Chanakya Niti in Hindi – सुख क्या है और किसको मिलता है सुख ?

Chanakya Niti in Hindi – आचार्य चाणक्य जी यहाँ बताते है कि सुख क्या है और किसको मिलता है सुख ?

जीवन-सुख में ही स्वर्ग है –

यस्य पुत्रो वशीभूतो भार्या छन्दानुगामिनी।
विभवे यस्य सन्तुष्टिस्तस्य स्वर्ग इहैव हि।।

 आचार्य चाणक्य का कथन है कि जिसका पुत्र वशीभूत हो, पत्नी वेदों के मार्ग पर चलनेवाली हो और जो अपने वैभव से सन्तुष्ट हो, उसके लिए यहीं स्वर्ग है।
 अभिप्राय यह है कि जिस मनुष्य का पुत्र आज्ञाकारी होता है, सब प्रकार से कहने में होता है पत्नी धार्मिक और उत्तम चाल-चलनवाली होती है, सद्गृहिणी होती है तथा जो अपने पास जितनी भी धन-सम्पत्ति है, उसी में खुश रहता है, सन्तुष्ट रहता है, ऐसे व्यक्ति को इसी संसार में स्वर्ग का सुख प्राप्त होता है। उसके लिए पृथ्वी में ही स्वर्ग हो जाता है।
 क्योंकि पुत्र का आज्ञापालक होना, स्त्री का पतिव्रता होना और मनुष्य का धन के प्रति लोभ-लालच न रखना अथवा मन में सन्तोष बनाए रखना ही स्वर्ग के मिलनेवाले सुख के समान है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि स्वर्ग अनेक शुभ अथवा पुण्य कार्यों के अर्जित करने से ही प्राप्त होता है। उसी प्रकार इस संसार में ये तीनों सुख भी मनुष्य को पुण्य कर्मों के सुफल रूप ही प्राप्त होते हैं। जिस व्यक्ति को ये तीनों सुख प्राप्त हों, उसे बहुत भाग्यशाली समझना चाहिए।

सार्थकता में ही सम्बन्ध का सुख –

ते पुत्रा ये पितुर्भक्ताः सः पिता यस्तु पोषकः।
तन्मित्रम् यत्र विश्वासः सा भार्या या निवृतिः ।।

 आचार्य चाणक्य का कथन है कि पुत्र वही है, जो पिता का भक्त है। पिता वही है, जो पोषक है, मित्र वही है, जो विश्वासपात्र हो। पत्नी वही है, जो हृदय को आनन्दित करे।
 अर्थात् पिता की आज्ञा को माननेवाला और सेवा करनेवाला ही पुत्र कहा जाता है। अपने बच्चों का सही पालन-पोषण, देख-रेख करनेवाला और उन्हें उचित शिक्षा देकर योग्य बनानेवाला व्यक्ति ही सच्चे अर्थ में पिता है। जिस पर विश्वास हो, जो विश्वासघात न करें, वही सच्चा मित्र होता है। पति को कभी दुःखी न करनेवाली तथा सदा उसके सुख का ध्यान रखनेवाली ही पत्नी कही जाती है।
 अभिप्राय यह है कि इस संसार में सम्बन्ध तो अनेक प्रकार के हैं, परन्तु निकट के सम्बन्ध के रूप में पिता, पुत्र, माता और पत्नी ही माने जाते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि सन्तान वही जो माता पिता की सेवा करे वरना वह सन्तान व्यर्थ है। इसी प्रकार अपनी सन्तान और अपने परिवार का भरण-पोषण करनेवाला व्यक्ति ही पिता कहला सकता है और मित्र भी ऐसे व्यक्ति को ही माना जा सकता है जिस पर कभी भी किसी प्रकार से अविश्वास न किया जा सके। जो सदा विश्वासी रहे, अपने अनुकूल आचरण से पति को सुख देनेवाली स्त्री ही सच्चे अर्थों में पत्नी कहला सकती है। इसका अर्थ यह है कि नाम और सम्बन्धों के बहाने एक-दूसरे से जुड़े रहने में कोई सार नहीं, सम्बन्धों की वास्तविकता तो तभी तक है जब सब अपने कर्तव्य का पालन करते हुए एक-दूसरे को सुखी बनाने का प्रयत्न करें और सम्बन्ध की वास्तविकता का सदा निर्वाह करें।
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