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Chanakya Niti in Hindi चाणक्य नीति - अच्छी शिक्षा किसके लिए हैं ?

  Rocktim Borua       शनिवार

Chanakya Niti in Hindi चाणक्य नीति - अच्छी शिक्षा किसके लिए हैं ?


Chanakya Niti in Hindi चाणक्य नीति - अच्छी शिक्षा किसके लिए हैं


शिक्षा: सुपात्र की


मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टास्त्रीभरणेन च।
दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति ॥


 मूर्ख शिष्य को पढ़ाने से, उपदेश देने से, दुष्ट स्त्री का भरण-पोषण करने से तथा दु:खी लोगों का साथ करने से विद्वान् व्यक्ति भी दु:खी होता है यानी कह सकते हैं कि चाहे कोई भी कितना ही समझदार क्यों न हो किन्तु मूर्ख शिष्य को पढ़ाने पर, दुष्ट स्त्री के साथ जीवन बिताने पर तथा दुःखियों-रोगियों के बीच में रहने पर विद्वान् व्यक्ति भी दु:खी हो ही जाता है। साधारण आदमी की तो बात ही क्या। अतः नीति यही कहती है कि मूर्ख शिष्य को शिक्षा नहीं देनी चाहिए। दुष्ट स्त्री से सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए बल्कि उससे दूर ही रहना चाहिए और दुःखी व्यक्तियों के बीच में नहीं रहना चाहिए।

 हो सकता है, ये बातें किसी भी व्यक्ति को साधारण या सामान्य लग सकती हैं लेकिन यदि इन पर गंभीरता से विचार किया जाए तो यह स्पष्ट है कि शिक्षा या सीख उसी व्यक्ति को देनी चाहिए जो उसका सुपात्र हो या जिसके मन में इन शिक्षाप्रद बातों को ग्रहण करने की इच्छा हो।

 आप जानते हैं कि एक बार वर्षा से भीगते बन्दर को बया (चिड़िया) ने घोंसला बनाने की शिक्षा दी लेकिन बन्दर उसकी इस सीख के योग्य नहीं था। झुंझलाए हुए बन्दर ने बया का ही घोंसला उजाड़ डाला। इसीलिए कहा गया है कि जिस व्यक्ति को किसी बात का ज्ञान न हो उसे कोई भी बात आसानी से समझाई जा सकती है पर जो अधूरा ज्ञानी है उसे तो ब्रह्मा भी नहीं समझा सकता।

 इसी संदर्भ में चाणक्य ने आगे कहा है कि मूर्ख के समान ही दुष्ट स्त्री का संग करना या उसका पालन-पोषण करना भी व्यक्ति के लिए दु:ख का कारण बन सकता है। क्योंकि जो स्त्री अपने पति के प्रति आस्थावान न हो सकी वह किसी दूसरे के लिए क्या विश्वसनीय हो सकती है? नहीं। इसी तरह दु:खी व्यक्ति जो आत्मबल से हीन हो चुका है, निराशा में डूब चुका है उसे कौन उबार सकता है। इसलिए बुद्धिमान को चाहिए कि वह मूर्ख, दुष्ट स्त्री या दुःखी व्यक्ति (तीनों से) बचकर आचरण करे।


पंचतंत्र में भी कहा गया है -


'माता यस्य गृहे नास्ति भार्या चाप्रियवादिनी।
अरण्यं तेन गन्तव्यं यथारण्यं तथा गृहम् ॥'-पञ्च0 4 | 53


 अर्थात् जिसके घर में माता न हो और स्त्री व्यभिचारिणी हो, उसे वन में चले जाना चाहिए, क्योंकि उसके लिए घर और वन दोनों समान ही हैं।

दुःखी का पालन भी सन्तापकारक ही होता है। वैद्य 'परदुःखेन तप्यते' दूसरे के दुःख से दुःखी होता है। अंतः दुःखियों के साथ व्यवहार करने से पण्डित भी दुःखी होगा।





 तो दोस्तों आपको आज का हमारा यह चाणक्य नीति कैसा लगा नीचे कमेंट करके जरूर बताये और क्या इस नीति से आपको कुछ सीखने को मिला, तो आप नीचे कमेंट में जरूर बताये। और इस आर्टिकल को अपने दोस्तों के साथ share जरूर करें।


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