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Discipline & Punish by Michel Foucault Book Summary in Hindi - पुराने समय में जेल में सजा कैसे देते थे ?

  Rocktim Borua       बुधवार

Discipline & Punish: The Birth of the Prison (Penguin Social Sciences) by Michel Foucault Book Summary in Hindi


Discipline & Punish by Michel Foucault Book Summary in Hindi - पुराने समय में जेल में सजा कैसे देते थे ?

Hello दोस्तों, डिसीप्लिन & पनिश (Discipline & Punish) में हम सजा और अनुशासन के इतिहास के बारे में जानेंगे। यह किताब हमें बताती है कि किस तरह से हम पुराने जमाने में अपराधियों को सजा देते थे और कैसे उसमें बदलाव आए। साथ ही हम यह भी देखेंगे कि अलग अलग संस्थाओं में अनुशासन को बनाए रखने के लिए किन किन तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है।


यह बुक समरी किसके लिए है -


-वे जो इतिहास पढ़ना पसंद करते हैं।
-वे जो यह जानना चाहते हैं कि किस तरह से जेल का जन्म हुआ था।
-वे जो पुराने समय के अनुशासन और सजा देने की प्रक्रिया के बारे में जानना चाहते हैं।


लेखक के बारे में -


 मिचेल फोकाल्ट (Michel Foucault) फ्राँस के एक फिलासफर, इतिहासकार और सोशल थियोरिस्ट थे। वे ज्ञान और ताकत के बारे में बात किया करते थे। वे बताते थे कि किस तरह से इनका इस्तेमाल पहले के समाज में हुआ करता था।


यह बुक समरी आपको क्यों पढ़नी चाहिए -


 इतिहास की मदद से हम यह जान पाते हैं कि हम आज जो कर रहे हैं, उसकी शुरुआत किस तरह से हुई थी। आज के वक्त में हम बहुत सारे नियमों के हिसाब से रहते हैं और इन्हीं नियमों की वजह से समाज में काफी शांति है। अगर कोई नियम नहीं मानता तो हम उसे सजा देते हैं। हम चाहते हैं कि हर कोई अनुशासन में रहे। लेकिन क्या आप ने कभी सोचा है कि इस सजा देने के सिस्टम की शुरुआत कैसे हुई थी? कैसे हमने समाज में अनुशासन को लागू किया था?

 यह किताब हमें इन सवालों के जवाब देती है। यह किताब हमें बताती है कि पहले के वक्त में हम किस तरह से अपराधियों को सजा देते थे, किस तरह से उन्हें टार्चर करते थे और कैसे हमने बाद में इसमें सुधार किया। साथ ही, यह किताब हमें बताती है कि अनुशासन को हमने समाज में किस तरह से लागू किया।

इस बुक समरी को पढ़कर आप सीखेंगे -


-टार्चर का इस्तेमाल किस-किस काम के लिए किया जाता था।
-सजा देने की प्रक्रिया में समय के साथ किस तरह से नए बदलाव आए।
-जेलों में अनुशासन पैदा करने के लिए कौन कौन से तरीके अपनाए जाते थे।


19वीं सदी से सजा देने के तरीके में बहुत से बदलाव आए हैं।


 2 मार्च 1757 में रोबर्ट फैक्कोइस डेमीस ने फ्राँस के राजा लुइस 15 को सबके सामने मारने की कोशिश की। इस वजह से उसे घोड़ों से बाँध कर तब तक खींचें जाने की सजा दी गई जब तक उसके हाथ पाँव उसके शरीर से अलग ना हो जाएं। लेकिन जब वे अलग नहीं हुए, तो उसे सजा देने वाले ने अपना चाकू निकाल कर डेमीस को बीच में से काट दिया।

 लेकिन इस तरह की भयानक सजा इसके बाद किसी को नहीं दी गई। 18वीं शताब्दी के बाद, सजा देने का काम सबके सामने ना कर के बंद कमरों में किया जाने लगा। इस घटना के कुछ सालों के बाद, सजा देने के नए नियम बनाए गए,जैसे लियोन फ्राउनर का नियम।

 इसके हिसाब से कैदियों का दिन 5 बजे शुरु होगा और उन्हें ढोल पीटकर उठाया जाएगा। 6 बजे से पहले उन्हें काम पर लगा दिया जाएगा और 10 बजे खाना दिया जाएगा। इसके बाद 11 बजे से उन्हें पढ़ाया जाएगा और फिर से शाम को 7 बजे काम करवाया जाएगा। इसके बाद रात में उन्हें उनके कमरे में बंद कर दिया जाएगा।

 इस तरह के नियम हमें यह दिखाते हैं कि लोगों में अब इंसानियत आ रही है और वे सजा देने के तरीके बदल रहे हैं। इससे पहले सजा के नाम पर लोगों को मारा जाता था, लेकिन अब उन्हें कैद कर के रखा जाता है जिससे उनकी आत्मा को तकलीफ होती है।

 बहुत से इतिहासकारों का कहना है कि ऐसा कर के हम हिंसा को कम कर रहे हैं जो कि एक अच्छी बात है। लेकिन लेखक का मानना है कि ऐसा करने के पीछे की वजह कुछ और ही है। अब सजा देने वाले अपराधियों के शरीर को तकलीफ देने के बारे में नहीं सोचते हैं। वे अब उनके दिल, दिमाग और विचारों को सजा दे रहे हैं।



18वीं शताब्दी में लोगों को टार्चर करना बहुत जरुरी समझा जाता था।


 सरकारों ने 18वीं शताब्दी के बाद से अपराधियों को कड़ी सजा देना बंद कर दिया। लेकिन यह बदलाव अचानक से नहीं आया। बल्कि इसके पीछे बहुत से कदम लिए गए थे। उस समय अपराधियों को बहुत टार्चर किया जाता था ताकि सरकारें उनसे जानकारी निकाल सकें। लेकिन फिलासफरों का मानना था कि टार्चर करना पुराने समय की हैवानियत है और हमें ऐसा नहीं करना चाहिए।

 लेकिन उस समय टार्चर को गलत नजर से नहीं देखा जाता था। उस समय लोगों को सिर्फ सजा देने के लिए उन्हें टार्चर नहीं किया जाता था। इसका इस्तेमाल जासूसों से जानकारी निकलवाने के लिए किया जाता था। ऐसे हालात में अगर जासूस यह कबूल कर ले कि वह किसके लिए काम कर रहा है या वह क्यों जासूसी कर रहा था, तो किसी दूसरे सबूत की जरुरत नहीं पड़ती थी। दूसरे शब्दों में टार्चर को सच की खोज करने का एक जरिया माना जाता था। लेकिन बाद में सरकारें जानकारी निकलवाने के नाम पर उन जासूसों को सजा भी देने लगी। इस तरह से टार्चर करना सजा देने का भी एक हिस्सा बन गया और जानकारी निकलवाने का भी। साथ ही इसका इस्तेमाल लोगों को काबू करने के लिए भी किया जाने लगा।

 जब भी कोई व्यक्ति नियमों को तोड़ता था या कोई अपराध करता था, तो इसे सत्ता को चुनौती देना समझा जाता था। इसलिए उन लोगों को टार्चर कर कर सभी लोगों को यह दिखाया जाता था कि सत्ता को चुनौती देने का क्या अंजाम सकता है। इस बीच वे अपराधी को जान से मारने का हुकुम भी दे सकते थे, जिससे लोगों के अंदर उनका खौफ बस जाए।

 तो इस तरह से शुरुआत में टार्चर का इस्तेमाल सिर्फ सच की खोज करने के लिए किया जाता था। लेकिन बाद में जब सरकारें खुलेआम लोगों को सजा देने लगीं, तो इसका इस्तेमाल सत्ता को बनाए रखने के काम के लिए भी किया जाने लगा।


समय के साथ सरकारें अपराधियों को सजा देने के बजाय यह पता करने लगीं कि उन्होंने अपराध क्यों किया।


 आम जनता कठोर सजा देने के नियम से बहुत परेशान थी। लोग अब माँग कर रहे थे कि सजा देने के कुछ दूसरे तरीके निकाले जाएं। सरकारें इस माँग को अब दबा नहीं पा रही थी, इसलिए उन्होंने कठोर सजा देने के बजाय दूसरे तरीके अपनाए।

 अब लोग सजा को नापने लगे कि हम लोगों को किस हद तक सजा दे सकते हैं। हमने पूछताछ करने के नए तरीके निकाले। इससे पहले हम सिर्फ यह देखते कि अपराधी ने अपराध किया है या नहीं और फिर उसे सजा दे देते थे। लेकिन अब हम यह देखने लगे कि उसने अपराध क्यों किया।

 नए सजा देने के तरीके में हम सबसे पहले यह पता लगाते थे कि अपराधी ने अगर किसी की हत्या की है, तो वो खुद को बचाने के लिए की है, बदला लेने के लिए किया है या पागलपन में आकर किया है। इसके बाद हम यह फैसला करते थे कि उसे पागलखाने में भेजना है, सजा देना है या छोड़ देना है।

 यह पता लगाने के लिए हम अब साइकोलाजिस्ट और साइकायट्रिस्ट का इस्तेमाल करने लगे। सजा देने की प्रक्रिया अब साइंटिफिक हो गई थी। अब गद्दी पर बैठने
वाला एक व्यक्ति फैसला नहीं कर सकता था बल्कि कुछ लोग साथ मिलकर फैसला करते थे जिसकी वजह से ताकत बँट गई। सजा देने का काम अब सिर्फ एक व्यक्ति नहीं कर सकता था।

 साज ही लोग अब अपराध को समाज के खिलाफ किए गए एक काम की नजर से देखते थे, ना कि सत्ता को चुनौती देने वाले काम की नजर से। अपराध करना समाज पर एक जुल्म करना माना जाने लगा और सजा का काम था लोगों को इसे करने से रोकना।



17वीं और 18वीं शताब्दी में अनुशासन रखने के तरीकों में बहुत बदलाव आए।


 17वीं और 18वीं शताब्दी में अनुशासन के मायने बदलने लगे। इस समय में कैदियों को समाज के हिसाब से रहना नहीं सिखाया जाता था, बल्कि उन पर दबाव डालकर, उन्हें इस्तेमाल कर कर , उन्हें बदला और सुधारा जाता था। इस नए अनुशासन को लागू करने के लिए चार पहलुओं को अपनाया गया।

 सबसे पहले लोगों को अलग अलग रखा जाने लगा। कैदियों को अब कैद में अलग अलग कमरे दिए गए। वे एक साथ नहीं रह सकते थे।

 इसके बाद उनके काम करने के लिए टाइमटेबल बनाया गया। उन्हें हर दिन एक ही तरह से काम करना सिखाया गया। साथ ही, वे उन्हें धर्म का ज्ञान भी देने लगे। वे उन्हें समय और अनुशासन के बारे में पढ़ाने लगे।

 तीसरा यह कि उन्हें अलग अलग काम करने के लिए दिया जाने लगा और उनके लिए अलग अलग रैंक बनाए गए। अगर किसी अपराधी को अगले रैंक पर जाना है, तो उसे सारे नियमों को मानते हुए अपना काम पूरा करना होगा। उन्हें करने के लिए अलग-अलग काम दिए जाते थे। इसमें से एक काम पढ़ने का था। वे बहुत सख्त ट्रेनिंग और एक्जाम के जरिए पास किए जाते थे। इस तरह से उनसे एक पूरी संस्था की तरह काम करवाया जाने लगा।

 अंत में अनुशासन का काम सिर्फ यह तय करना नहीं था कि एक व्यक्ति किस तरह से रहेगा और काम करेगा। इसका काम यह भी तय करना था कि वे सारे लोग एक साथ मिलकर किस तरह से काम करेंगे।

 इंडस्ट्रियल रेवेल्यूशन के समय यह आइडिया अपनाया गया था। इसमें बहुत सारे लोगों को अलग अलग पोजीशन पर रखकर काम करवाया जाता था, जिससे एक इंडस्ट्री अच्छे से चल सके। यहाँ पर सिर्फ एक व्यक्ति का अच्छे से काम करना मायने नहीं रखता था, बल्कि सबका एक साथ मिलकर काम करना मायने रखता था। जेलों में भी कुछ इस तरह का अनुशासन अपनाया गया। लोगों को उनकी सही जगह पर रखा जाता था और उसके हिसाब से उनके काम करवाया जाता था।



अनुशासन को बनाए रखने के लिए तीन तरीकों का इस्तेमाल किया जाने लगा।


 समय के साथ जब अनुशासन को लागू किया जाने लगा, तो इसके लिए हम तीन तरीकों को अपनाने लगे। इसका इस्तेमाल सिर्फ जेलों में ना कर कर, अस्पतालो में और दूसरी संस्थाओं में भी किया जाने लगा।

 इसमें से सबसे पहला तरीका था हीरैर्कियल आब्सर्वेशन। इसका मतलब है अनुशासन को बनाए रखने के लिए लोगों के ऊपर नजर रखने का काम किया जाने लगा। सेनाओं में इसका इस्तेमाल बहुत पहले से किया जाता था। यहाँ पर वे लोग पर्फेक्ट कैंप का इस्तेमाल करते थे। इस कैंप का हर एक व्यक्ति दूसरे पर नजर रखता था। अगर कोई भी नियमों को तोड़ता था, तो उसके बगल वाला व्यक्ति उसकी शिकायत करता था।

 इस तरीके को लागू करने के लिए लोग बिल्डिंग को अलग तरह से डिजाइन करने लगे। वे अब कमरों को इस तरह से बनाते थे जिससे अंदर के व्यक्ति की सारी हरकतें बाहर से दिखाई दे। अलग -अलग पोजीशन पर रहने वाले लोगों को अलग-अलग जगह पर कमरा दिया जाता था। एक कैप्टन को उस जगह पर कमरा दिया जाता था जहां से वह हर किसी के कमरे में देख सके कि कौन क्या कर रहा है। समय के साथ इसका इस्तेमाल अस्पतालों में और दूसरी बिल्डिंग्स में भी किया जाने लगा। बिल्डिंग की बनावट अब अनुशासन का एक अहम हिस्सा बन गई। पैरिस का इकोल बिल्डिंग इस तरह की व्यवस्था को दिखाता है। यहाँ पर कमरों को एक लाइन से लगाया गया था और कुछ कमरों के बाद एक आफिस का रूम पड़ता था। हर कमरे के सामने एक खिड़की लगी थी जिससे अंदर क्या हो रहा है यह बाहर से देखा जा सके।

 दूसरा तरीका में उन्होंने लोगों की काबिलियत नापने का एक स्टैंडर्ड तरीका बनाया। नंबर और ग्रेड देने के सिस्टम को लागू किया गया ताकि हम यह देख सकें कि कौन सा व्यक्ति अपना काम कितने अच्छे से कर रहा है। पढ़ाई के क्षेत्र में इसका बहुत इस्तेमाल होने लगा। अगर किसी के मार्क्स कम आ रहे हैं, तो इसका मतलब वो अनुशासन में नहीं है और इसके लिए उसे सजा दी जाएगी। सजा देने के लिए, उनसे वही एक काम तब तक करवाया जाता था जब तक वे उसमें अच्छे मार्क्स नहीं लाने लग जाते।

 अंत में अनुशासन को लागू करने के लिए हमने जाँच का सहारा लिया। अस्पतालों में इसका इस्तेमाल बहुत होता था जहां पर एक मरीज की जांच डाक्टर हमेशा करता रहता था कि उसकी सेहत में कितना सुधार हो रहा है। स्कूलों में भी स्टूडेंट्स के काम को जाँचा जाने लगा ताकि हम यह पता कर सकें कि वे अपना काम कितने अच्छे से कर रहे हैं।


अगर हमें अनुशासन बनाए रखना है, तो हमें लगातार लोगों पर नजर बनाए रखनी होगी।


 17वीं शताब्दी के अंत में यूरोप में प्लेग नाम की महामारी फैलने लगी। जिस भी शहर पर वाइयस का हमला होता था, वो शहर कुछ ही दिनों में खत्म हो जाता था। ऐसे हालात में लोगों से कहा गया कि चाहे कुछ भी हो जाए, वे अपने घर से ना निकलें। एक सरकारी कर्मचारी हर घर पर लोगों की जाँच करने के लिए जाता था।

 उस कर्मचारी का यह काम था कि वो दरवाजा खटखटाए। अगर घर वाले खिड़की से बाहर ना झाकें या किसी तरह का जवाब ना दें, तो वह कर्मचारी समझ जाता था
कि वो लोग बुरी तरह से बीमार हैं या मर गए हैं। इसके बाद वो एक रिपोर्ट बनाकर अपने ऊपर काम करने वाले अधिकारियों को देता था। इस तरह से वे लोगों पर नजर रखते थे।

 लेकिन यहां से सरकार को जाँच करने का एक तरीका पता लग गया। यहाँ तक कि इस शहर के कुछ लोग जो आगे चलकर एक नेता बने, उन लोगों ने भी लोगों में अनुशासन बनाए रखने के लिए इस तरह से जाँच करते रहने का नियम अपनाया। वे चाहते थे कि समाज में व्यवस्था बनी रहे। 1787 में इंगलैंड के एक फिलासफर जेरेमी बेंथाम ने पैनोप्टिकन नाम की एक बिल्डिंग में यह एक्पेरिमेंट किया। उन्होंने यह दिखाया कि अगर लोगों को यह एहसास दिलाया जाए कि उन पर नजर रखी जा रही है, तो वे कुछ अलग तरह से बर्ताव करते हैं।

 पैनोप्टिकन एक अंगूठी के आकार की बिल्डिंग थी जिसके बीच में एक टावर लगा हुआ था। उस बिल्डिंग के कमरों को इस तरह से डिजाइन किया गया था कि उसमें की एक खिड़ी का मुँह टावर की तरफ रहे और दूसरी खिड़की का मुँह बाहर की तरफ।

 इस तरह से उसमें रहने वाले लोगों को लगता है कि उन्हें दोनों तरफ से देखा जा रहा है। इस तरह वे कभी गलत काम नहीं करते थे भले ही उन्हें देखा जा रहा हो या नहीं। इस एक्सपेरिमेंट से यह बात सामने आई कि अगर हमें अनुशासन बनाए रखना है तो हमें लोगों पर नजर रखनी होगी।



अपराधियों की आजादी छीनने के लिए जेल बनाए गए जहाँ पर उन्हें सुधारने का काम किया जाता था।


 आज के वक्त में लोगों को अपराध करने के लिए जेल में बंद करना बहुत आम बात लगती है। लेकिन 19वीं शताब्दी की शुरुआत में लोगों को सजा के नाम पर कैद
करना बहुत सजा देने का बहुत नया तरीका था। ऐसा करने के बहुत से फायदे भी थे।

 इसमें सबसे पहले अपराधी की आजादी छिन जाती थी। इस तरह से हम लोगों को बताते कि आजाद रहने का हक सिर्फ उन लोगों को है जो समाज के नियमों को मानते हैं। जो इसे नहीं मानते , उन्हें समाज में आजाद घूमने का कोई हक नहीं है।

 अगर किसी ने बड़ा जुर्म किया है तो हम उसे लम्बे समय तक कैद कर-कर रख सकते हैं और छोटे अपराध करने वालों को कम समय तक। इस तरह से यह एक अच्छी सजा है क्योंकि यह हर तरह के अपराध के लिए अपनाई जा सकती है।

 इसके अलावा जेल में रहने वाले कैदियों को हम दुनिया से अलग कर कर सुधार भी सकते हैं। यह हमें एक मौका देता है उन्हें पढ़ाकर एक बेहतर इंसान बनाने का। साथ ही, जब एक कैदी अपनी सजा काट कर निकलता है, तो उसे अपने किए का पछतावा होता है जिससे वो फिर से अपराध नहीं करता। उसका पछतावा ही उसे एक हद तक एक बेहतर इंसान बना देता है।

 साथ ही जेलों में कैदियों से काम करवाया जाता है। लेकिन लेखक को इसके पीछे की वजह समझ में नहीं आती। जेल में हम कैदियों से जो काम करवाते हैं, उसका हमारे देश की इकोनामी पर कोई खास असर नहीं पड़ता और ना ही कैदी कुछ सीखते हैं। उनसे बस जानवरों की तरह काम करवाया जाता है जिसका कुछ फायदा नहीं होता। तो फिर ऐसे में उनमें और सड़क पर काम करने वाले एक मजदूर में अंतर क्या है? बेहतर होगा कि हम उन्हें कुछ ऐसा काम सिखाएं जिससे जेल से निकलने के बाद वे अपनी जिन्दगी को बेहतर बना सकें।


Conclusion -


 पहले के वक्त में अपराध करने को सत्ता को चुनौती देना समझा जाता था। इसलिए सरकारें अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए अपराधियों को कड़ी सजा देती थी। लेकिन बाद में लोग अपराध को समाज के खिलाफ किए गए जुल्म की तरह देखने लगे और सजा देने के तरीकों में बहुत से बदलाव आए। जेलों में और दूसरी संस्थाओं में अनुशासन बनाए रखने के लिए हमने बहुत से तरीके अपनाए और साथ ही हमें यह बात पता लगी कि जब लोगों पर नजर रखी जाती है, तो वे बेहतर तरीके से बरताव करते हैं।


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 तो दोस्तों आपको आज का हमारा यह बुक समरी आपको कैसा लगा नीचे कमेंट करके जरूर बताये और इस बुक समरी को अपने दोस्तों के साथ share जरूर करें।

आपका बहुमूल्य समय देने के लिए दिल से धन्यवाद,

Wish You All The Very Best.
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