Karma Yoga Book Summary in Hindi – स्वामी विवेकानंद जी के बुक कर्म योग

Karma Yoga Book Summary in Hindi – क्या आप अपने काम में थकान महसूस करते हैं या आपको अपना काम करने की इच्छा ही नहीं होती ? क्या आपको लगता है कि आपके काम की तारीफ नहीं की जाती? क्या आपको लगता है कि आप ज्यादा पहचान पाने के हकदार हैं? अगर आपका जवाब हाँ है तो ये बुक आपके लिए है. स्वामी विवेकानंद आपको अपने कर्म और ड्यूटी से प्यार करना और उस महानता को हासिल कैसे करना है ये सीखाएंगे. आप सीखेंगे कि आप कैसे अपने काम को और भी ज्यादा बेहतर तरीके से कर सकते हैं और उससे पूरी तरह संतुष्ट हो सकते हैं.

 

ये समरी किसे पढ़नी चाहिए?

 

वेतन कमाने वाले, वर्क फ़ोर्स के मेम्बेर्स, हाउसवाइफ, परिवार के कमाने वाले मेम्बेर्स, जो भी कर्म योग के बारे में सीखना चाहते हैं.

 

 

ऑथर के बारे में

 

स्वामी विवेकानंद एक महान संत और टीचर हैं. मॉडर्न दुनिया को वेदांत और योग के बारे में सिखाने वाले वो सबसे पहले इंसान हैं. उन्होंने पूरे अमेरिका और यूरोप में घूम घूम कर कई लेक्चर दिए. स्वामी विवेकानंद इस बात में विश्वास करते थे कि भगवान् की सेवा करने के लिए पहले लोगों की सेवा करना ज़रूरी है. उनकी तालीम और सोच को ना सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में बहुत महत्व दिया जाता है. उनकी सिखाई हुई बातें बहुत मूल्यवान हैं.

 

 

Karma Yoga Book Summary in Hindi

 

 

Introduction – Karma Yoga Book Summary in Hindi

 

ये बुक समरी न्यू यॉर्क में स्वामी जी द्वारा दिए गए लेक्चर्स का कलेक्शन है. स्वामीजी ने अमेरिका में ढाई साल बिताए जहां उनका बहुत स्वागत हुआ, उन्हें बहुत पसंद किया गया. उनके स्टूडेंट्स ने पैसा इक्कट्ठा किया ताकि वो एक मकान किराए पर ले सकें. वहाँ स्वामीजी रोज़. फ्री में लेक्चर दिया करते थे.

 

इस बुक समरी में उनके द्वारा कर्म योग पर दिया गया हर लेक्चर मौजूद है. इसमें आप काम यानी कर्म और ड्यूटी यानी फ़र्ज़ और कर्त्तव्य के महत्व के बारे में सीखेंगे. आप अपने काम से प्यार करना और बदले में कुछ मिलने की आशा ना करना के बारे में सीखेंगे. आप सीखेंगे कि अपने ड्यूटी को कैसे ख़ुशी से स्वीकार करना है और उसे कैसे पूरे दिल से निभाना है.

 

कर्म इन इट्स इफ़ेक्ट ओन कैरेक्टर (Karma in its effect on character) कर्म संस्कृत शब्द “कृ” से आया है. इसका मतलब होता है “करना”. कर्म का मतलब है “हर एक्शन का असर या परिणाम”. योग में कर्म का मतलब होता है। काम (work)”.

 

एक इंसान का कैरेक्टर यानी चरित्र उसके सभी एक्सपीरियंस को मिला कर बनता है. चाहे वो सुख हो या दुःख, खुशी हो या दर्द, ये सभी उसके कैरेक्टर को शेप देते हैं. ये एक्सपीरियंस उसे अज्ञानता से ज्ञान की ओर ले जाते हैं. आपके एक्शंस के पीछे असली मकसद क्या है? लोग हमेशा किसी ख़ास मकसद के लिए ही कुछ कर्म करते हैं. कुछ लोग शोहरत पाने के लिए करते, कुछ पॉवर के लिए तो कुछ धन दौलत के लिए. कुछ लोग स्वर्ग जाने के लिए करते हैं और कुछ पशच्याताप के लिए.

 

लेकिन सबसे महान और नेक कर्म होता है बस काम करना. एक्जाम्पल केलिए, कुछ लोग गरीबों की मदद और सेवा करते हैं. वो फेमस होने के लिए या अपनी पहचान बनाने के लिए ऐसा नहीं करते. वो सिर्फ़ इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें भलाई का कर्म करने में विश्वास है, उन्हें ये काम करना अच्छा लगता है. क्या एक आदमी जो काम को काम समझ कर करता है, उसे कुछ हासिल होता है? हाँ, असल में उसे ही तो सबसे ज्यादा फायदा होता है. बिना किसी निजी मकसद के किया गया कर्म मन, शरीर और आत्मा के लिए सबसे अच्छा होता है. लेकिन इसे सच में अपनी सोच और जीवन में उतारने के लिए बहुत सेल्फ कण्ट्रोल की ज़रुरत होती है.

 

सिर्फ 5 मिनट के लिए बिना किसी सेल्फिश मकसद के काम करके देखिये. ये भी आपको बहुत मुश्किल लगेगा. किसी काम के बदले में कुछ ना मिलने की सोच भी हमें परेशान कर देती है, है न? इसलिए बिना किसी सेल्फिश मकसद के काम करना आपकी असली शक्ति हो दिखाता है.

 

5 मिनट, 5 घंटे या 5 दिन बिना किसी मकसद के काम करना खुद पर सेल्फ कण्ट्रोल को साबित करती है. ऐसा करने के लिए एक स्ट्रोंग विल पॉवर और स्ट्रोंग कैरेक्टर की ज़रुरत होती है.

 

बदले में कुछ मिलने की आशा किये बिना या बिना किसी निजी स्वार्थ के ज्यादा से ज्यादा काम करने की कोशिश कीजिये. एक महान इंसान बहुत सारे अच्छे काम करता चला जाता है मानो वो अच्छे कर्मों का बीज बो रहा हो. वो हर रोज़ उसकी देखभाल करता है लेकिन घंटों उसके पास बैठ कर उसके बढ़ने और उसके फलों को हासिल करने की इच्छा नहीं करता. वो बस अपने काम में लगा रहता है, और ज्यादा अच्छे पौधे लगता जाता है.

 

अगर आप किसी की मदद करना चाहते हैं तो ये मत सोचिये कि उस इंसान का क्या रिएक्शन होगा. उसके धन्यवाद देने का इंतज़ार मत कीजिये या ये आशा मत कीजिये कि वो भी इसके बदले में आपके लिए कुछ करेगा. अगर आप अच्छा कर्म करना चाहते हैं तो बस उस पर कायम रहिये. किसी इनाम के बारे में सोचने की जगह और भी ज्यादा अच्छे कर्म करने के बारे में सोचिये.

 

अभी आप के अन्दर सिर्फ़ खुद के लिए काम करने का जोश है. लेकिन समय के साथ प्रैक्टिस करते करते आप बिना किसी स्वार्थ के काम करना सीख जाएँगे. रोज़ सेल्फ कण्ट्रोल की प्रैक्टिस कीजिये. ये बहुत जल्द ही आपकी हैबिट बन जाएगी और ये हैबिट आपका कैरेक्टर और संस्कार बन जाएगा.

 

 

इच इज़ ग्रेट इन हिज़ ओन प्लेस (Each is great in his own place)

 

हर एक इंसान का खुद के जीवन में अपना अलग रोल और आइडील्स यानी आदर्श होते हैं. कोई किसी पर अपनी सोच को थोप नहीं सकता. जो रोल आपको मिला है उसे अच्छी तरह से पूरा करने की कोशिश कीजिये. किसी और की तरह बनने की कोशिश मत कीजिये. आप अपने दिए गए रोल को पूरे मन से अच्छी तरह निभा कर खुद को सच के और करीब ले जाते हैं.

 

एक्जाम्पल के लिए, घर के बड़े को अपने पेरेंट्स, वाइफ, बच्चों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों की तरफ अपनी ड्यूटी अच्छी तरह निभानी चाहिए. उसे उनकी सभी ज़रूरतों का ध्यान रखना चाहिए और उनकी रक्षा करनी चाहिए. ये उसकी ड्यूटी है. एक सन्यासी को दुनिया पूरी तरह त्याग देना चाहिए. उसे परिवार या धन दौलत के बारे में नहीं सोचना चाहिए. उसकी ड्यूटी है भगवान् की पूजा करना, उनकी सेवा करना और उनके बारे में और भी जानने की कोशिश करना. आप उस घर के बड़े और सन्यासी को एक दूसरे का रोल अदा करने नहीं कह सकते. उन्हें अपनी अपनी ज़िम्मेदारी निभानी होगी. अपना रोल ठीक से अदा करना ही हमें महान बनाता है.

 

एक बार एक राजा था जो अपने राज्य में आने वाले हर सन्यासी से पूछा करता था ” इनमें से कौन महान है, एक सन्यासी जिसने दुनिया को त्याग दिया है या वो घर बार संभालने वाला आदमी जो इस समाज में रह कर अपनी हर ड्यूटी को पूरा करता है”?

 

कुछ ज्ञानी लोगों ने कहा सन्यासी ज्यादा महान है . राजा ने इसका सबूत माँगा. जब वो ये शर्त पूरी नहीं कर पाए तो राजा का आदेश था कि उन्हें शादी करके घर बसाना होगा. तो वहीं कुछ लोगों के कहा घर बार वाला आदमी ज्यादा महान है. जब वो इसे साबित नहीं कर पपे तो उन्हें भी शादी करके घर बसाने का आदेश दे दिया गया. फिर एक कम उम्र का सन्यासी आया जिसने कहा कि घर बार वाला आदमी और सन्यासी दोनों ही महान हैं. दोनों अपनी अपनी जगह महान हैं. राजा ने कहा “साबित करो”.

 

उस जवान सन्यासी ने कहा ” मेरे साथ एक यात्रा पर चलिए ताकि मैं इसे साबित कर सकू”. राजा अपना राज्य और सेवकों को छोड़ कर अकेले यात्रा पर चल दिए.

 

वो मीलों तक चलते रहे, चलते रहे और आखिर में एक महान राज्य में पहुंचे. उस खूबसूरत राज्य की राजकुमारी शादी के लिए एक अच्छे लड़के की तलाश कर रही थी. वो एक परफेक्ट आदमी को ढूँढने के लिए रोज़ एक समारोह का आयोजन करती.

 

वो राजकुमारी बहुर सुन्दर थी. वो जिसे भी पति के रूप में चुनती, उसे समय आने पर उसके साथ राज्य पर शासन करने का सौभाग्य मिलता. बहुत सारे लोग आए लेकिन राजकुमारी को जिसकी तलाश थी वो उसे नहीं मिल रहा था. उसने एक एक करके सबको रिजेक्ट कर दिया.

 

फिर एक दिन, उसने एक बहुत रूपवान सन्यासी को देखा. वो सन्यासी उस सुन्दर राज्य को बस एक नज़र देखने के लिए रुका था लेकिन राजकुमार को उससे प्यार हो गया.

 

वो अपने राज सिंहासन से उतर कर उसके पास गई और उसके गले में माला डाल दी जिसका मतलब है कि उसने सन्यासी को अपने पति के रूप में चुन लिया है.

 

वो सन्यासी हक्का बक्का रह गया. उसने माला उतार कर फ़ेंक दी. उसने कहा “ये क्या बकवास है”? क्या आपको दिखाई नहीं देता कि मैं एक सन्यासी हूँ. मेरे लिए शादी का कोई मतलब नहीं है.”

 

वहाँ के मंत्री ने कहा “अगर आप राजकुमारी से शादी करते हैं तो इस पूरे राज्य पर आपका शासन होगा”. लेकिन सन्यासी पर इस बात का कोई असर नहीं हुआ. वो जल्दी से मुड़ा और भागने लगा.

 

लेकिन राजकुमारी इस बात को स्वीकार नहीं कर पाई. उस पर बस प्यार का भूत सवार था. उसने कहा “अगर इस आदमी से मेरी शादी नहीं हुई तो मैं मर जाऊँगी”. और वो उस सन्यासी के पीछे भागने लगी.

 

वो राजा और सन्यासी जो इस राज्य में आए थे, सब कुछ बड़े ध्यान से देख रहे थे. उन्होंने राजकुमारी और उस सन्यासी का पीछा करना शुरू किया.

 

वो सन्यासी उस जंगल का रास्ता अच्छे से जानता था. वो बड़ी तेज़ी से उस राज्य से बाहर निकल गया और आपकी यात्रा पर आगे बढ़ने लगा.

 

उस राजकुमारी ने हर जगह देखा लेकिन वो सन्यासी उसे कहीं नज़र नहीं आया. वो बहुत थक गई थी. एक पेड़ के नीचे बैठ कर वो उस सन्यासी की याद मे आंसू बहाने लगी. वो रास्ता भटक गई थी और उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे. वो राजा और सन्यासी उसके पास गए. उन्होंने उसकी मदद करने का वादा किया.

 

लेकिन बहुत अँधेरा हो चुका था इसलिए वो सुबह होने पर ही उस जंगल से निकल सकते थे. इसलिए वो तीनों उस बड़े से पेड़ के नीचे आराम करने के लिए बैठ गए.

 

उस पेड़ पर एक नीले रंग का पक्षी अपनी बीवी और 3 बच्चों के साथ रहता था. उस नीले पक्षी ने अपने घोंसले से झाँक कर नीचे देखा और अपनी बीवी से कहा “सुनो, अब हम क्या करेंगे? हमारे यहाँ मेहमान आए हैं और हमारे पास उनके लिए आग जालाने का सामान भी नहीं है. इस कडाके की ठंड में वो ठिठुर रहे होंगे”.

 

इसलिए वो पक्षी नीचे की तरफ उड़ा और एक जलती हुई डाल को उठा लिया. वो उसे अपनी चोंच में दबा कर अपने मेहमानों के सामने रख आया. उन तीनों ने उसमें और भी डालियाँ डाल कर एक अच्छा बॉन फायर बना लिया. लेकिन अभी भी वो पक्षी चिंतित था. उसने अपनी बीवी से कहा “अब हम क्या करेंगे? हमारे पास उन्हें देने के लिए खाना नहीं है. उन्हें बहुत भूख लगी होगी”.

 

फिर उसने जो किया आप उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते, उसने खुद को ही उनके सामने पेश कर दिया. वो उस आग में कूद गया. उन तीनों ने उसे बचाने की बहुत कोशिश की लेकिन आग ने उसे भून कर रख दिया था.

 

अब उसकी बीवी ने सोचा, यहाँ तो 3 मेहमान हैं. सिर्फ एक पक्षी काफ़ी नहीं है. उसने सोचा अपने पति की मदद करना उसकी ड्यूटी है. और इसलिए उसने भी आग में छलांग लगा दी.

 

अब घोंसले में उनके 3 बच्चे अकेले रह गए थे. उन्होंने अपने माता पिता को ये सब करते हुए देख लिया था. वो तीनों इस बात से सहमत थे कि उन्हें अपने माँ बाप की ड्यूटी को पूरा करना होगा. वो तीनों भी आग में कूद पड़े और आग ने उन्हें भी भून दिया.

 

अब वहाँ 5 पके हुए पक्षी थे. लेकिन राजा, सन्यासी और उस राजकुमारी का मन नहीं माना. वो भौंचक्के हो कर ये सब देख रहे थे कि इन पक्षियों ने क्या किया. उन तीनों की भूख ही मर चुकी थी. वो बस सुबह होने का इंतज़ार करने लगे.

 

सुबह की पहली किरण निकलते ही, उन दोनों ने सबसे पहले राजकुमारी को घर पहुंचाया. वो वापस अपने राज्य और पिता के पास चली गई.

 

अब उस सन्यासी ने राजा को समझाया, “हे राजन, आज आपने एक बहुत अच्छा सबक सीखा है. हर इंसान अपनी अपनी जगह पर महान होता है. एक की ड्यूटी किसी दूसरे को देने की कोई ज़रुरत नहीं है.” अगर आप दुनिया में रहना चाहते हैं तो आपको उन पक्षियों की तरह होना चाहिए. वो दूसरों की सेवा करने के लिए खुद का बलिदान करने को भी तैयार थे.

 

अगर आप इस दुनिया के मोह को छोड़ना चाहते हैं तो आपको उस सन्यासी की तरह होना चाहिए. एक सुन्दर लड़की और इतने धनवान राज्य का राजा बनने का सुख भी उसे ललचा नहीं पाया. अपनी ड्यूटी को पूरे मन से कीजिये. तब आप शान्ति और सुकून से जी पाएँगे और तभी आप भगवान् के और करीब पहुँच पाएँगे.

 

 

द सीक्रेट ऑफ़ वर्क (The Secret of Work)

 

अपने कर्म के बदले में कुछ मिलने की आशा मत रखिये. यही कर्म करने का सीक्रेट है. इसी सोच को अपनाकर आप अपने करियर में या बिज़नेस में सक्सेसफुल हो सकते हैं. बस अपने काम से प्यार कीजिये. आप जो करते हैं उसे प्यार से कीजिये. एक गुलाम जो जंजीरों में बंधा होता है उसे काम करने के लिए अपने पैरों को घसीटना पड़ता है. वो जो भी काम करता है ठीक से नहीं करता क्योंकि उसे उस काम को करने के लिए मजबूर किया जाता है. इसलिए गुलाम नहीं बल्कि एक मालिक की तरह काम कीजिये. बस अपना बेस्ट कीजिये और उस काम को खुशी से कीजिये.

 

एक बार 5 राजा थे जिन्होंने मिलकर गरीबों के लिए एक बहुत बड़ी दावत राखी. उन्होंने सब को दिल खोल कर कपडे, पैसे और खाने का सामान उपहार में दिया. ये जश्न एक बहुत बड़ी लड़ाई की जीत की ख़ुशी में दिया गया था. वहाँ के लोगों का मन उन पाँचों के लिए आदर से भर गया.

 

फिर वहाँ एक बड़ा अजीब सा नेवला (mongoose) आया. उसके शरीर का आधा हिस्सा सोने का था और आधा ब्राउन रंग का. वो उस हॉल के बीचोंबीच गया और कहने लगा ” आप सब धोकेबाज़ हैं. ये कोई बलिदान नहीं है.”

 

सब लोगों को लगा कि ये नेवला पागल है. उन्होंने कहा “क्या तुम्हें दिखता नहीं कि इन्होने गरीबों को कितना दान दिया है. इन्होने बहुत बड़ी कुर्बानी दी है”.

 

तब वो नेवला अपनी कहानी बताने लगा. वो एक छोटे से गाँव से आया था. वहाँ वो एक ब्राह्मण और उसके परिवार से मिला जो अपनी बीवी और दो बेटों के साथ रहता था.

 

वो ब्राह्मण बहुत गरीब था. गाँव में थोडा बहुत पढ़ा कर उन्हें जो पैसे मिलते उसी में उनका गुज़ारा होता था. उन लोगों का जीवन बहुत सादा था.

 

लेकिन फिर वहाँ अकाल पड़ा जो पूरे तीन साल तक चला. उस ब्राह्मण और उसके परिवार की दशा और भी ज्यादा खराब हो गई थी. कई दिनों तक उन्हें कुछ खाने को नहीं मिला.

 

एक दिन वो ब्राह्मण आटे का एक बैग लेकर घर आया. वो इसे पाकर बहुत भाग्यशाली महसूस कर रहा था. उसने उसे चार बराबर हिस्सों में बाँट दिया ताकि वो सब पेट भर कर खा सकें.

 

खाना तैयार करके वो सब खाने के लिए बैठ गए. वो खाना खाने ही वाले थे कि किसी ने दरवाज़ा खटखटाया. ब्राह्मण ने दरवाज़ा खोला, बाहर एक बूढ़ा आदमी खड़ा था.

 

“अन्दर आइये, आप हमारे मेहमान हैं” ब्राह्मण ने कहा. किसी मेहमान का स्वागत करना और उसकी अच्छे से खातिरदारी करना भारतीय रिवाज़ है. इसलिए ब्राह्मण ने उस बूढ़े आदमी को अपना खाना परोस दिया. उस बूढ़े ने बड़ी जल्दी पूरा खाना ख़त्म कर दिया. उन्होंने बताया कि वो 10 दिनों से यात्रा कर रहे थे और उन्हें कुछ भी खाने को नहीं मिला था. उनकी भूख अभी भी शान्त नहीं हुई थी.

 

ब्राह्मण की बीवी ने अब अपना खाना उस बूढ़े आदमी को दे दिया. उसने वो भी झट से ख़त्म कर दिया. उसे अब भी भूख लगी थी. अब उसके बड़े बेटे ने अपना हिस्सा भी दे दिया. उसने कहा कि ये उसकी ड्यूटी है कि वो अपने पिता की मदद करे. उसके हिस्से का खाना खा कर भी बूढ़े की भूख शांत नहीं हुई. अब उसके छोटे बेटे ने अपना हिस्सा दिया. तब जाकर बूढ़े का पेट भरा. उसने पूरे परिवार का धन्यवाद किया और अपने राते चल दिया. अब ब्राह्मण और उसके परिवार के पास खाने के लिए कुछ नहीं था. अगले दिन, उन सब की भूख से तड़प कर मृत्यु हो गई. उसी दिन वो नेवला उनके घर गया था. उसने टेबल पर बिखरे आटे के दाने देखे. उसने अपना शरीर उस पर रगड़ा. वो हैरान हो गया क्योंकि उसके पंख सोने में बदल गए थे.

 

उस ब्राह्मण और उसके परिवार ने जो बलिदान दिया था वो सच्चा सोना था. लेकिन उस नेवले को पूरी दुनिया में फिर इतना महान बलिदान देखने को नहीं मिला इसलिए उसका आधा शरीर ही सोने का था. जो काम प्यार से किया जाता है वो असली सोना होता है. वो किसी भी सेल्फिश मकसद से बिलकुल परे होता है. वो किसी भी नेगेटिव फीलिंग से मुक्त होता है. अगर ज्यादा से ज्यादा लोग अपने काम से प्यार करने लगे तो ये दुनिया कितनी सुन्दर और बेहतरीन हो जाएगी.

 

 

व्हॉट इज़ ड्यूटी (What is Duty)

 

एक बार एक सन्यासी था जो जंगल के बीचोंबीच रहता था. वो अपना पूरा दिन ध्यान लगाने में और योग करने में बिताता था. एक दिन, वो पेड़ के नीचे आराम कर रहा था. अचानक से सूखी पत्तियाँ उसके ऊपर गिरने लगी. उसने ऊपर देखा. पेड़ पर एक कौआ और सारस (क्रेन) बैठे लड़ रहे थे. वो हर जगह सूखी पत्तियाँ फैला रहे थे. उस सन्यासी को गुस्सा आ गया. उसने चिलाकर कहा “मुझ पर पत्ते फेकने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई”?

 

उसने गुस्से से उन दोनों को देखा. उस सन्यासी की हैरानी का ठिकाना नहीं था जब उसने देखा कि वो सारस और कौआ जल कर राख हो गए थे. वो अपनी शक्ति देख कर बहुत खुश हुआ.

 

फिर उसके जंगल छोड़ने का वक़्त आया. वो शहर में भिक्षा मांगने चला गया. उसने एक दरवाज़ा खटखटाया और कहा “माँ, मुझे खाने के लिए कुछ दीजिये”. उस औरत ने कहा “बेटा, एक मिनट रुको”. उस सन्यासी ने सोचा “इसकी इतनी हिम्मत कि इसने मुझे इंतज़ार करने को कहा. इसे पता नहीं है मेरे पास कितनी शक्ति है.”

 

सन्यासी ने इसे अपने मन में कहा था. फिर उस औरत ने कहा “खुद के ऊपर इतना घमंड मत करो, मैं वो कौआ या सारस नहीं हूँ”.

 

उस सन्यासी ने कुछ देर और इंतज़ार किया. जब वो औरत बाहर आई तो उसने पूछा “माँ, आपको उस जंगल में रहने वाले कौवे और साराश के बारे में कैसे पता चला”?

 

उसने जवाब दिया, “बेटा, तुम जो योग साधना करते हो मुझे उसका कोई ज्ञान नहीं है. मैं एक सीधी साधी हाउस वाइफ हूँ. मैंने तुम्हें इंतज़ार करने के लिए इसलिए कहा क्योंकि मैं अपने बीमार पति की सेवा कर रही हूँ”.

 

उसने बताया कि उसने पूरी ज़िन्दगी अपनी हर ड्यूटी को ठीक से करने की कोशिश की है. जब वो छोटी थी तो उसने अपने माता पिता की सेवा की. जब शादी हुई तो अपने पति की सेवा की. उसके लिए तो यही योग था.

 

इन्ही चीज़ों से उसे ज्ञान मिला था. इसलिए वो सन्यासी के मन की बात पढ़ पाई. वो जानती थी कि सन्यासी ने जंगल में क्या किया था. उसने सन्यासी को अगले शहर जाने के लिए कहा. वहाँ एक कसाई (butcher) था जिससे सन्यासी बहुत कुछ सीख सकता था.

 

सन्यासी ने सोचा “वो कसाई मुझे क्या सिखा सकता है”? फिर भी वो उस शहर की ओर चला गया. वो वहां के मार्केट में पहुंचा. वहाँ उसे एक मोटा कसाई दिखाई दिया. वो मांस को काट कर अपने कस्टमर को दे रहा था. सन्यासी ने सोचा “हे भगवान् मेरी मदद करना. मैं एक कसाई से बात करने जा रहा हूँ. वो तो पक्का एक शैतान का अवतार होगा”.

 

जब कसाई ने सन्यासी को वहाँ खड़ा देखा तो पूछा “क्या आप वही हैं जिसे उस औरत ने भेजा है? प्लीज थोडा इंतज़ार कीजिये. मुझे अपने कस्टमर का पहले ध्यान रखना है”.

 

जब कसाई का काम पूरा हो गया तो उसने पैसे उठाए और सन्यासी को पीछे आने के लिए कहा. वो कसाई के घर पहुंचे. कसाई ने उसे फिर इंतज़ार करने के लिए कहा.

 

घर पर, कसाई ने अपने बूढ़े माँ बाप की सेवा की. उन्हें नहलाया, साफ़ कपडे पहनाए. उनके लिए खाना बनाया फिर उन्हें खिलाया. उसने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि उन्हें ज़रा भी तकलीफ ना हो. उसके बाद उसने सन्यासी से बात की. उसने पूछा “स्वामीजी, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ”? सन्यासी ने कसाई से भगवान् और आत्मा के बारे में कुछ सवाल पूछे.

 

उसने जवाब महाभारत के व्याध गीता से दिया. सन्यासी को बहुत आश्चर्य हुआ. ऐसा लग रहा था मानो कसाई बहुत ज्ञानी था, वो बहुत बुद्धिमान था. सन्यासी ने पूछा, “सर, आप इस शरीर में क्यों हैं”? आपके पास इतना अपार ज्ञान है फिर भी आप इतना गन्दा काम करते हैं”? कसाई ने कहा, “बेटा, सच तो ये है कि कोई भी काम गन्दा, छोटा या बुरा नहीं होता. मैं इसी परिस्तिथि में पैदा हुआ हूँ. मैं जब बच्चा था तब बहुत जल्दी कसाई का काम सीख गया था. मैं पूरी कोशिश करता हूँ कि अपनी ड्यूटी को ठीक से पूरा कर पाऊं”.

 

कसाई अपने घर की सारी ज़िम्मेदारी अच्छे से निभाता था. वो अपने माँ बाप का बहुत ख़याल रखता था. वो सन्यासी नहीं था, ना उसने दुनिया छोड़ कर जंगल में योग साधना की थी . फिर भी, कसाई को अपनी ड्यूटी का पूरा एहसास था और उसे पूरा करने के लिए उससे जो हो सकता था वो करता था. इससे हमें ये सबक सीखने को मिलता है कि अपने काम को पूजा की तरह ट्रीट करना चाहिए. उस पर पूरा ध्यान लगाना चाहिए. बस अपना काम करते रहिये, किसी और चीज़ के बारे में मत सोचिये. उस काम को करने से मिलने वाले फल के बारे में मत सोचिये. मुश्किलों के बारे में या उसके रिजल्ट के बारे में भी मत सोचिये.

 

कहानी में, उस औरत ने और कसाई ने अपने हर कर्म को पूरे दिल से निभाया. और इसी से उन्हें ज्ञान मिला. जो वर्कर अपने काम के रिजल्ट के बारे में सोचता है, जिसे फल से ज्यादा लगाव होता है वो अपनी ड्यूटी के लिए हमेशा शिकायत ही करता रहता है. वो कभी खुश नहीं होता क्योंकि उसे तो बस एक पहचान की तलाश रहती है.

 

लेकिन जिन्हें रिजल्ट से लगाव नहीं होता, उनके लिए उनका काम ही ख़ुशी का कारण बन जाता है. अपने दिए गए ड्यूटी को वो ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार करता है और उसे पूरे दिल से निभाता है. वो शान्ति और सुकून से जीता है क्योंकि उसने अपनी ड्यूटी को गले लागाया और पूरी तरह निभाया.

 

 

वी हेल्प आर्सेल्व्ज़, नोट द वर्ल्ड (We Help Ourselves, Not the World)

 

एक बार एक गरीब आदमी था जिसे बहुत धन दौलत पाने की इच्छा थी. कहीं से उसने सुन लिया कि भूत को पकड़ लेना चाहिए. फिर वो उस भूत से बहुत सारा धन और जो भी चीज़ उसे पसंद है मांग सकता है.

 

इसलिए उसने एक साधु से मदद मांगी. साधु ने उसे इन बेकार की बातों पर ध्यान नहीं देने की सलाह दी और उसे वापस अपने घर जाने के लिए कहा. लेकिन वो आदमी ज़िद करने लगा. वो कहने लगा “बाबा, मुझे सच में एक भूत की ज़रुरत है, प्लीज मेरी मदद कीजिये”.

 

साधु नाराज़ हो गए. लेकिन फिर उन्होंने उसे एक ताबीज़ दिया और कहा “इस ताबीज़ को पकड़ कर ये जादुई मंत्र पढना. तुम्हारे सामने एक भूत आ जाएगा. वो तुम्हारी हर बात का पालन करेगा.”

 

“लेकिन याद रखना, भूत खतरनाक होते हैं. उसे हमेशा किसी काम में बिजी रखना. उसे कुछ ना कुछ काम देते रहना. अगर तुम फेल हुए तो भूत तुम्हारी जान ले लेगा”.

 

उस गरीब आदमी ने कहा “ये तो बड़ा आसान है. मेरे पास उसे देने के लिए बहुत से काम हैं. मैं फेल नहीं होने वाला.”

 

वो आदमी घने जंगल के अन्दर चला गया. उस ताबीज़ को पकड़ कर उसने जादुई मंत्र पढ़ा. और अचानक उसे हवा में तैरता हुआ एक विशाल भूत दिखाई दिया. भूत ने कहा “तुमने मुझे अपने जादू से पकड़ लिया है, अब तुम्हें मुझे बिजी रखना होगा नहीं तो मैं तुम्हारी जान ले लँगा”.

 

उस गरीब आदमी ने कहा “मेरे लिए एक महल बनाओ”. एक सेकंड के अन्दर वहाँ महल तैयार हो गया. भूत ने कहा “ये काम पूरा हो गया है”. “मुझ पर पैसों और गहनों की बारिश करो”. पलक झपकते ही उस आदमी के चारों तरफ सोने, चांदी और हीरे जवाहरात का ढेर लग गया. “हो गया”, भूत ने कहा.

 

“इस जंगल को ज़मीन पर ले आओ और इसके ऊपर एक शहर बनाओ”. बस कुछ ही पलों में उसके सामने पूरा शहर तैयार था. “हो गया”, भूत ने कहा. “क्या और भी कुछ बाकी है”?, उसने पूछा.

 

अब वो आदमी डर गया. वो भूत से और क्या मांगे उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था. “मुझे करने के लिए कोई काम दो नहीं तो मैं तुम्हें खा जाउंगा”. अब उस आदमी की हालत पतली हो गई. वो जितना तेज़ हो सकता था भागने लगा. वो तब तक नहीं रुका जब तक उसे वो साधु नहीं मिल गए. “बाबा, प्लीज मुझे बचाइए”.

 

उसने साधु को बताया कि उसके पास भूत को देने के लिए अब कोई काम नहीं है और अब वो उसे मार डालेगा. भूत भी वहाँ पहुँच गया. वो आदमी साधु के पीछे छुप गया. “मैं तुम्हें खा जाऊंगा”, भूत बस यही कहता जा रहा था.

 

आखिर साधु ने आदमी से कहा “ध्यान से सुनो. एक ऐसे कुत्ते की तलाश करो जिसकी पूँछ में घुंघराले बाल हों और वो मुड़ी हुई हो. फिर अपनी तलवार से उसकी पूँछ काट लेना और भूत से कहना कि उसे सीधा करके दे.”

 

उस आदमी ने बिलकुल वैसा ही किया. भूत बार बार कोशिश की लेकिन पूंछ वापस मुड़ जाती थी. इसमें कई दिन गुज़र गए लेकिन भूत उसे सीधा नहीं कर पाया.

 

अंत में, भूत बुरी तरह थक गया. उसने कहा “मुझे आज तक किसी काम में इतनी समस्या नहीं हुई. चलो मैं तुम्हारे साथ एक समझौता करता हूँ. अगर तुमने मुझे अभी आज़ाद कर दिया तो जितना भी पैसा मैंने तुम्हें दिया है तुम वो सब रख सकते हो और मैं तुम्हें कभी नुक्सान नहीं पहुंचाने का भी वादा करता हूँ”. इस डील से वो आदमी बहुत खुश हुआ और उसने भूत को जाने दिया.

 

जिस दुनिया में हम रहते हैं वो बिलकुल कुत्ते की पूँछ जैसी है, टेढ़ी. न जाने कितने महान लोगों ने इसे सीधा करने की कोशिश की है. लेकिन जब वो अपनी पकड़ ढीली कर देते हैं तो ये दुनिया फिर से पूँछ की तरह टेढ़ी हो जाती है.

 

इसलिए सबसे अच्छा होता है इस दुनिया के पाप, बुरे कर्मों और गलतियों का असर खुद पर नहीं होने देना. आप उसे कण्ट्रोल नहीं कर सकते तो बस उसे रहने दीजिये. इसके बजाय उन चीज़ों पर ध्यान दीजिये जिन्हें आप कण्ट्रोल कर सकते हैं. अपने काम को और खुद को पहले से भी बेहतर बनाने पर ध्यान दीजिये.

 

प्यार करना, शांत रहना और सही का साथ देना जैसी आदतों को अपनाने की कोशिश कीजिये. जितना हो सके उतने ज्यादा लोगों की सेवा कीजिये. ये दुनिया तभी भी टेढ़ी की टेढ़ी ही रहेगी लेकिन खुद को सीधा करना भी एक बहुत महान कर्म है.

 

 

Conclusion – Karma Yoga Book Summary in Hindi

 

इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आप कौन हैं या आप क्या करते हैं, आप भी महान बन सकते हैं. इसके लिए आपको साधु बनने की ज़रुरत नहीं है. आप घर परिवार वाले हों या मजदूरी करने वाले, आपको भी ज्ञान मिल सकता है.

 

सबसे ज्यादा ज़रूरी ये है कि आप पूरे दिल से और सच्ची भावना से सेवा करें. बस काम को अपना काम समझ कर करो, उसे बोझ मत समझो. आपको इस बात का संतोष होगा कि आपके दिए हुए रोल को आपने बखूबी निभाया.

 

जब आप काम बदले में कुछ पाने की इच्छा नहीं रखते सिर्फ तब आप सच्ची ख़ुशी को महसूस कर पाएँगे. आपको शान्ति औत सुकून का एहसास होगा, आप बिलकुल आज़ाद हो जाएँगे क्योंकि कर्म ही सच्ची पूजा है.

 

 

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