाते करने लगते थे. आये दिन उसके दोस्त उसे ज्यादा खुलकर बात करने के लिए एंकरेज करते रहते लेकिन उसे सब अच्छा ही नहीं लगता था.

 एक बार स्टीफन सबको अपने प्राग के लास्ट ट्रिप के बारे में बता रहा था की वहां उसने कितनी पार्टीज़ की, कितने लव अफेयर्स किये, कितने लोगो से मिला, वगैरह वगैरह. उसकी स्टोरी काफी लंबी थी और लोग मन मारकर सुन रहे थे. यहाँ तक कि जब लोग बीच में बोल रहे थे तो वो भी स्टीफन से मिलतीजुलती स्टोरीज़ ही सुना रहे थे. जब मार्क ने टॉपिक चेंज करने के लिए उस दिन के क्लास लेक्चर के बारे में मेंशन किया तो सब उसे अजीब तरीके से घूरने लगे खासकर स्टीफन.


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 उसने मार्क की बात बीच में काटकर अपनी स्टोरी कंटीन्यू रखी. जब मार्क को लगा कि उसकी कोशश बेकार है तो वो भी चुप हो गया और उनकी बकवास बाते सुनकर बोर होता रहा. उसके बाद वो जाकर चुपचाप एक कोने में बैठ गया जहाँ उसपर किसी की नजर ना पड़े. उसे ये भी लग रहा था कि अगर उसे कभी भीड़ में बोलना भी पड़े तो ये उसके लिए कितना वीयर्ड और अनकम्फर्टेबल होगा. इससे तो अच्छा होता कि उसके कम दोस्त होते जिनसे वो एक मिनिंगफुल और डीप कोंवरसेशन कर पाता.


वेस्टर्न कल्चर : एक्स्त्रोवजन एज अ आईडियल फॉर सक्सेस

 जैसा कि हमने पहले भी मेंशन किया है कि एक्स्त्रोवर्ज़न होना एक ऐसी क्वालिटी मानी जाती है जिससे सक्सेस मिलती है क्योंकि वेस्टर्न कल्चर में सोशिएबिलेटी, कांफिडेंस और एस्सरटेशन को काफी वैल्यू दी गयी है हालांकि ये प्रूव नहीं होता कि सिर्फ ये सब होने से किसी इंसान को सक्सेस मिल जाएगी. ये एक बहुत इम्पोर्टेन्ट आईडिया है जिसे सुजेन कैन ने अपनी बुक में डेवलप किया है. “कम्पटीटेन्स इज नॉट द सेम एज़ कांफिडेंस”. बहुत सी वेस्टर्न कंट्रीज़ में अगर आप ज्यादा कांफिडेंस है तो पोसिब्ल है कि आप ज्यादा सक्सेसफुल बने फिर भले ही आपमें कॉम्पीटेन्स कम हो बजाये इसके कि आपमें कॉम्पीटेन्स ज्यादा और कांफिडेंस कम है. और इसी थौट के कारण बहुत से इंट्रोवर्ट्स आगे नहीं बढ़ पाते है.

 लेकिनं दुसरे कल्चर्स का थोडा बहुत एक्जामिनेशन करके हम इस अनजस्टिफाईड वेस्टर्न स्टीरियोटाइप को तोड़ सकते है. चलो जापान का एक्जाम्पल लेते है. वेस्टर्न कल्चर के एस्पेक्ट में जापान एकदम पोलर अपोज़िट माना जा सकता है. इशपेश्ली सोशल रिलेशनशिप और सक्सेस के मामले में.

 एक तरह से माना जाए तो” जापान इंट्रोवर्ट्स के लिए एक हेवन की तरह है”. आमतौर पे यहाँ के लोग ज्यादा क्वाईट होते है. गलीयों में जोर से बात करना रूड माना जाता है, सब अपने काम से काम रखते है. स्कूल, कॉलेज में भी यही सेम सिचुएशन है. जहाँ एक ओर बहुत सी अमेरिकन यूनिवेरसिटिज़ एक्स्त्रोवर्जन रिलेटेड ट्रेट्स को एंकरेज करती है जिसमे ग्रुप वर्क, प्रेजेंटेशन वगैरह कम्पल्सरी एक्टिविटीज़ है वही दूसरी ओर जापान में डिफरेंट सिचुएशन है. वहां ज्यादा स्टूडेंट्स अपना काम खुद ही करते है और लेक्चर के टाइम पर भी शांत रहते है. जब तक प्रोफेशर कुछ ना पूछे कोई फालतू के सवाल नहीं करता है.

 इसके अलावा हम कुछ और भी डिफरेंसेस देख सकते है. सोशल साइकोलोजिस्ट नोशन ऑफ़ पर्सनल स्पेस पर जोर दिया है जिसका सिम्पल मीनिंग है कि किसी भी इंसान की बॉडी के अराउंड एक ऐसा स्पेस रखना जिसमे किसी दुसरे को एंटर नहीं करना चाहिए.

 किसी इंसान के पर्सनल स्पेस में सिर्फ उसके ख़ास फ्रेंड्स और पार्टनर्स ही एंटर कर सकते है. अब जापानीज़ लोगो का पर्सनल स्पेस एरिया बहुत बड़ा होता है और नॉर्मली वे लोग दूसरो को यूँ ही टच नहीं करते, ग्रीटिंग करते टाइम भी नहीं. वो बस एक दुसरे के सामने बो करते यानी झुक जाते है. हगिंग तो ये लोग अवॉयड ही करते है क्योंकि उनके लिए ये उनकी पर्सनल स्पेस की ब्रीचिंग होती है.

 सिम्पली जापानीज़ लोग अपने से मतलब रखते है और जेर्नली उतने सोशियेबल नही होते जितने कि अमेरिकन्स जिनका पर्सनल स्पेस थोडा ज्यादा नेरो होता है. अमेरिकन सोसाइटी में हैण्डशेक करना एक नार्मल बात है और लोग नॉर्मली हर किसी को हग करते है चाहे वो क्लोज़ फ्रेंड हो या केजुअल. अमेरिका में ये चीज़ ना सिर्फ ओके है, बल्कि लोगो को ये अच्छा भी लगता है.

 फाइनली हमने जापान का एक्जाम्पल ये दिखाने के लिए लिया कि कैसे एक पूरा देश जहाँ अमेरिका से ज्यादा इंट्रोवर्ट्स लोग रहते है, फिर भी इतना सक्सेसफुल है. ये बताने की ज़रुरत नहीं कि जापान दुनिया के सबसे ज्यादा हार्डवर्किंग और प्रोडक्टिव देशो में से एक है. वर्ल्ड वार 2 के बाद उन्होंने कुछ ही सालो में पूरा देश नया बना दिया था.फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपनी टेक्नोलोजी से दुनिया में सबसे आगे बड़ते रहे. इससे यही प्रूव होता है कि ना सिर्फ इंट्रोवर्ट्स सक्सेसफुल और प्रोडक्टिव होते बल्कि कई बारे एक्स्त्रोवर्ट्स से ज्यादा आगे निकल सकते है. क्योंकि ये सिर्फ कल्चरल एटमोस्फीयर है जो उनके रास्ते की रुकावट बनता है.


द ओरिजिन ऑफ़ डिफ़रेंसेस

 सबसे इम्पोर्टेन्ट डिफ़रेंस शायद हमारे ब्रेन की ओवर आल सेंस्टीविटी में है. इन शोर्ट बोले तो इंट्रोवर्ट्स जो होते है उनका ब्रेन ज्यादा सेंसीटिव होता है. इसका मतलब कि ये लोग एनवायरमेंट में हो रहे किसी भी चेंज को बड़ी ईजिली नोटिस कर लेते है. और ये लोग अकेले में बोर भी नहीं होते क्योंकि इनका ब्रेन काफी एक्टिव है जो इन्हें नए-नए आईडियाज़ देता रहता है. इंट्रोवर्ट्स ज्यादा इंट्रोस्पेक्टिव होते है जो अपनी फीलिंग्स और इनर वर्ल्ड के बारे में काफी डीपली सोचते है.

 वही दूसरी तरफ एक्स्त्रोवर्ट्स अकेले में ज़ल्दी बोर हो जाते है. उनके ब्रेन को कुछ ना कुछ स्टीम्यूलेशन चाहिए होता है, उन्हें ऐसा एनवायरमेंट पसंद होता है जिसमे खूब सारा एक्शन और स्टीम्यूलेशन हो. इसलिए अगर आप एक एक्स्त्रोवर्ट्स है तो आप बड़े मजे से वाल स्ट्रीट के ब्रोकर बन सकते है. यहाँ हम एक्जाम्पल लेंगे उस मूवी का जिसका नाम था” द वोल्फ़ ऑफ़ वाल स्ट्रीट” जिसमे हम एक्स्त्रोवर्ट्स के बारे में वेस्टर्न स्टीरियोटाइप का प्रोटोटाइप देख सकते है कि एक्स्त्रोवर्ट्स ज्यादा सक्सेसफुल लोग होते है.

 इस मूवी में दिखाया गया है कि कुछ लोगो का एक ग्रुप एक रूम में काम कर रहा है, सब शाउट करके एक दुसरे से बात करते रहते है, साथ ही वे स्क्रीन में कुछ नंबर्स भी चेक कर रहे होते है, अपने कस्टमर्स को काल करके अपनी कंपनी के शेयर लेने के लिए भी कन्विंस कर रहे होते है. इस मूवी में ब्रोकर्स को काफी रिवार्ड सीकिंग और गोल ओरिएंटेड टाइप का दिखाया गया है. उन्हें मेनली बस पैसा चाहिए किसी भी कीमत पर, इसके सिवा उन्हें कोई और बात माइंड में नहीं आती.

 वही इंट्रोवर्ट्स शायद हार्डली ऐसी जगह पे काम कर पायेंगे, जहाँ इतना शोर-शराबा हो, इतने लोग हो. और अनबीयरेबल अमाउंट ऑफ़ इन्फोर्मेशन जो लगातार उनके माइंड को हिट करे, उन्हें टोटली कन्फ्यूज़ कर देगी. क्योंकि इनमे सेंस्टीविटी ज्यादा होती है इसलिए इंट्रोवर्ट लोग एक टाइम में एक ही चीज़ पर फोकस करना पसंद करते है. और बेशक वो एक्स्त्रोवर्ट्स के मुकाबले उस चीज़ को ज्यादा थोरोली करेंगे. इसलिए तो ये लोग ज्यादा प्रोडक्टिव भी होते है जब उन्हें शांत एन्वायरमेंट मिलता है जहाँ पर लेस इन्फोर्मेशन हो.

 हम इस केरेक्टरस्टिक को एक और मूवी “बार्टन फिंक” के एक्जाम्पल से समझाते है. ये मूवी कोइन ब्रदर्स की कुछ अर्ली मूवीज में से एक है. ये मूवी एक ऐसे आदमी के बारे में है जो मूवी स्क्रिप्ट लिखने के लिए लोस एन्जेल्स आता है. उसका प्रोडक्टिव प्रोसेस उस केरेक्टर से एकदम अपोजिट है जो वोल्फ ऑफ़ वाल स्ट्रीट  में दिखाया गया है. बार्टन फिंक (मूवी का हीरो) मेनली अपने होटल के रूम में बैठता है और सिर्फ एक चीज़ पे फ़ोकस करता है और वो है अपनी मूवी स्क्रिप्ट. वो अपनी मूवी के प्लाट के बारे में काफी सोचता रहता है , उसके वेरियस केरेक्टर्स के बारे में, कैसे वे एक दुसरे से इंटरएक्ट करेंगे यही सब. वो मुश्किल से रूम से निकलता है और जब जाता भी है तो बहुत देर के लिए नहीं. उस पूरे होटल में वो सिर्फ एक ही इंसान से बात करता है जो उसका सबसे क्लोज़ पडोसी होता है (ये रोल जॉन गुडमैंन ने बहुत बढ़िया से प्ले किया था)

 कहने के मतलब : एक्स्त्रोवर्ट्स हाइली स्ट्रेसफुल सिचुएशन और मल्टी- टास्किंग में अच्छे होते है. उन्हें हाई प्रेशर और स्ट्रेसफुल सिचुएशंस चाहिए भी होती है जिससे उनकी एक्शन और एक्साईटमेंट की भूख शांत होती है. वही इंट्रोवर्ट्स लोग मल्टी-टास्किंग में बिलकुल अच्छे नहीं होते है मगर वो एक टाइम में एक काम को थोरोली करते है..


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इंट्रोवर्ज़न / एक्स्त्रोवर्ज़न एज ए डाईमेंशन

 सारी बातो की एक बात ये है कि कोई भी ना तो एक्सक्ल्यूसिवली इंट्रोवर्ट होता है और ना ही एक्स्त्रोवर्ट. ये इसमें कोई केटेगरी या टाइप्स नहीं है जैसा कि पहले रिसर्चर सोचते थे मगर हाँ ये एक टू पोल स्केल फॉर्म करते है. तो आप कभी कम या ज्यादा इंट्रोवर्ट या एक्स्त्रोवर्ट हो सकते है. और सबसे बड़ी बात कि दुनिया में सबसे ज्यादा लोग इन दोनों टाइप के कहीं मिडिल में होते है. कभी वे ज्यादा शांत रहते है, सेल्फ एब्ज़ोर्ब्ड और कभी किसी दूसरी सिचुएशन में ज्यादा सोशियेबल और अटेंशन सीकर.

 इसलिए ये रिकोनाइज करना इम्पोर्टेन्ट है कि हम सब में ये दोनों एक्सट्रीम है और इससे भी ज़रूरी बात कि हमे ये सीखना चाहिए इन दोनों क्वालिटीज़ को सही मौके पे यूज़ कैसे करे. सुजेन कैन इसे” स्ट्रेचिंग योरसेल्फ” कहती है.

 सुजेन एक्सप्लेन करती है कि “स्ट्रेच योरसेल्फ” के लिए आपको अपनी ऑटोमेटिक, इनिशियेल रिसपोंसेस को रेकोगनाइज़ करना ज़रूरी है और डिफरेंटली एक्ट करने के लिए ट्राई करे. जैसे एक्जाम्पल के लिए एक पर्सन जो इंट्रोवर्जन में हाई है, वो पक्का कभी ना कभी सोशली आक्वर्ड सिचुएशन में फंस सकता है/ फंस सकती है. हालांकि क्योंकि उसमे एक्स्त्रोवर्ट क्वालिटी भी है तो ये उसके लिए अच्छा है क्योंकि इससे वो थोडा रिलेक्स भी रहेगा/ रहेगी. वही दूसरी तरफ एक इंसान जो एक्स्त्रोवर्जन में हाई है मगर अपने अंदर की इंट्रोवर्ट क्वालिटी की वजह से कभी-कभी अपने रूम में अकेले बैठकर लाइफ के बारे में शांती से सोचना उसके लिए यूज़फुल रहेगा. हम दो रियल लाइफ एक्जाम्पल देंगे कि लोग “स्ट्रेच देमसेल्व्स” के लिए क्या करे.

 अब जैसे माइक को लेते है जो एक बहुत एनरजेटिक, एक्टिव और सोशल पर्सन है. ये हमेशा लोगो को जोक्स सुनाता है, हंसाता रहता है. क्योंकि उसके दोस्त भी उससे यही एक्स्पेक्ट करते है इसलिए वो हमेशा मस्ती के मूड में रहता है. हालांकि एक बारे वो थोडा सैड मूड में था, एक तरह से बोले तो”डाउन” था क्योंकि उसकी अपनी गर्लफ्रेंड से फाईट हो गयी थी. और अब बाहर घूमने फिरने के बजाये वो अपने बेस्ट फ्रेंड के साथ बैठकर लाइफ के बारे में बाते कर रहा था.

 माइक ने रियेलाईज़ किया कि कैसे उसके फादर ने उसकी पर्सननेलिटी शेप की और कैसे वो लोगो को अपने बिहेवियर से हर्ट कर सकता है. वो अपने फ्रेंड से लाइफ के बारे जेर्नल बात करता रहा कि लाइफ का पर्पज क्या है, इसकी मीनिंग क्या है. इन शोर्ट कहे तो इम्पल्स में आकर एक्ट करने के बजाये माइक आराम से बैठकर अपने इनर वर्ल्ड के बारे में सोच रहा था जिससे उसे कई सारे आईडियाज और नए थोट मिले.

 अब जोआने को लेते है जो एक यूजअल इंट्रोवर्ट है. यहाँ उसके केरेक्टरस्टिक को डिसक्राइब करने की ज़रूरत नहीं है. हालांकि वो नॉर्मली काफी शाई और थोड़ी अपने में रहती है मगर कभीकभी उसे कुछ बिलकुल अलग करने का मन होता है कुछ “जम्प आउट ऑफ़ हर स्किन” टाइप का. एक दिन उसने हिम्मत करके एक पार्टी इनवीटेशन एक्सेप्ट कर लिया. ये स्ट्रीकली कोई पार्टी नहीं थी, ये उस तरह का इवेंट था जहाँ लोग कुछ मौज मस्ती के लिए और थोडा रिलेक्स होने के लिए आते थे.

 वैसे जोआने इस टाइप के इवेंट्स अवॉयड करती थी मगर इस बार उसका पार्टी में जाके नए लोगो से मिलने का मन कर रहा था तो वो अपनी बेस्ट फ्रेंड, सोनिया के साथ इस पार्टी में चली गयी. जैसे ही वो दोनों पार्टी में पहुंचे, सोनिया ने जोआने को अपने कुछ फ्रेंड्स से इंट्रोड्यूस कराया और खुद कहीं भीड़ में आगे निकल गयी. यूजअली ऐसी सिचुएशन में जोआने को थोडा आक्वर्ड लगता था और वो तुरन्त अपनी फ्रेंड को ढूँढने लगती थी लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ.

 उसने हिम्मत करके खुद ही कोंवरसेशन स्टार्ट कर दी. तो थोड़ी नर्वस तो थी मगर उसने अपनी घबराहट छुपाने की कोशिश नहीं की. तो इसलिए वो बोली” आज बढ़िया मौसम है, है ना?’ और जिस लड़की को उसने ये कहा उसकी तो हंसी छूट गयी. मतलब कि वो जोआने की हालत समझ गयी थी और जोआने भी शरमाई नही बल्कि थोडा रिलेक्स हो गयी थी और फिर अपनी नयी फ्रेंड से उसकी चिट-चैट शुरू हो गयी.


कनक्ल्यूजन

 ये बुक अपने गोल में काफी सक्सीड रही है: इंट्रोवर्ट्स लोगो के बारे में आज के मिथ को बस्ट करने में. अगर आपको ये समरी पसंद आई हो तो पूरी बुक पढकर देखना. ये काफी सिम्पल और इंट्रेस्टिंग लेंगुएज में लिखी गई है. अब हम आपको इस बुक से लिए गए कुछ मोस्ट इम्पोर्टेन्ट टिप्स की एक शोर्ट लिस्ट दे रहे है:

1.  इंट्रोवर्ट्स एंटी-सोशल नहीं होते.उन्हें भी लोगो के साथ घूमना फिरना पसंद होता है मगर एक्स्त्रोवर्ट्स से थोडा डिफरेंट वे में.

2.  वेस्टर्न कल्चर एक्स्त्रोवर्जन को फेवर करता है. ऐसे कल्चर में जहाँ सक्सेसफुल होने के लिए एक्स्पेक्ट किया जाता है कि आपको हाइली एनरजेटिक और सोशियेबल होना चाहिए वहां इंट्रोवर्ट्स होना काफी चेलेंजिंग होता है. हालांकि हमने कुछ ऐसे भी कल्चर का एक्जाम्पल देखा जैसे जापान,जहाँ इंट्रोवर्ट्स लोग एक्स्त्रोवर्ट्स के बराबर ही नहीं बल्कि उनसे कहीं ज्यादा सक्सेसफुल है.

3.  बायोलिजिकल ओरिजिन ऑफ़ डिफरेंसेस. ये पर्सनेलिटी ट्रेट्स ऐसे है जिनका ब्रेन में एक फर्म बेसिस होता है. हालांकि इनको परमानेंट चेंज करना ईजी नहीं है मगर टेम्प्रोरेरिली पोसिबल है.

4.  हम ना तो पूरी तरह इंट्रोवर्ट है ना एक्स्त्रोवर्ट. ये सिचुएशन पे डिपेंड करता है कि आप कब कैसे बिहेव करेंगे. हां, ये सच है कि अगर आपकी पर्सनेलिटी स्टेबल टाइप की है तो इसका मतलब ये नहीं कि आप कभी कुछ अनएक्स्पेक्टेड नहीं करेंगे. और ऐसा करने के लिए आपको ये सीखना होगा कि कैसे: 

5.  “स्ट्रेच योरसेल्फ ”-  इसका मतलब है कि आपको ऐसी सिचुएशन रीकोनाइज़ करनी होगी जब आपकी इनर सेल्फ आपको अपने नार्मल आउट सेल्फ से दूर ले जाती है.


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