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Chanakya Niti in Hindi - ये 3 चाणक्य नीति जो व्यक्ति के जीवन के लिए बहुत इम्पोर्टेन्ट है

  Rocktim Borua       सोमवार

Hello दोस्तों, आज हम बात करने वाले हैं चाणक्य नीति के कुछ 3 नीति के बारे में। चाणक्य नीति को आप जितनी बार पढ़ेंगे, जितने अच्छे से पढ़ेंगे, उतना ही ज्यादा आप अपने बारे में सीखेंगे।


Chanakya Niti in Hindi - ये 3 चाणक्य नीति जो व्यक्ति के जीवन के लिए बहुत इम्पोर्टेन्ट है


Chanakya Niti in Hindi - ये 3 चाणक्य नीति जो व्यक्ति के जीवन के लिए बहुत इम्पोर्टेन्ट है


1. दुनिया की रीति


निर्धनं पुरुष वेश्यां प्रजा भग्नं नृपं त्यजेत् ।
खगाः वीतफलं वृक्ष भुक्त्वा चाभ्यागतो गृहम् ॥



आचार्य चाणक्य यहां प्राप्ति के बाद वस्तु के प्रति उपयोगिता ह्रास के नियम को लगाते हुए कहते हैं कि यह प्रकृति का नियम है कि पुरुष के निर्धन हो जाने पर वेश्या पुरुष को त्याग देती है। प्रजा शक्तिहीन राजा को और पक्षी फलहीन वृक्ष को त्याग देते हैं। इसी प्रकार भोजन कर लेने पर अतिथि घर को छोड़ देता है।

अभिप्राय यह है कि वेश्या अपने पुराने ग्राहक को भी उसके गरीब पड़ जाने पर छोड़ देती है। राजा जब बुरे समय में शक्तिहीन हो जाता है, तो उसकी प्रजा भी उसका साथ छोड़ देती है। वृक्ष के फल समाप्त हो जाने पर पक्षी उस वृक्ष को त्याग देते हैं। घर में भोजन की इच्छा से आया हुआ कोई राहगीर भोजन कर लेने के बाद घर को छोड़कर चला जाता है। अपना उल्लू सीधा होने तक ही लोग मतलब रखते हैं। यहीं प्रकृति की उपयोगिता समाप्त हो जाने के बाद वस्तु के प्रति बदले दृष्टिकोण का संकेत है। इस संदर्भ में यहां आचार्य चाणक्य ने कुछ उदाहरण से व्यक्ति के कर्तव्य-पालन पर बल दिया है। धन के कारण वेश्या जिसे अपना प्रेमी कहती है, निर्धन होने पर उससे मुंह मोड़ लेती है।

इसी प्रकार अपमानित राजा को प्रजा त्याग देती है और सूखे ठूंठ वृक्ष से पक्षी उड़ जाते हैं। इसी प्रकार अतिथि को चाहिए कि वह भोजन करने के उपरान्त गृहस्थ का साधुवाद करके घर को त्याग दे। वहां डेरा डालने की न सोचे, नहीं तो ऐसा हो सकता है कि संकोच का त्याग करके उसे जाने के लिए कहना पड़े। उसे यह समझना चाहिए कि सम्मान की रक्षा इसी में है कि वह भोजन करने के पश्चात् स्वयं जाने के लिए आज्ञा मांग ले। यही उचित भी है।



गृहीत्वा दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति यजमानकम्।
प्राप्तविद्या गुरुं शिष्याः दग्धारण्यं मृगास्तथा ।।

यहां आचार्य चाणक्य जग की रीति पर चर्चा करते हुए कहते हैं कि दक्षिणा ले लेने पर ब्राह्मण यजमान को छोड़ देते हैं, विद्या प्राप्त कर लेनेपर शिष्य गुरु को छोड़ देते हैं और वन में आग लग जाने पर वन के पशु वन को त्याग देते हैं।
अभिप्राय यह है कि ब्राह्मण दक्षिणा लेने तक ही यजमान के पास रहता है। दक्षिणा मिल जाने पर वह यजमान को छोड़ देता है और अन्यत्र की सोचने लगता है।

शिष्य अध्ययन करने तक ही गुरु के पास रहते हैं। विद्याएं प्राप्त कर लेने पर वे गुरु को छोड़कर चले जाते हैं और जीवन कार्य के प्रति विचार करते हुए अगली योजना में लग जाते हैं।

इसी प्रकार हिरण आदि वन के पशु वन में तभी तक रहते हैं, जब तक वन हरा-भरा रहता है। यदि वन में आग लग जाए, तो पक्षी वहां रहने की संभावनाएं समाप्त जानकर अन्यत्र डेरा जमाने के विचार से उड़ जाते हैं या दौड़ लगा जाते हैं।

अर्थात् व्यक्ति किसी आश्रय या उपलब्धि-स्रोत पर तभी तक निर्भर करता है जब तक उसे वहां अपना लक्ष्य पूर्ण होता दिखलाई पड़ता है। लक्ष्य पूर्ण होने पर उपयोगिता-ह्रास का नियम लागू हो जाता है।



2. दुष्कर्मों से सचेत रहें



दुराचारी च दुर्दृष्टिर्दुराऽऽवासी च दुर्जनः ।
यन्मैत्री क्रियते पुम्भिर्नरः शीघ्र विनश्यति ॥


यहां आचार्य चाणक्य दुष्कर्म के परिणाम के प्रति सचेत करते हुए कह रहे हैं कि दुराचारी, दुष्ट स्वभाववाला, बिना किसी कारण दूसरों को हानि पहुंचानेवाला तथा दुष्ट व्यक्ति से मित्रता रखनेवाला श्रेष्ठ पुरुष भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है क्योंकि संगति का प्रभाव बिना पड़े नहीं रहता है यह उक्ति तो प्रसिद्ध है ही कि खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है।

इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति दुष्ट व्यक्तियों के साथ रहता है तो उनकी संगति का प्रभाव उस पर अवश्य पड़ेगा। दुर्जनों के संग में रहनेवाला व्यक्ति अवश्य दुःखी होगा।

इसी बात को ध्यान में रखकर तुलसीदासजी ने भी कहा है -"दुर्जन संग न देह विधाता। इससे भलो नरक का वासा॥" इसलिए व्यक्ति को चाहिए कि वह कुसंगति से बचे।



3. मित्रता बराबर की

समाने शोभते प्रीती राज्ञि सेवा च शोभते।
वाणिज्यं व्यवहारेषु स्त्री दिव्या शोभते गृहे ||

यहां आचार्य मित्रता व व्यवहार में समानता के स्तर पर शोभा का महत्त्व प्रतिपादित करते हुए कह रहे हैं कि समान स्तरवालों से ही मित्रता शोभा देती है। सेवा राजा की शोभा देती है। वैश्यों को व्यापार करना शोभा देता है। शुभ स्त्री घर की शोभा है।
अभिप्राय यह है कि मित्रता बराबरवालों से ही करनी चाहिए। सेवा राजा की ही करनी चाहिए। ऐसा करना ही इन कार्यों की शोभा है। वैश्यों की शोभा व्यापार करना है तथा घर की शोभा शुभ लक्षणोंवाली पत्नी है क्योंकि कहा गया है कि 'जाही का काम वाही को साजे, और करे तो डण्डा बाजे' यानि जिसका जो कार्य है वही करे तो ठीक वरना परिणाम सही नहीं रहता।


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