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Chanakya Niti in Hindi चाणक्य नीति - विपत्ति में क्या करें ?

  Rocktim Borua       सोमवार

Chanakya Niti in Hindi चाणक्य नीति - विपत्ति में क्या करें ?


Chanakya Niti in Hindi चाणक्य नीति - विपत्ति में क्या करें ?


आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि।
आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि।।


 विपत्ति के समय के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए। धन से अधिक रक्षा पत्नी की करनी चाहिए। किन्तु अपनी रक्षा का प्रश्न सम्मुख आने पर धन और पत्नी का बलिदान भी करना पड़े तो भी नहीं चूकना चाहिए।

 संकट, दुःख में धन ही मनुष्य के काम आता है। अतः ऐसे संकट के समय में संचित धन ही काम आता है इसलिए मनुष्य को धन की रक्षा करनी चाहिए। पत्नी धन से भी बढ़कर है, अतः उसकी रक्षा धन से भी पहले करनी चाहिए। किन्तु धन एवं पत्नी से पहले तथा इन दोनों से बढ़कर अपनी रक्षा करनी चाहिए। अपनी रक्षा होने पर इनकी तथा अन्य सबकी भी रक्षा की जा सकती है।

आचार्य चाणक्य धन के महत्त्व को कम नहीं करते क्योंकि धन से व्यक्ति के अनेक कार्य सधते हैं किन्तु परिवार की भद्र महिला, स्त्री अथवा पत्नी के जीवन-सम्मान का प्रश्न सम्मुख आ जाने पर धन की परवाह नहीं करनी चाहिए। परिवार की मान-मर्यादा से ही व्यक्ति की अपनी मान-मर्यादा है। वही चली गई तो जीवन किस काम का और वह धन किस काम का ?

 पर जब व्यक्ति की स्वयं की जान पर बन आवे तो क्या धन, क्या स्त्री, सभी की चिन्ता छोड़ व्यक्ति को अपने जीवन की रक्षा करनी चाहिए। वह रहेगा तो ही पत्नी अथवा धन का उपभोग कर सकेगा वरना सब व्यर्थ ही रह जाएगा। राजपूत स्त्रियों ने जब यह अनुभव किया कि राज्य की रक्षा कर पाना या उसे बचा पाना असंभव हो गया तो उन्होंने जौहर व्रत का पालन किया और अपने प्राणों की आहुति दे दी। यही जीवन का धर्म है।


आपदर्थे धनं रक्षेच्छ्रीमतांकुतः किमापदः ।
कदाचिच्चलिता लक्ष्मी संचिताऽपि विनश्यति॥

आपत्ति काल के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए लेकिन धनवान को आपत्ति क्या करेगी अर्थात् धनवान पर आपत्ति आती ही कहां है ? तो प्रश्न उठा कि लक्ष्मी तो चंचल होती है, पता नहीं कब नष्ट हो जाए तो फिर यदि ऐसा है तो कदाचित् संचित धन भी नष्ट हो सकता है।

 बुरा समय आने पर व्यक्ति का सब कुछ नष्ट हो सकता है। लक्ष्मी स्वभाव से ही चंचल होती है। इसका कोई भरोसा नहीं कि कब साथ छोड़ जाये। इसलिए धनवान व्यक्ति को भी यह नहीं समझना चाहिए कि उस पर विपत्ति आएगी ही नहीं। दु:ख के समय के लिए कुछ धन अवश्य बचाकर रखना चाहिए।

 वस्तुतः यह श्लोक 'भोज-प्रबन्ध' में भी उद्धृत है। वहां राजा भोज और कोषाध्यक्ष की बातचीत का प्रसंग है। राजा भोज अत्यधिक दानी थे। उनकी इतनी दानशीलता को देखकर खजांची एक चरण लिख देता है तो राजा दूसरे चरण में उसका उत्तर दे देते हैं अन्त में खजांची राजा के मन्तव्य और दान के समझकर अपनी भूल स्वीकार कर लेता है।

 यहाँ अभिप्राय यह है कि धन का प्रयोग अनुचित कार्यों में किया जाय तो उसके नष्ट होने पर व्यक्ति विपन्नता को प्राप्त होता है, किन्तु सत्कार्यों में व्यय किया गया धन व्यक्ति को मान, प्रतिष्ठा और समाज में आदर का पात्र बनाता है क्योंकि धन-सम्पत्ति अस्थायी होती है इन पर क्या गुमान करना। व्यक्ति इन्हें अर्जित करता है। वास्तविक शक्ति तो प्रभु द्वारा प्रदत्त है वही स्थायी है। जबतक उसकी कृपा है तब तक ही सब कुछ है लेकिन यह निश्चय है कि धन सम्पत्ति व्यक्ति के परिश्रम, बुद्धिमत्ता और कार्यक्षमता से प्राप्त होती है और इसके चलते वह कभी नष्ट नहीं होती। श्रम, बुद्धि और कार्यक्षमता के अभाव में वह हमेशा साथ छोड़ देती है, तो मूल बात श्रम, बुद्धि की कार्य क्षमता का बने रहना है तभी लक्ष्मी भी स्थिर रह सकती है।

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आपका बहुमूल्य समय देने के लिए दिल से धन्यवाद,

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