Chanakya Niti in Hindi – सज्जनों का सम्मान करें

Chanakya Niti in Hindi – सज्जनों का सम्मान करें

 

प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः ।
सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः ॥

 

यहां आचार्य चाणक्य परिस्थितिवश आचरण में आनेवाले परिवर्तन के स्तर और स्थिति को इंगित करते हुए धीर गंभीर व्यक्ति की श्रेष्ठता प्रतिपादित करते हुए कहते हैं कि सागर की तुलना में धीर-गम्भीर पुरुष को श्रेष्ठतर माना जाना चाहिए क्योंकि जिस सागर को लोग इतना गम्भीर समझते हैं, प्रलय आने पर वह भी अपनी मर्यादा भूल जाता है और किनारों को तोड़कर जल-थल एक कर देता है;

 

 परन्तु साधु अथवा श्रेष्ठ व्यक्ति संकटों का पहाड़ टूटने पर भी श्रेष्ठ मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करता। अतः साधु पुरुष सागर से भी महान् होता है।

 

 यूँ तो मर्यादापालन के लिए सागर आदर्श माना जाता है, वर्षा में उफनती नदियों को अपने में समेटता हुआ भी सागर अपनी सीमा नहीं तोड़ता, परन्तु प्रलय आने पर उसी सागर का जल किनारों को तोड़ता हुआ सारी धरती को ही जलमय कर देता है।

 

 सागर प्रलयकाल में अपनी मर्यादा को सुरक्षित नहीं रख पाता; किन्तु इसके विपरीत साधु पुरुष प्राणों का संकट उपस्थित होने पर भी अपने चरित्र की उदात्तता का परित्याग नहीं करते । वे प्रत्येक अवस्था में अपनी मर्यादा की रक्षा करते हैं। इसलिए सन्त पुरुष समुद्र से भी अधिक गम्भीर माने हैं और उनका सम्मान ही करना चाहिए।

 

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