Chanakya Niti in Hindi – ये 5 चाणक्य नीति जो व्यक्ति के जीवन के लिए बहुत इम्पोर्टेन्ट है

Chanakya Niti in Hindi – Hello दोस्तों, आज हम बात करने वाले हैं चाणक्य नीति के बारे में। चाणक्य नीति को आप जितनी बार पढ़ेंगे, जितने अच्छे से पढ़ेंगे, उतना ही ज्यादा आप अपने बारे में सीखेंगे।

 

चाणक्य जी ने कभी किसी बात को डिप्लोमेटिक तरीकेसे नहीं कहा, उन्होंने कभी भी किसी की चापलुची नहीं की। जो भी बात जैसे भी थी वो बात उन्होंने लोगों के सामने लाये और उसे लोगों को सिखाने की कोशिश की।

 

हाँ कुछ लोगों को ये बातें कड़वी जरूर लगती थी, क्यूंकि सच हमेशा कड़वा ही होता है। आज मैं आपको बताने वाला हूँ चाणक्य नीति के 5 इम्पोर्टेन्ट बातें जो व्यक्ति के जीवन के लिए बहुत ही ज्यादा जरुरी है। इसलिए एक भी पॉइंट को बिना समझे न रहे –

 

Chanakya Niti in Hindi – ये 5 चाणक्य नीति जो व्यक्ति के जीवन के लिए बहुत इम्पोर्टेन्ट है

 

1. मूर्खों का त्याग करें –

 

मूर्खस्तु परिहर्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः ।

 

भिनत्ति वाक्यशूलेन अदृश्ययं कण्टकं यथा॥

 

आचार्य चाणक्य यहां नरपशु की चर्चा करते हुए कहते हैं कि मूर्ख व्यक्ति को दो पैरोंवाला पशु समझकर त्याग देना चाहिए, क्योंकि वह अपने शब्दों से शूल के समान उसी तरह भेदता रहता है, जैसे अदृश्य कांटा चुभ जाता है।

 

 आशय यह है कि मूर्ख व्यक्ति मनुष्य होते हुए भी पशु ही है। जैसे पांव में चुभा हुआ कांटा दिखाई तो नहीं पड़ता पर उसका दर्द सहन नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार मूर्ख व्यक्ति के शब्द दिखाई नहीं देते, किन्तु हृदय में शूल की तरह चुभ जाते हैं। इसलिए मूर्ख को त्याग देना ही उचित रहता है।

 

 

2. विद्या का महत्त्व पहचाने –

 

रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसंभवाः ।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ।।

 

आचार्य चाणक्य विद्या का महत्त्व प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि रूप और यौवन से सम्पन्न, उच्च कुल में उत्पन्न होकर भी विद्याहीन मनुष्य सुगन्धहीन फूल के समान होते हैं और शोभा नहीं देते।

 

आशय यह है कि मनुष्य चाहे कितना ही सुन्दर हो, जवान हो और धनी घराने में पैदा हुआ हो किन्तु यदि वह विद्याहीन है, मूर्ख है, तो उसे सम्मान नहीं मिलता। विद्या मनुष्य की सुगन्ध के समान है। जैसे सुगन्ध न होने पर किंशुक पुष्प को कोई पसन्द नहीं करता, इसी तरह अशिक्षित व्यक्ति की भी समाज में कोई इज्जत नहीं होती। अतः विद्या व्यक्ति को वास्तव में गुणी मनुष्य बनाती है।

 

 

3. श्रेष्ठता को बचाएं –

 

त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥

 

आचार्य चाणक्य यहां क्रम से श्रेष्ठता को प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि व्यक्ति को चाहिए कि कुल के लिए एक व्यक्ति को त्याग दे। ग्राम के लिए कुल को त्याग देना चाहिए । राज्य की रक्षा के लिए ग्राम को तथा आत्मरक्षा के लिए संसार को भी त्याग देना चाहिए।

 

 आशय यह है कि यदि किसी एक व्यक्ति को त्याग देने से पूरे कुल-खानदान का भला हो रहा हो, तो उस व्यक्ति को त्याग देने में कोई बुराई नहीं है। यदि कुल को त्यागने से गांव भर का भला होता हो, तो कुल को भी त्याग देना चाहिए। इसी प्रकार यदि गांव को त्यागने पर देश का भला हो, तो गांव को भी त्याग देना चाहिए। किन्तु अपना जीवन सबसे बड़ा है। यदि अपनी रक्षा के लिए सारे संसार का भी त्याग करना पड़े, तो संसार का त्याग कर देना चाहिए। जान है, तो जहान है। यही उत्तम कर्तव्य है।

 

 

4. परिश्रम से ही फल मिलता है –

 

उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम् ।
मौनेन कलहो नास्ति जागृतस्य च न भयम् ॥

 

यहां आचार्य चाणक्य आचरण की चर्चा करते हुए कहते हैं कि उद्यम से दरिद्रता तथा जप से पाप दूर होता है। मौन रहने से कलह और जागते रहने से भय नहीं होता।

 

 आशय ये है कि परिश्रम-उद्यम करने से गरीबी नष्ट होती है। अतः व्यक्ति को श्रम करना चाहिए ताकि जीवन सम्पन्न हो सके। भगवान का नाम जपने से पाप दूर होते हैं, मन और आत्मा शुद्ध होती है, शुद्ध कर्म की प्रेरणा मिलती है, व्यक्ति दुष्कर्म से दूर होता है। चुप रहने से झगड़ा नहीं बढ़ता और अप्रिय स्थितियाँ टल जाती हैं तथा जागते रहने से किसी चीज का डर नहीं रहता क्योंकि सजगता से व्यक्ति चीजों को खतरे से पूर्व ही संभाल सकता है।

 

 

5. अति का त्याग करें –

 

अति रूपेण वै सीता चातिगर्वेण रावणः ।
अतिदानाद् बलिर्बद्धो ह्यति सर्वत्र वर्जयेत् ॥

 

यहां आचार्य चाणक्य ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ के सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए कहते हैं कि अधिक सुन्दरता के कारण ही सीता का हरण हुआ था, अति घमंडी हो जाने पर रावण मारा गया तथा अत्यन्त दानी होने से राजा बलि को छला गया। इसलिए अति सभी जगह वर्जित है।

 

आशय यह है कि माता सीता जी अत्यन्त सुन्दरी थीं, इसलिए रावण उन्हें उठा ले गया। रावण को अत्यधिक घमण्ड हो गया था, अतः उसका भगवान राम के हाथों नाश हो गया और राजा बलि अति दानी थे। इसी कारण भगवान् के हाथों ठगे गए। भलाई में भी और बुराई में भी, अति दोनों में ही बुरी है।

 

 

Conclusion –

 

तो दोस्तों ये थी चाणक्य जी के द्वारा बताये गए सात ऐसी बातें जो कड़वी सच है –

 

1. मूर्खों का त्याग करें,

2. विद्या का महत्त्व पहचाने,

3. श्रेष्ठता को बचाएं,

4. परिश्रम से ही फल मिलता है,

5. अति का त्याग करें

 

 

आपको आज का ये चाणक्य नीति कैसा लगा और आप इस पांच नीति से कुछ सीख पाए या नहीं मुझे नीचे कमेंट करके जरूर बताये। चाणक्य नीति को अपने दोस्तों के साथ शेयर जरूर करें।

 

आपका बहुमूल्य समय देने के लिए दिल से धन्यवाद,

Wish You All The Very Best.

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