भगवान् या देवी-देवता की पूजा करने की सही विधि

संक्षिप्त पूजन विधि

किसी सनातन देवता या देवीके पूजनके पहले पूजन-वस्तु एवं शरीरकी शुद्धि अनिवार्य होती है। वैदिक पूजाकी अनेक विधियाँ होते हैं। यथा-

  1. पञ्चोपचार – 1-गन्ध, 2-पुष्प, 3-धूप, 4-दीप और 5-नैवेद्य।
  2. दशोपचार – 1- पाद्य, 2-अर्घ्य, 3-आचमन, 4- स्नान, 5- वस्त्र, 6- गन्ध, 7-पुष्प, 8-धूप, 9-दीप और 10-नैवेद्य।
  3. षोडशोपचार- 1-पाद्य, 2-अर्घ्य, 3-आचमन, 4-स्नान, 5- वस्त्र, 6- आभूषण, 7-गन्ध, 8-पुष्प, 9-धूप, 10-दीप, 11-नैवेद्य, 12-आचमन, 13-ताम्बूल, 14-स्तवपाठ, 15-तर्पण (पुष्पाञ्जलि) और 16-नमस्कार।

आचमन – 1- ॐ केशवाय नमः, 2- ॐ नारायणाय नमः, 3- ॐ माधवाय नमः। – इन तीन मन्त्रोंसे पृथक्-पृथक् हाथमें जल लेकर मन्त्र पढ़ते हुए आचमन करे। इसके बाद ‘ॐ हृषीकेशाय नमः’ बोलकर हाथ धो ले।

शरीरशुद्धि –

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥

इस मन्त्रसे शरीरका जलसे सेचन करे। उसके बाद मङ्गलपाठ करे और गणेश-स्मरण करे-

वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम्। प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

सङ्कल्प — हाथमें अक्षत-पुष्प आदि लेकर पूजनका सङ्कल्प करे- ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य…..अहं श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं च देवस्य [ देव्याः ] पूजनं करिष्ये।

ध्यान – जिस देवताकी पूजा करनी हो उसका ध्यान कर ले। जैसे—’विष्णवे नमः’ विष्णुको नमस्कार कर ले। इसी तरह जिस देवीका ध्यान करना हो उस देवीका ध्यान करे। जैसे-‘दुर्गादेव्यै नमः’ – दुर्गादेवीको नमस्कार कर ले।

आवाहन – हाथमें अक्षत, पुष्प लेकर उस देवताका आवाहन करे- अमुक-देवाय / देव्यै नमः, आवाहयामि। अक्षत, पुष्प जमीनपर छोड़ दे। (अमुकके स्थानपर जिस देवी-देवताका पूजन करना हो वहाँ उस देवी-देवताका उच्चारण करना चाहिये)

आसन – अक्षत, पुष्प लेकर निम्न मन्त्रसे आसन प्रदान करे-

अनेकरत्नसंयुक्तं नानामणिगणान्वितम्।
इदं हेममयं दिव्यमासनं प्रतिगृह्यताम्॥

‘आसनं समर्पयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः। (अमुकके स्थानपर जिस देवी-देवताका पूजन करना हो वहाँ उस देवी-देवताका उच्चारण करना चाहिये ।)

  • पाद्य — ‘पादयोः पाद्यं समर्पयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः।
  • अर्घ्य – ‘हस्तयोरर्घ्यं समर्पयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः।
  • आचमन – ‘आचमनीयं जलं समर्पयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः।
  • स्नान – ‘स्नानीयं जलं समर्पयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः।
  • वस्त्र – ‘वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः।
  • यज्ञोपवीत – ‘यज्ञोपवीतं समर्पयामि’ अमुक-देवाय नमः।
  • चन्दन – ‘चन्दनं समर्पयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः।
  • अक्षत – ‘अक्षतान् समर्पयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः।
  • पुष्प – ‘पुष्पाणि समर्पयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः।
  • पुष्पमाला – ‘पुष्पमालां समर्पयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः।
  • धूप – ‘धूपमाघ्रापयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः।
  • दीप – ‘दीपं दर्शयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः।
  • नैवेद्य — ‘नैवेद्यं निवेदयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः।
  • फल — फलं समर्पयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः।
  • ताम्बूल – ‘ताम्बूलं समर्पयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः।
  • दक्षिणा – ‘दक्षिणां समर्पयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः।
  • आरती- ‘आरार्तिक्यं समर्पयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः।
  • मन्त्रपुष्पाञ्जलि—‘मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः।
  • प्रदक्षिणा – ‘प्रदक्षिणां समर्पयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः।
  • नमस्कार – ‘प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान् समर्पयामि’ अमुक-देवाय/देव्यै नमः।

इसके बाद क्षमा-याचना करे-

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन। यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम। तस्मात् कारुण्यभावेन रक्ष मां परमेश्वर॥

समर्पण — ॐ तत्सद् ब्रह्मार्पणमस्तु’ – कहकर समस्त पूजन-कर्म भगवान्को निवेदित कर दे।

मानस-पूजा

बाह्यपूजाके साथ-साथ मानस-पूजाका भी अत्यधिक महत्त्व है। जो बाह्यपूजा न कर सकें तो वे भी मानस-पूजा तो कर ही सकते हैं। यहाँ मानस-पूजाका संक्षिप्त स्वरूप दिया जा रहा है-

(1) ॐ लं पृथिव्यात्मकं गन्धं परिकल्पयामि। (प्रभो! मैं पृथ्वीरूप गन्ध (चन्दन) आपको अर्पित करता हूँ।)

(2) ॐ हं आकाशात्मकं पुष्पं परिकल्पयामि । (प्रभो! मैं आकाशरूप पुष्प आपको अर्पित करता हूँ।)

(3) ॐ यं वाय्वात्मकं धूपं परिकल्पयामि। (प्रभो! मैं वायुदेवके रूपमें धूप आपको प्रदान करता हूँ।)

(4) ॐ रं वह्न्यात्मकं दीपं दर्शयामि। (प्रभो! मैं अग्निदेवके रूपमें दीपक आपको प्रदान करता हूँ।)

(5) ॐ वं अमृतात्मकं नैवेद्यं निवेदयामि। (प्रभो! मैं अमृतरूपी नैवेद्य आपको निवेदन करता हूँ।)

(6) ॐ सौं सर्वात्मकं सर्वोपचारं समर्पयामि । (प्रभो! मैं सर्वात्माके रूपमें संसारके सभी उपचारोंको आपके चरणोंमें समर्पित करता हूँ।)

इन मन्त्रोंसे भावनापूर्वक मानस-पूजा की जा सकती है।

Leave a Comment