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Chanakya Niti in Hindi चाणक्य नीति - छली मित्र को त्याग दें

  Rocktim Borua       रविवार

Chanakya Niti in Hindi चाणक्य नीति - छली मित्र को त्याग दें


Chanakya Niti in Hindi


परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम् ।
वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम् ।।


 आचार्य चाणक्य का कथन है कि पीठ पीछे काम बिगाड़नेवाले तथा सामने प्रिय बोलनेवाले ऐसे मित्र को मुंह पर दूध रखे हुए विष के घड़े के समान त्याग देना चाहिए।

 अभिप्राय यह है कि एक विष भरे घड़े के ऊपर यदि थोड़ा-सा दूध डाल दिया जाए तो फिर भी वह विष का ही घड़ा कहा जाता है। इसी प्रकार मुंह के सामने चिकनी-चुपड़ी बातें करनेवाला और पीठ पीछे काम बिगाड़नेवाला मित्र भी इस विष भरे घड़े के समान होता है।

 विष के घड़े को कोई भी व्यक्ति नहीं अपना सकता। इसलिए इस प्रकार के मित्र को त्याग देना ही उचित है। सच तो यह है कि ऐसे व्यक्ति मित्र कहे ही नहीं जा सकते। इन्हें शत्रु ही समझना चाहिए।


न विश्वसेत्कुमित्रे च मित्रे चापि न विश्वसेत् ।
कदाचित्कुपितं मित्रं सर्वं गुह्यं प्रकाशयेत् ॥


 आचार्य चाणक्य का कथन है कि कुमित्र पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए और मित्र पर भी विश्वास नहीं करना चाहिए। कभी कुपित होने पर मित्र भी आपकी गुप्त बातें सबको बता सकता है।

 अभिप्राय यह है कि दुष्ट-चुगलखोर मित्र का भूलकर विश्वास नहीं करना चाहिए।

 साथ ही कितना ही लंगोटिया यार क्यों न हो, उसे भी अपनी राज की बातें नहीं बतानी चाहिए।

 हो सकता है वह आपसे नाराज हो जाए और आपका कच्चा चिट्ठा सबके सामने खोल दे। इस पर आपको पछताना पड़ सकता है क्योंकि आपका भेद जानकर वह मित्र स्वार्थ में आपका भेद खोल देने की धमकी देकर आपको अनुचित कार्य करने के लिए विवश कर सकता है।

 अतः आचार्य चाणक्य का विश्वास है कि जिसे आप अच्छा मित्र समझते हैं उसे भी अपने रहस्यों का भेद न दें। कुछ बातों का पर्दा रखना आवश्यक है।


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