Chanakya Niti in Hindi – ये 6 काम जो व्यक्ति के जीवन के लिए बहुत जरुरी है

Chanakya Niti in Hindi – Hello दोस्तों, आज हम बात करने वाले हैं चाणक्य नीति के बारे में। दोस्तों चाणक्य नीति को आप जितनी बार पढ़ेंगे, जितने अच्छे से पढ़ेंगे, उतना ही ज्यादा आप अपने बारे में सीखेंगे। चाणक्य जी ने कभी किसी बात को डिप्लोमेटिक तरीकेसे नहीं कहा, उन्होंने कभी भी किसी की चापलुची नहीं की। जो भी बात जैसे भी थी वो बात उन्होंने लोगों के सामने लाये और उसे लोगों को सिखाने की कोशिश की। 

 

हाँ कुछ लोगों को ये बातें कड़वी जरूर लगती थी, क्यूंकि सच हमेशा कड़वा ही होता है। आज मैं आपको बताने वाला हूँ चाणक्य नीति के 6 सबसे इम्पोर्टेन्ट बातें जो व्यक्ति के जीवन के लिए बहुत ही ज्यादा जरुरी है।

 

चाणक्य जी एक योग्य शिक्षक होने के साथ साथ एक कुशल अर्थशास्त्री भी थे। इसके अतिरिक्त चाणक्य को विभिन्न विषयों की गहरी जानकारी थी। यही वजह थी कि चाणक्य के पास हर उस समस्या का हल था जिससे आज का मनुष्य नित्य दो-चार होता रहता है। चाणक्य जी एक ऐसे व्यक्ति थे जिसने अपने बल पर एक साधारण लड़के को एक राजा बना दिया। उन्होंने नंदवंश का नाश करके चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा बनाया। तो ये कितनी इंटेलिजेंट होंगे आप सोच सकते हैं।

 

 

Chanakya Niti in Hindi – ये 6 चाणक्य नीति जो व्यक्ति के जीवन के लिए सबसे इम्पोर्टेन्ट है

 

 

Chanakya Niti in Hindi #1: वाणी में मधुरता लाएं

 

को हि भारः समर्थानां किं दूर व्यवसायिनाम् ।
को विदेश सुविद्यानां को परः प्रियवादिनाम् ।।

 

आचार्य चाणक्य यहां मधुरभाषिता को व्यक्तित्व का महत्त्वपूर्ण गुण बताते हुए कहते हैं कि सामर्थ्यवान व्यक्ति को कोई वस्तु भारी नहीं होती। व्यापारियों के लिए कोई जगह दूर नहीं होती। विद्वान् के लिए कहीं विदेश नहीं होता। मधुर बोलनेवाले का कोई पराया नहीं होता।

अभिप्राय यह है कि समर्थ व्यक्ति के लिए कौन-सी वस्तु भी भारी होती है। वह अपनी सामर्थ्य के बल पर कुछ भी कर सकता है। व्यापारियों के लिए दूरी क्या? वह वस्तु-व्यापार के लिए कहीं भी जा सकता है। विद्वान् के लिए कोई-सा देश विदेश नहीं क्योंकि अपने ज्ञान से वह सभी जगह अपने लिए वातावरण बना लेगा। मधुर बोलनेवाले व्यक्ति के लिए कोई पराया नहीं क्योंकि मधुरभाषिता से वह सबको अपना बना लेता है।

 

 

Chanakya Niti in Hindi for Success #2: गुणवान एक भी पर्याप्त है

 

एकेनापि सुवर्ण पुष्पितेन सुगन्धिना ।
वसितं तद्वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा ॥

 

आचार्य चाणक्य कहते हैं कि गुणवान एक भी अपने गुणों का विस्तार करके नाम कमा लेता है। उनका कहना है कि वन में सुन्दर खिले हुए फूलोंवाला एक ही वृक्ष अपनी सुगन्ध से सारे वन को सुगन्धित कर देता है। इसी प्रकार एक ही सुपुत्र सारे कुल का नाम ऊंचा कर देता है।

आशय यह है कि यदि वन में कहीं पर एक ही वृक्ष में भी सुन्दर फूल खिले हों, तो उसकी सुगन्ध से सारा वन महक उठता है। इसी तरह एक ही सपूत सारे वंश का नाम अपने गुणों से उज्ज्वल कर देता है। क्योंकि कोई भी वंश गुणी पुत्रों से ही ऊंचा उठता है इसलिए अनेक गुणहीन पुत्रों की अपेक्षा एक गुणवान पुत्र ही पर्याप्त है इसीलिए आज के परिवार नियोजन के सन्दर्भ में अनेक बच्चों की जगह एक ही अच्छे बच्चे का होना अधिक सुखकर माना जाता है।

 

एकेन शुष्कवृक्षण दह्यमानेन वह्निना।
दह्यते तद्वनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं यथा॥

 

आचार्य चाणक्य गुणवत्ता को प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि एक ही सूखे वृक्ष में आग लगने पर सारा वन जल जाता है। इसी प्रकार एक ही कुपुत्र सारे कुल को बदनाम कर देता है।

आशय यह है कि वन में यदि एक भी वृक्ष सूखा हुआ हो, तो उसमें शीघ्र आग लग जाती है, और उस वृक्ष की आग से वह सारा वन जलकर राख हो जाता है।

ठीक इसी तरह यदि कुल में एक भी कपूत पैदा हो जाता है, तो वह सारे कुल को बदनाम कर देता है। अतः सद्गृहस्थ को चाहिए कि सन्तान को मर्यादा में रखे और उनमें सद्गुण पैदा करने का प्रयास करे।

 

 

एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्ते च साधुना।
आह्वादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी ॥

 

यहां भी आचार्य चाणक्य गुणवान के अकेले होने पर भी बहुसंख्य की अपेक्षा कमतरों की सार्थकता प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार अकेला चन्द्रमा रात की शोभा बढ़ा देता है, ठीक उसी प्रकार एक ही विद्वान् सज्जन पुत्र कुल को आह्लादित करता है।

अभिप्राय यह है कि एक अकेला चन्द्रमा रात के सारे अंधेरे को दूर करके सारी दुनिया को अपने प्रकाश से जगमगा देता है। इसी तरह पुत्र एक ही हो, किन्तु गुणवान हो तो सारे कुल के नाम को रोशन कर देता है।

इसलिए अच्छे स्वभाव का एक पुत्र सारे वंश का नाम रोशन कर देता है और परिवार के सदस्यों को आनन्दित कर देता है, क्योंकि उसके कारण वे अपने वंश पर गर्व और गौरव अनुभव करने लगते हैं। अंधियारी रात किसी को नहीं सुहाती, इसी प्रकार कुपुत्र भी कुल को नहीं सुहाता। वह कुल का नाम डुबानेवाला होता है।

 

किं जातैर्बहुभिः पुत्रैः शोकसन्तापकारकैः।
वरमेकः कुलावलम्बो यत्र विश्राम्यते कुलम् ॥

 

यहां भी आचार्य चाणक्य गुणवान एक ही पुत्र की पर्याप्तता प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि शोक और सन्ताप उत्पन्न करनेवाले अनेक पुत्रों के पैदा होने से क्या लाभ! कुल को सहारा देनेवाला एक ही पुत्र श्रेष्ठ है, जिसके सहारे सारा कुल विश्राम करता है।

आशय है कि अनेक अवगुणी पुत्रों के होने से कोई लाभ नहीं । उनके पैदा होने से सबको दुःख ही होता है, किन्तु कुल को सहारा देनेवाला, उसका नाम ऊंचा करनेवाला एक ही पुत्र अच्छा है। ऐसे पुत्र से कुल अपने को धन्य समझता है।

 

Chanakya Niti in Hindi #3: माता-पिता भी अपना दायित्व समझें

 

लालयेत् पंचवर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत् ।
प्राप्ते षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत् ॥

 

यहां आचार्य चाणक्य पुत्र-पालन में माता-पिता के दायित्व को प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि पुत्र का पांच वर्ष तक लालन करे। दस वर्ष तक ताड़न करे। सोलहवां वर्ष लग जाने पर उसके साथ मित्र के समान व्यवहार करना चाहिए।

आशय यह है कि पांच वर्ष की अवस्था तक ही पुत्र के साथ लाड़-प्यार करना चाहिए, इसके बाद दस वर्षों तक, अर्थात् पन्द्रह वर्ष की अवस्था तक उसे कठोर अनुशासन में रखना चाहिए। किन्तु जब पुत्र पन्द्रह वर्ष की अवस्था पूरी करके सोलहवें में प्रवेश कर जाए, तो वह वयस्क हो जाता है। फिर उसके साथ एक मित्र की तरह सम्मान का व्यवहार करना चाहिए।

 

 

Chanakya Niti in Hindi #4: समय की सूझ

 

उपसर्गेऽन्यचक्रे च दुर्भिक्षे च भयावहे ।

असाधुजनसम्पर्के पलायति स जीवति ॥

 

आचार्य चाणक्य यहां समय की सूझ की चर्चा करते हुए कहते हैं – उपद्रव या लड़ाई हो जाने पर, भयंकर अकाल पड़ जाने पर और दुष्टों का साथ मिलने पर भागजाने वाला व्यक्ति ही जीता है।

आशय यह है कि कहीं पर भी अन्य लोगों के बीच में लड़ाई-झगड़ा, दंगा-फसाद हो जाने पर, भयंकर अकाल पड़ जाने पर और दुष्ट लोगों के सम्पर्क में आ जाने पर उस स्थान को छोड़कर भाग खड़ा होनेवाला व्यक्ति अपने को बचा लेता है। ऐसी जगहों से भाग जाना ही सबसे बड़ी समझदारी है।

 

 

Chanakya Niti in Hindi #5: जीवन की निष्फलता

 

धर्मार्थकाममोक्षेषु यस्यैकोऽपि न विद्यते।

जन्म जन्मानि मर्त्येषु मरणं तस्य केवलम् ॥

 

यहां आचार्य जीवन की निरर्थकता की चर्चा करते हुए कहते हैं कि जिस मनुष्य को धर्म, धन, काम-भोग, मोक्ष में से एक भी वस्तु नहीं मिल पाती, उसका जन्म केवल मरने के लिए ही होता है।

आशय यह है कि धर्म, धन, काम (भोग) तथा मोक्ष पाना मनुष्य-जीवन के चार कार्य हैं। जो व्यक्ति न तो अच्छे काम करके धर्म का संचय करता है, न धन ही कमाता है, न काम भोग आदि इच्छाओं को ही पूरा कर पाता है और न मोक्ष ही प्राप्त करता है, उसका जीना या मरना एक समान है। वह जैसा इस दुनिया में आता है, वैसा ही यहां से चला जाता है। उसका जीवन निरर्थक है।

 

 

Chanakya Niti #6: लक्ष्मी का वास कहाँ हैं ?

 

मूर्खाः यत्र न पूज्यन्ते धान्यं यत्र सुसंचितम् ।
दाम्पत्योः कलहो नास्ति तत्र श्री स्वयमागता ॥

 

आचार्य चाणक्य यहां विद्वानों एवं स्त्री के सम्मान में खुशहाली एवं शांति की स्थिति का प्रतिपादन करते हुए कहते हैं कि जहां मूर्खों का सम्मान नहीं होता, अन्न का भण्डार भरा रहता है और पति-पत्नी में कलह नहीं हो, वहां लक्ष्मी स्वयं आती है।

आशय यह है कि जिन घरों में कोई भी व्यक्ति मूर्ख नहीं होता, अनाज-खाद्य पदार्थ आदि के भण्डार भरे रहते हैं तथा पति-पत्नी में आपस में कभी लड़ाई-झगड़ा, मनमुटाव नहीं रहता। ऐसे घरों में सुख-शान्ति, धन-सम्पत्ति आदि सदा बनी रहती है।

इसीलिए यह कहा जा सकता है कि यदि देश की समृद्धि और देशवासियों की सन्तुष्टि अभीष्ट है तो मूर्खों के स्थान पर गुणवान् व्यक्तियों को आदर देना चाहिए।

बुरे दिनों के लिए अन्न का भण्डारण करना चाहिए तथा घर-गृहस्थ में वाद-विवाद का वातावरण नहीं बनने देना चाहिए।

जब विद्वानों का आदर और मूर्खों का तिरस्कार होगा, अन्न की प्रचुरता होगी तथा पति-पत्नी में सद्भाव होगा तो गृहस्थों के घरों अथवा देश में सम्पत्ति उत्तरोत्तर बढ़ती ही जाएगी – इसमें सन्देह नहीं हो सकता और यही आचरण व्यक्ति और देश को समुन्नत करने में सहायक होगा।

 

 

Conclusion –

तो आज आपने चाणक्य नीति से सीखा की – Chanakya Niti in Hindi

 

1 – चाणक्य जी कहते है वाणी में हमेशा मधुरता होना चाहिए।

2 – चाणक्य जी कहते है गुणवान बनो। क्यूंकि गुणवान एक ही पर्याप्त है।

3 – चाणक्य जी कहते है माता-पिता का दायित्व क्या है अपने बच्चे के लिए।

4 – चाणक्य जी कहते है कि कौनसे समय में क्या करना उचित है उसका पूरा ज्ञान आपको होना चाहिए।

5 – चाणक्य जी कहते है कि आपको धर्म, धन, काम-भोग, मोक्ष के ऊपर सबसे ज्यादा ध्यान देना चाहिए।

6 – लास्ट में चाणक्य जी कहते है कि माता लक्ष्मी का वास कहाँ है। मुर्ख मत बनो, लड़ाई-झगड़ा या मनमुटाव नहीं होना चाहिए और बुरे दिनों के लिए अन्न का भंडार भरा होना चाहिए। अन्यथा इसके विपरीत लक्ष्मी माँ का वास कभी नहीं होगा आपके घर में।

 

आपको आज का ये चाणक्य नीति (Chanakya Niti in Hindi) कैसा लगा और आप इस सात नीति से कुछ सीख पाए या नहीं मुझे नीचे कमेंट करके जरूर बताये। चाणक्य नीति (Chanakya Niti in Hindi) को अपने दोस्तों के साथ शेयर जरूर करें।

 

आपका बहुमूल्य समय देने के लिए दिल से धन्यवाद,

Wish You All The Very Best.

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