Comfort Zone क्या है | What is Comfort Zone in Hindi

Hello दोस्तों, क्या आप जानते हैं कम्फर्ट जोन Comfort Zone क्या है ? आज हम इसी के बारे में डिटेल में डिसकस करेंगे। अगर आपको सच में जानना है की कम्फर्ट जोन क्या होता है तो ये आर्टिकल पूरा जरूर पढ़ें। तो बिना देरी के चलिए शुरू करते हैं –

 

Comfort Zone क्या है | What is Comfort Zone in Hindi

 

सबसे पहले एक छोटी सी कहानी से शुरू करते हैं –

“फुटपाथ में एक कुत्ता बैठा हुआ था और वो रो रहा होता है और उसके पास में ही एक भिखारी बैठा होता है और उससे आकरके कोई आदमी पूछता है कि यार ये कुत्ता रोता क्यूँ रहते पुरे टाइम।

तो इस सवाल पर वो भिखारी जवाब में कहता है की ये जो कुत्ता बैठा है, उसके नीचे एक कील पड़ी हुई है।

तो वो आदमी कहता है – अगर इनको इतना दर्द होता है तो उठता क्यूँ नहीं है इस जगह से !

तो वो दूसरा आदमी जो भिखारी है वो कहता है की अभी इनको इतना दर्द नहीं हो रहा है की वो उठ जाये।”

 

उठने का एफर्ट कौन करता है ? सोचो सोचो !

और मैं आपको बता दूँ अगर आपको नहीं पता अभी तक तो इसी को कम्फर्ट जोन बोलते हैं।

 

मतलब हमारे लाइफ में प्रॉब्लम है, अभी आपकी जो भी सिचुएशन है उससे आप सटिस्फाएड नहीं हो। फिर भी आप वही हो तो उसको कम्फर्ट जोन बोलते हैं।

 

 

कम्फर्ट जोन क्या नहीं है ?

 

अगर आप अपने करंट सिचुएशन से एक्चुअल में सटिस्फाएड हो तो उसको कम्फर्ट जोन नहीं बोलते हैं।

 

आप एक्चुअल में खुश हो उस पर्सन के साथ, या उस कंपनी में या उस जॉब में या उस बिज़नेस में या जो भी काम कर रहे हो उसमें, तो उसको कम्फर्ट जोन नहीं बोलेंगे।

 

लेकिन एक टाइम के बाद चाहे कोई भी काम हो वो हमारे लिए बोरिंग हो जाता है, तो उस वक़्त क्या करना होता है – या तो काम को बदलना होता है, या उस काम को करने की तरीके को बदलना होता है (मतलब काम वही करो लेकिन तरीका बदल दो).

 

 

कम्फर्ट जोन क्या है?

 

जैसे मान लीजिये मेरी आदत है एक काम को करने की और उसी तरीके से वही same काम करूँगा, चाहे सिचुएशन बदल गयी हो तो इसी को कम्फर्ट जोन कहेंगे।

तो ऐसा इंसान अंदर ही अंदर परेशान हो जायेगा।

लेकिन जो इंसान वक़्त या सिचुएशन के साथ बदल जाता है, वही कम्फर्ट जोन से बाहर निकल सकता है।

 

किसी महान इंसान ने कहा है – “या तो आप खुद बदल जाओ या फिर ये वक़्त आपको बदलेगा, जब आप खुद बदल जाओ तब आप उस बदलती हुई सिचुएशन या वक़्त के साथ आसानी से घुल-मिल सकते हो, लेकिन अगर वो वक़्त या सिचुएशन आपको बदलने लगे तो उसमें आपको बहुत बड़ा दर्द का सामना करना पड़ेगा। बड़ा कष्ट, बड़ा दुःख होता है।”

 

मतलब अगर आप खुद बदल जाओ तो आपको प्रॉब्लम नहीं होगी।

 

आप क्या कर रहे हो जैसे जैसे सिचुएशन चेंज हो रही है, उसके हिसाब से उसको एडॉप्ट करते चले जा रहे हो तब शुरू में तो आपको उनकंफर्टेबल लगेगा, जैसे जैसे आप बदल रहे होंगे, बिना उसको छोड़े उसमें लगे रहेंगे, करते रहेंगे तब आपको वही काम जो शुरू में बुरा लगता था, अब अच्छा लगने लगेगा।

 

शुरू में जब आप कम्फर्ट जोन से बाहर निकलते हो तो वो शार्ट टर्म में उनकंफर्टेबल होता है, लेकिन आपको ये पता होना चाहिए, इतनी इंटेलिजेंस होनी चाहिए।

 

जैसे मान लीजिये कोई ऐसा जॉब है जहाँ पर आपको बहुत ज्यादा प्रॉब्लम हो रही है, जो आपके सीनियर्स है, वो बहुत ही ज्यादा आपका torture करते हैं, एमोशनली, psychologically, उल्टा बोलते हैं, गलत तरीकेसे बोलते हैं।

तो शुरू में आप जब अपनी जॉब को चेंज करोगे, क्यूंकि 10 साल आपने उसी कंपनी में काम किया है, जैसे आप कोई नई जगह पे जाओगे, शुरू में आपको बड़ा अजीब लगेगा।

आप कहोगे यार सब कुछ नया है, क्यूंकि उस पुरानी कंपनी में आपके लिए सब कुछ फैमिलियर था और अब जब नई कंपनी में जाओगे तो वो आपके लिए उनफैमिलियर जोन है, तो वहां पे आपको बड़ा ही उनकंफर्टेबल लगेगा, लेकिन लॉन्ग टर्म में वो आपके लिए सही है।

क्यूंकि आप एक टॉक्सिक एनवायरनमेंट से बाहर निकल पा रहे हो, पहली वाली कंपनी में वो एनवायरनमेंट टॉक्सिक था, लेकिन वो आपका कम्फर्ट जोन था।

तो आपने उस कम्फर्ट जोन को छोड़ा तब शुरू में आपको बहुत अजीब लगेगा।

 

क्या आपने केसेस सुना है की – कुछ लोग है जो जेल में रहते हैं 20 – 30 साल तक जेल में रहे तो उनको जेल से प्यार हो जाता है।

जेल है वो लेकिन उससे भी प्यार हो गया है। जब वो बाहर निकल रहे होते हैं तो रो रहे होते हैं उसको देख कर।

 

ऐसा भी होता है की जो होमलेस पीपल होते हैं तो उनके लिए रहने के लिए कोई जगह नहीं होता, तो वो क्या करते हैं कोई छोटा सा क्राइम करते हैं और जेल में चले जाते हैं और जब 2-3 महीने बाद वो बाहर आते हैं, फिर छोटा सा क्राइम करके जेल में चले जाते हैं।

 

तो कहने का मतलब है ये सभी तरह की एक्साम्पल जो मैंने दिया है ये कम्फर्ट जोन है।

 

हम किसी चीज से सटिस्फाएड नहीं हैं, लेकिन फिर भी हम उसी सिचुएशन में रहे चले जा रहे हैं।

 

ना हम सिचुएशन को बदल रहे हैं, और ना ही हम खुद को बदल रहे हैं।

 

हमारे सबके लाइफ में प्रॉब्लम है, उस पर्सन के साथ, उस कंपनी के साथ, उस जॉब के साथ, फिर भी हम उसी में रहे चले जा रहे हैं इसको कम्फर्ट जोन बोलते हैं।

 

 

Conclusion

 

तो अगर आपको अगर आप अपनी करंट प्रॉब्लम या सिचुएशन से बाहर निकलना है और खुद को एक बेहतर इंसान बनाना है तो आप तभी कर सकते हैं जब आप अपनी comfort zone से बाहर निकलोगे।

मतलब एक्शन लेना होगा, बैठे रहने से कुछ नहीं होगा, उठ कर चलना होगा या दौरना होगा।

आपको आज का यह आर्टिकल कैसा लगा ?

अगर आपके मन में कुछ भी सवाल या सुझाव है तो मुझे नीचे कमेंट करके जरूर बताये।

 

आपका बहुमूल्य समय देने के लिए दिल से धन्यवाद,

Wish You All The Very Best.

 

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