Chanakya Niti in Hindi – इन 6 बातों को जानना बहुत जरुरी है

Chanakya Niti in Hindi – Hello दोस्तों, आचार्य चाणक्य को कौन नहीं जानता। सिंपल शब्द में कहूं तो वे एक बहुत बड़े विद्वान् और पंडित थे, जिनके बारे में मुझे ज्यादा बोलने की जरुरत ही नहीं है। तो दोस्तों मैंने इस ब्लॉग में आपको बहुत सारे चाणक्य नीति के बारे में explain किया ही है और आज फिर से कुछ 6 अलग सा चाणक्य नीति आपके लिए लेके आया हूँ। उम्मीद करता हूँ आपको इन 6 चाणक्य नीति से लाइफ के बहुत ही इम्पोर्टेन्ट चीजें सीखने को मिलें।

 

 

Chanakya Niti in Hindi – इन 6 बातों को जानना बहुत जरुरी है

 

 

इनसे सदा बचें

आचार्य चाणक्य उन चीजों के बारे में बताते हुए कहते हैं की इन चीजों से व्यक्ति को सदैव हानि ही होती है। उनका कहना है कि दुष्टों के गांव में रहना, कुलहीन की सेवा, कुभोजन, कर्कशा पत्नी, मूर्ख पुत्र तथा विधवा पुत्री, ये सब व्यक्ति को बिना आग के जला डालते हैं।

 

मतलब ये सब बातें व्यक्ति को भारी दुःख देती हैं – यदि दुष्टों (लम्पटों) के बीच में रहना पड़े, नीच खानदान वाले की सेवा करनी पड़े, घर में झगड़ालू-कर्कशा पत्नी हो, पुत्र मूर्ख हैं, पढ़े-लिखे नहीं, बेटी विधवा हो जाए – ये सारे दु:ख बिना आग के ही व्यक्ति को अन्दर-ही-अन्दर से जला डालते हैं।

 

 

इनसे सुख मिलता है

 

आचार्य चाणक्य जी व्यक्ति को दु:खों में शांतिदायी वस्तुओं की चर्चा करते हुए कहते हैं कि सांसारिक ताप से जलते हुए लोगों को तीन ही चीजें आराम दे सकती हैं सन्तान, पत्नी तथा सज्जनों की संगति ।

 

मतलब अपने बच्चे, पतिव्रता पत्नी तथा अच्छे लोगों का साथ, ये तीन चीजें बड़े काम की हैं।

 

व्यक्ति जब काम-काज से थककर निढाल हो जाता है, तब ये ही तीन चीजें उसे शान्ति देती हैं। क्योंकि प्राय: देखा जाता है कि आदमी बाहर के संघर्षों से जूझता हुआ, दिन भर के परिश्रम से थका-मांदा जब शाम को घर लौटता है तो अपनी संतान को देखते ही सारी थकावट, पीड़ा और मानसिक व्यथा को भूलकर स्वस्थ, शान्त और सन्तुलित हो जाता है।

 

इसी प्रकार पति के घर आने पर जब मुस्कुराती हुई पत्नी उसका स्वागत करती है, अपनी सुमधुर वाणी से उसका हाल पूछती है, जलपान से उसको तृप्त एवं सन्तुष्ट करती है तो आदमी अपनी सारी परेशानी भूल जाता है।

 

और इसी तरह जब कोई महापुरुष किसी असह्य दुःख से सन्तप्त व्यक्ति को ज्ञानोपदेश देता है तो उसके प्रभाव से वह भी शान्त और संयत हो जाता है। इस प्रकार आज्ञाकारी सन्तान, पतिव्रता स्त्री और साधु संग मनुष्य को सुख देनेवाले साधन हैं। व्यक्ति के जीवन में इनका बड़ा महत्त्व है।

 

 

निर्धनता अभिशाप है

 

निर्धनता को अभिशाप मानते हुए आचार्य चाणक्य जी कहते हैं कि पुत्रहीन के लिए घर सूना हो जाता है, जिसके भाई न हों उसके लिए दिशाएं सूनी हो जाती हैं, मूर्ख का हृदय सूना होता है, किन्तु निर्धन का सब कुछ सूना हो जाता है।

 

मतलब जिस व्यक्ति का एक भी पुत्र न हो, उसे अपना घर एकदम सूना लगता है। जिसका कोई भाई न हो उसे सारी दिशाएं सूनी लगती हैं। मूर्ख व्यक्ति को भले-बुरे का कोई ज्ञान नहीं होता; उसके पास हृदय नाम की कोई चीज नहीं होती। किन्तु एक गरीब के लिए तो घर, दिशाएं, हृदय, सारा संसार ही सूना हो जाता है, इसलिए गरीबी एक अभिशाप है। और लोगों को हमेशा गरीबी से ऊपर उठने की कोशिश करना चाहिए।

 

 

कब अकेले कब साथ रहना चाहिए

 

आचार्य चाणक्य जी कहते है एकान्त में मन के एकाग्रचित्त होने के लिए क्या क्या करना होगा – तप अकेले में करना उचित होता है, पढ़ने में दो, गाने में तीन, जाते समय चार, खेत में पांच व्यक्ति तथा युद्ध में अनेक व्यक्ति होने चाहिए।

 

मतलब तपस्या करने में व्यक्ति को अकेला रहना चाहिए। पढ़ते समय दो लोगों का एक साथ पढ़ना उचित है। गाना गाते समय तीन का साथ अच्छा रहता है। कहीं जाते समय यदि पैदल जा रहे हों, तो चार लोग अच्छे रहते हैं। खेत में काम करते समय पांच लोग अच्छी तरह करते हैं। किन्तु युद्ध में जितने अधिक लोग (सेना) हों, उतना ही अच्छा है।

 

 

जिनका उपयोग नहीं उनका कोई लाभ नहीं

 

आचार्य चाणक्य जी वस्तु की उपयोगिता की चर्चा करते हुए कहते हैं कि उस गाय से क्या करना, जो न तो दूध देती है और न गाभिन होती है। इसी तरह उस पुत्र के जन्म लेने से क्या लाभ, जो न विद्वान् हो और न ईश्वर का भक्त हो।

 

मतलब जो गाय न तो दूध देती है और न गाभिन ही होती है, ऐसी गाय का होना या न होना बराबर ही है। ऐसी गाय को पालना बेकार ही होता है। इसी तरह जो पुत्र न तो विद्वान् हो और न भक्त हो, उस पुत्र का होना या न होना बराबर है।

 

 

पतिव्रता ही पत्नी है

 

आचार्य चाणक्य जी पत्नी के स्वरूप की चर्चा करते हुए कहते हैं कि वही पत्नी है, जो पवित्र और कुशल हो। वही पत्नी है, जो पतिव्रता हो। वही पत्नी है, जिसे अपने पति से प्रीति हो। वही पत्नी है, जो पति से सत्य बोले।

 

मतलब जिसका आचरण पवित्र हो, कुशल गृहिणी हो, जो पतिव्रता हो, जो अपने पति से सच्चा प्रेम करे और उससे कभी झूठ न बोले, वही स्त्री पत्नी कहलाने योग्य है। जिस स्त्री में ये गुण नहीं होते, उसे पत्नी नहीं कहा जा सकता।

 

मतलब आदर्श पत्नी वही है जो मन, वचन तथा कर्म से पवित्र हो, उसके गुणों का गहन विवेचन करते हुए बताया गया है कि शरीर और अन्त:करण से शुद्ध, आचार-विचार स्वच्छ, गृहकार्यों यथा भोजन, पीसना, कातना, धोना, सीना-पिरोना और साज-सज्जा आदि में निपुण, मन, वचन और शरीर से पति में अनुरक्त और पति को प्रसन्न करना ही अपना कर्तव्य-कर्म माननेवाली, निरन्तर सत्य बोलनेवाली; कभी हंसी-मजाक में भी ऐसी कोई बात नहीं करनेवाली जिससे थोड़ा भी संदेह पैदा होता हो, वही घर स्वर्ग होगा वरना समझिए कि वह इन गुणों के अभाव में घर नहीं नरक है।

 

 

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