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Chanakya Niti in Hindi चाणक्य नीति - परख समय पर होती है

  Rocktim Borua       मंगलवार

Chanakya Niti in Hindi चाणक्य नीति - परख समय पर होती है


Chanakya Niti in Hindi चाणक्य नीति - परख समय पर होती है


जानीयात्प्रेषणेभृत्यान् बान्धवान्व्यसनाऽऽगमे ।
मित्रं याऽऽपत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये||


 आचार्य चाणक्य समय आने पर संबंधियों की परीक्षा के संदर्भ में कहते हैं - किसी महत्त्वपूर्ण कार्य पर भेजते समय सेवक की पहचान होती है। दु:ख के समय में बन्धु-बान्धवों की, विपत्ति के समय मित्र की तथा धन नष्ट हो जाने पर पत्नी की परीक्षा होती है।

 यदि किसी विशेष अवसर पर सेवक को कहीं किसी विशेष कार्य से भेजा जाए तभी, उसकी ईमानदारी आदि की परीक्षा होती है। रोग या विपत्ति में ही सगे-सम्बन्धियों तथा मित्रों की पहचान होती है और गरीबी में, धनाभाव में पत्नी की परीक्षा होती है।

 सभी जानते हैं कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। वह अकेला नहीं रह सकता। उसे अपने हर काम को करने में सहायक, मित्र, बन्धु, सखा और परिजनों की आवश्यकता होती है किन्तु किसी भी कारणवश उसके ये सहायक उसकी जीवन-यात्रा में समय पर सहायक नहीं होते तो उस व्यक्ति का जीवन निष्फल हो जाता है। अतः सही सेवक वही जो असमय आने पर सहायक होवे। मित्र, सखा व बन्धु वही भला जो आपत्ति के समय सहायक हो, व्यसनों से मुक्ति दिलानेवाला हो और पत्नी वही सहायिका और असली जीवन-संगिनी है जो धनाभाव में भी पति का सदैव साथ दे। ऐसा न होने पर इनका होना बेकार है।

आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसंकटे।
राजद्वारे श्मशाने च यात्तिष्ठति स बान्धवः ।।

 यहां आचार्य चाणक्य बन्धु-बान्धवों, मित्रों और परिवारजनों की पहचान बताते कहते हैं कि रोग की दशा में-जब कोई बीमार होने पर, असमय शत्रु से घिर जाने राजकार्य में सहायक रूप में तथा मृत्यु पर श्मशान भूमि में ले जानेवाला व्यक्ति सच्चा मित्र और बन्धु है। देखा जाए तो सामाजिक प्राणी होने के कारण मनुष्य के सम्पर्क में अनेक लोग आ जाते हैं और अपने लाभ के कारण वह व्यक्ति में जुड़े होने का भाव भी जताते हैं किन्तु वे कितने सच्चे और सही मित्र हैं और कितने मौकापरस्त, इसका अनुभव तो समय आने पर ही हो पाता है।

 ऊपर वर्णित स्थितियां ऐसे ही अवसर का उदाहरण हैं। जब कोई व्यक्ति रोगग्रस्त हो जाता है तो उसे सहायक की आवश्यकता पड़ती है ऐसे में परिवारजन और मित्र
बन्धु जो सहायक बनते हैं वास्तव में वही सही मित्र कहे जाते हैं। शेष सब तो मुंहदेखी की बातें हैं। इसी प्रकार जब कोई व्यक्ति शत्रु से घिर जाए, उसके प्राण संकट में पड़ जाएं तो जो कोई मित्र, सगा-सम्बन्धी शत्रुओं से मुक्ति दिलाता है, प्राण-रक्षा में सहायक बनता है वह उसका मित्र व हितैषी है। शेष सब स्वार्थ के नाते ही जुड़े हैं।

 ऐसे ही राजा और सरकार की ओर से व्यक्ति पर न्यायिक मामले में अभियोग लग जाता है या किसी राजकीय कर्म में उसके समक्ष बड़ी समस्या आ जाती है तो मित्र-बन्धु (यदि वे सच्चे हैं तो) ही सहयोग करते हैं और मृत्यूपरान्त तो हम सभी जानते हैं कि व्यक्ति चार व्यक्तियों के कन्धों पर सवार होकर ही श्मशान पहुंचता है। ऐसे में मित्र-सम्बन्धियों की ही अपेक्षा होती है। ऐसे समय में ही सच्चे और सही ईमानदार मित्र की वास्तविक पहचान होती है।




 तो दोस्तों आपको आज का हमारा यह चाणक्य नीति कैसा लगा और इस नीति से आपको क्या सीखने को मिला मुझे नीचे कमेंट में जरूर बताये और इस चाणक्य नीति आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ share जरूर करें।


आपका बहुमूल्य समय देने के लिए दिल से धन्यवाद,

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