Start With Why Book Summary in Hindi (PART – 2)

Start With Why Book Summary in Hindi – Hello दोस्तों, आज मैं आपको बताऊंगा Simon Sinek की किताब Start With Why की बुक समरी, अगर आपको जिंदगी अच्छे से जीना है, Leader बनना है तो इस बुक से सीखना होगा, आपने इसका पहला पार्ट तो पढ़ा ही होगा, अगर नहीं पढ़ें हैं तो PART – 1 भी जरूर पढ़ें।

तो चलिए शुरू करते हैं –

 

Start With Why Book Summary in Hindi

 

ये ओपिनियन नहीं है, ये बायोलोजी है

 

Belonging का सेन्स हम इंसानों में पैदाइशी होता है क्योंकि हम हमेशा सेफ और सीक्योर फील करना चाहते है। ये हम सब की बेसिक नीड है।

हम कभी जब छुट्टियों में विदेश जाते है तो वहां अपने देश के लोगो को देखकर हमें अच्छा लगता है। क्योंकि उन्हें देखकर हमें अपने घर की याद आती है।

इसी तरह जो कंपनी हमारी तरह सोचती है हम उसके साथ एक belonging फील करते है। हम उनके प्रोडक्ट लेते है क्योंकि हमारा और उनका एक ही “Why” होता है। मतलन जिसमे हम बिलीव करते है कंपनी भी करती है।

“ये प्रोडक्ट्स और ब्रांड हमें खुद से जोड़ते है” और हम कंपनी के साथ कनेक्टेड फील करते है और उन कस्टमर के साथ भी जो सेम प्रोडक्ट यूज़ करते है।

“Why” से शुरुवात करना ज्यादा ज़रूरी है क्योंकि इंसान फीलिंग्स के हिसाब से ही सब कुछ करता है।

वे गोल्डन सर्कल बहुत इफेक्टिव है क्योंकि ये हमारे दिमाग के मेजर लेवल से रिलेट करता है।

“What” लेवल हमारे दिमाग के नियोकोर्टेक्स के साथ कोरोस्पोंड्स करता है। हम जो भी लेंगुएज बोलते समझते है या जो कुछ सोचते है वे सब इसी नियोकोर्टेक्स से कंट्रोल होता है।

“How” और “What” लेवल लिम्बिक ब्रेन के साथ कोरोस्पोंड करते है। जिसका मतलब है कि हमारी डीसीजन मेकिंग और बेहेवियर सब इसी लिम्बिक ब्रेन से कंट्रोल होता है।

मगर ये लिम्बिक ब्रेन वर्ड्स फॉर्म नहीं कर सकता, ये खुद को फीलिंग्स से एक्सप्रेस कर सकता है। दिमाग के इसी हिस्से में ट्रस्ट और लोयलिटी जैसी फीलिंग्स होती है।

जब कोई कंपनी “What” के साथ अप्रोच करती है, यानि वो क्या प्रोडक्ट बेच रही है, तो हमारा दिमाग का नियोकोर्टेक्स वाला हिस्सा रेस्पोंस करता है।

हम उस प्रोडक्ट के बारे में सोचने लगते है कि उसमे क्या-क्या फीचर्स है, कैसा दीखता है, डीजायन कैसा है वगैरह वगैरह।

मगर जब कोई कंपनी “वाय” के साथ अप्रोच करती है तो वो हामरे लिम्बिक ब्रेन को अपील कर रही होती है।

तब ये इम्पैक्ट स्ट्रांगर होता है क्योंकि इसका मतलब है वो हमारी फीलिंग्स को अपील कर रही है।

हम अपनी फीलिंग्स को रेशनलाइज नहीं कर सकते।

हम कोई प्रोडक्ट सिर्फ उसके गुड लुक की वजह से नहीं खरीदते है बल्कि इसलिए खरीदते है क्योंकि हमें वो सही फील होता है।

जैसे उन लोगो की बात करते है जिन्हें स्टारबक्स पसंद है, वैसे तो मार्किट में सस्ते ब्रांड की कॉफ़ी भी मिलती है कुछ तो बढ़िया फ्लेवर और वेरायिटी वाली भी है,

मगर जो लोग स्टारबक्स के दीवाने है उनके लिए तो स्टारबक्स ही पहली और आखिर चॉइस है, उनके लिए वो कॉफ़ी से कहीं बढ़कर है क्योंकि वे अब उस ब्रांड के लॉयल कस्टमर बन चुके है।

जब वे स्टारबक्स की कॉफ़ी पीते है तो उन्हें अच्छी फीलिंग आती है। स्टारबक्स का लोगो भी यही आइडिया देता है कि उसे पीने वाले आम लोग नहीं है, कुछ खास है।

स्टारबक्स का “What” उनकी कॉफ़ी है मगर उनका “Why” या पर्पज़ लोगो को अपनी कॉफ़ी के पीने के लिए कम्फर्टेबल फील करवाना है, कुछ अच्छा फील करवाना है।

दुसरे शब्दों में स्टारबक्स लोगो को सिर्फ कॉफ़ी नहीं पिलाता बल्कि अच्छा एक्स्पेरीयेंस फील करवाता है।

हार्ले-डेविडसन “Why” को लोगो तक पहुँचाने में एक्सपर्ट है। इसीलिए तो लोग उनकी कंपनी के लोगो का टेटू बनवाये घुमते है। कंपनी ने एक पॉवरफुल लोगो बनाया जो बीलीफ का सिम्बल बन गया है।

हार्ले ने इसे लगातार सालो की मेहनत, लगन और क्लेयरीटी से अचीव किया है।

हार्ले- डेविडसन जो कहता और करता है उसमे बीलीव भी करता है। कंपनी ने अपने बनाये वेल्यूज़ को लेकर बरकरार है। ये कस्टमर से वही कम्युनीकेट करते है जिसपर ये बीलीव करते है।

धीरे-धीरे इनका लोगो कंपनी प्रोडक्ट के सिम्बल से कहीं बढ़कर बन गया। लोगो का मतलब ही अब बीलीफ हो गया है।

रेंडी फावलर जिन्होंने हार्ले का टेटू बनवा रखा है, वे कहते है – “ये इस बात का सिम्बल है कि मै कौन हूँ यानी ये बताता है कि मै एक अमेरिकन हूँ।”

 

 

“Why” से कैसे शुरुवात की जाए, Start with Why, But Know-How

ग्रेट लीडर्स जैसे बिल गेट्स के पास एक करिश्मा है क्योंकि उनके पास एक स्ट्रोंग पर्पज है। उनके पास क्लियर “Why” है।

महान लीडर्स के पास एक बड़ा विजन होता है जो पर्सनल से कहीं ज्यादा है। वे सिर्फ अपने बारे में नहीं बल्कि बहुत से लोगो की भलाई का सोचते है।

बिल गेट्स मानते है कि हर प्रॉब्लम का हल निकाला जा सकता है क्योंकि वे ऑप्टीमिस्टिक है।

वे मानते है कि अगर ओब्सटेकल हटा दिए जाए तो हर कोई अपना पूरा पोटेंशियल अचीव कर सकता है।

बिल गेट्स का ये भी मानना है कि अगर लोगो को यूजफुल टूल्स दे दिए जाए तो वे और भी प्रोडक्टिव हो सकते है। उनका विजन है कि हर घर में, हर डेस्क में एक कंप्यूटर हो।

उन्होंने अपना ये पर्पज माइक्रो-सॉफ्ट के साथ मिलकर आगे बढाया, बिल गेट्स ने पॉवर पॉइंट बनाया, एक्सेल और वर्ड बनाया ताकि लोग ज्यादा एफ़ीशियेंट और प्रोडकटिव बन पाए।

विंडोज़ बनाकर उन्होंने लोगो को एक्स्ट्राआर्डिनरी चीज़े करने का मौका दिया।

बिल गेट्स का विजन था कि टेक्नोलोजी के ज़रिये लोगो को एम्पॉवर किया जाए।

जब बिल गेट्स ने माइक्रो सॉफ्ट छोड़ा तो भी वे अपने विजन को लेकर चलते रहे। उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन बनाया।

अब वे कोई सॉफ्टवेयर नहीं बनाते लेकिन अभी भी वे लोगो को अपना फुल पोटेंशियल अचीव करने में मदद कर रहे है।

अभी भी वे लोगो को उनकी जिंदगी इम्प्रूव करने का मौका दे रहे है।

बिल गेट्स इस बात पर यकीन करते है कि अगर गरीबो को अपोर्चुयुनिटी दी जाये तो वे अपनी जिंदगी सुधार सकते है।

गेट्स ने केवल “What” यानि वो क्या करते है बस वही बदला। मगर उनका असली पर्पज “Why” और उनका विजन कभी नहीं बदलेगा।

वो जो “Why” जानते है उन्हें ज़रूरत है उनकी जिन्हें “How” पता है।

हमें गोल्डन सर्कल तो पता है। अब ऊपर जो कोन दिख रहा है वो किसी कंपनी या ओर्गेनाइज़ेशन का सिम्बल है। इसमें वही कोंस्पेट अप्लाई होता है जो गोल्डन सर्कल में है।

सीईओ कंपनी का लीडर होता है। वो कंपनी के लिए एक पर्पज रखता है उसके नीचे एक्जीक्यूटिव काम करते है जो सीईओ के “Why” पे बिलीव करते है। उन्हें पता होता है कि कंपनी के पर्पज को यानी “Why” को रिएलिटी में कैसे लाया जाए।

ये “Why” एक एबस्ट्रेक्ट चीज़ है ये कोई प्रोडक्ट नहीं है बल्कि एक यकीन है, एक बिलिफ है, और “How” वो प्रोसेस है जो इस बीलीफ़ को रियल में बदलता है। “What” कंपनी के प्रोडक्ट या सर्विसेस को रेफेर करता है।

जो “Why” टाइप के वही लीडर्स कहलाते होते है उनके पास विजन होता है, एक क्लियर पर्पज होता है, और वे ऑप्टीमिस्टिक भी होते है। इन लोगो को यकीन होता है कि जो सपने देखे जाते है उन्हें पूरा किया जा सकता है।

“How” टाइप के लोग रियलिस्टिक और ज्यादा प्रेक्टिकल होते है। वे जैसी दुनिया देखते है वही फील करते है। यही वो लोग होते है जो स्ट्रकचर बनाते है और काम निकलवाते है।

मगर “Why” लोगो अकेले कुछ नहीं कर सकते, इन्हें “How” टाइप के लोगो की ज़रूरत पड़ती है।

वाल्ट और रॉय डिज्नी ब्रदर्स की बात करते है। वाल्ट डिज्नी एडवरटीज़मेंट के लिए एक कार्टून आर्टिस्ट का काम करते थे। फिर उन्होंने एनिमेटेड मूवीज बनाने के बारे में सोचा, 1923 में हॉलीवुड अभी अपने शुरुवाती दौर में ही था।
रॉय उन्जे 8 साल बड़ा था और बैंकर की जॉब कर रहा था। रॉय अपने भाई वाल्ट की इमेजिनेशन और टेलेंट की तारीफ करता था, लेकिन उसे पता था कि वाल्ट बिजनेस के बारे में कुछ नहीं जानता है, और वाल्ट रिस्क भी बहुत लेता था।

जैसा कि बाकी “Why” टाइप की आदत होती है। वाल्ट हमेशा आने वाले कल के सपनो में खोया रहता था।

 

एक बायोग्राफर ने कहा है “वाल्ट डिज्नी ने सपना देखा, चित्र बनाया और इमेजिन किया, जबकि रॉय उसकी शैडो में खड़ा एक एम्पयार बना रहा था.”

रॉय ने अपने बिजनेस और फाईनेंस के टैलेंट को यूज़ किया उसने वाल्ट के सपने को रियलिटी में बदलने के लिए उसकी मदद की। रॉय डिज्नी ने ब्युओना विस्टा कंपनी बनाई जो डिज्नी की फिल्मे डिस्ट्रीब्यूट करती थी।

रॉय डिज्नी की तरह ज़्यादातर “How” टाइप फंक्शनल और सक्सेसफुल होते है मगर वे इस दुनिया को बदलने नहीं आते बल्कि “Why’ टाइप आते है जैसे वाल्ट डिज्नी जो लोगो को इंस्पायर करते है।

बिना “How” टाइप के “Why” टाइप के लोग कुछ नहीं कर सकते। उनकी इमेजिनेशन दम तोड़ देगी। अगर इन दोनों टाइप के बीच एक स्ट्रोंग पार्टनरशिप बन जाए तो ये दोनों मिलकर एक मिलियन – बिलियन डॉलर कंपनी बना सकते है।

 

 

जब व्हाई क्लियर ना हो

 

सेम वाल्टन, वाल मार्ट के फाउंडर डिप्रेशन में बड़े हुए। उन्हें कड़ी मेहनत की वेल्यु मालूम थी। उन्होंने बेनटोनविल्ले, अर्कांसस में पहला वालमार्ट  खोला था। तब ये बस एक रीटेल शॉप थी।

तब वहां और भी कई रीटेल शॉप थी जहाँ कम प्राइस में सामान मिलता था। लेकिन वाल मार्ट ने सबसे ज्यादा तरक्की की और टॉप तक पहुंचा। आज वाल मार्ट की सेल्स कुल मिलाके हर साल $44 billion है।

लेकिन सेम वाल्टन के सक्सेस का सीक्रेट हार्ड वर्क और चीप प्राइस में नहीं है। वाल्टन के पास बड़ा कॉज था। उसके पास एक स्ट्रोंग बिलिफ था जो उसे मोटीवेट करता था।

सेम वाल्टन लोगो में यकीन करते थे। उसका मानना था कि अगर वो लोगो का ध्यान रखेंगे तो लोग भी उनका ध्यान रखेंगे। जितना वाल मार्ट अपने एम्प्लोयीज़, कस्टमर, और कम्युनिटी को देते गए उतना ही उनके एम्प्लोयीज़, कस्टमर और कम्युनिटी उन्हें देती गई।

सेम वाल्टन वीकेंड्स पर भी काम करते थे। वे अपना पिक अप ट्रक यूज़ करते थे। उन्हें अपने सभी एम्प्लोयीज़ का बर्थ डे भी याद रहता था।

सेम वाल्टन हमेशा हम्बल रहते थे। उन्होंने अपनी जिंदगी औरो की सर्विस में लगा दी। उनकी खुद की सालाना सेलेरी $350,000 से भी कम थी।

यही सेम वाल्टन का “Why” था, वे लोगो की सेवा करना चाहते थे। ये पर्पज उनके खुद से ऊपर था यही वजह है जो वालमार्ट इतना सक्सेसफुल हुआ है। वालमार्ट सेम वाल्टन के पर्पज को पूरा करने का जरिया है।
हालाँकि बॉन मेरो कैंसर की वजह से अप्रैल 5, 1992 में सेम वाल्टन की मौत हो गयी थी। उनके बड़े बेटे एस. रोबीसन वाल्टन, उनके बाद वाल मार्ट के चेयरमेन बने।

रोबीसन ने कहा कि कंपनी की पालिसी, कंट्रोल और डाईरेक्शन में कोई चेंज नहीं आएगा। लेकिन ये सच नहीं है।

सेम के मरने के बाद वाल मार्ट में बहुत से चेंज आये। कई कस्टमर और एम्प्लोय्य्ज़ ने मिसट्रीट की कम्प्लेंट की। वाल मार्ट बंट गयी और उसका एक हिस्सा कोस्टको एक नया रीटेल शॉप बन गया।

वो सीईओ जिसने सेम वाल्टन के बाद काम संभाला, उनके पर्पज को मेंटेन नहीं कर पाया। वाल मार्ट का “Why” हर साल धुंधला होता चला गया। इसका मतलब अब कंपनी ने अपना पर्पज खो दिया है, अपनी रेपुटेशन खो दी है।

2009 में माइकल टी. ड्यूक कंपनी के सीईओ बने जिनकी सालाना सेलेरी $5.43 मिलियन है।

 

 

कन्क्ल्यूजन

 

ग्रेट लीडर जैसे बिल गेट्स, स्टीव जॉब्स, और सेम वाल्टन ने अपने ‘Why” को एक पहचान दी।

जब उन्होंने एप्पल, माइक्रो सॉफ्ट और वाल मार्ट छोड़ा तो उन कंपनीज में बड़ी प्रॉब्लम आनी शुरू हो गयी। क्योंकि वे अपना पर्पज भूल गई थी।

जो भी नया सीइओ बने वो ग्रेट लीडर से इंस्पायर हो, ये ज़रूरी है। सिर्फ अच्छे क्रेडेन्शियल का होना काफी नहीं है।

उसे भी उसी बात पर बीलीव करना होगा जिस पर कंपनी का फाउंडर करता था वर्ना कंपनी का पर्पज धुधला हो जाएगा और उसकी रेपुटेशन खो जायेगी।

“Why” का लेसन हर कंपनी में गहराई से रूटेड होना चाहिए। इतनी गहराई से कि अगर फाउंडर ना भी रहे तो भी कंपनी उस पर्पज को लेकर आगे बढती रहे और सक्सेसफुल बनी रहे।

अब आप जान गए है कि व्हाई के साथ कैसे शुरुवात की जाए। अपना एक पर्पज सोचिये, आप किस पर बीलीव करते है ?

वहां से अपना How (प्रोसेस) लेकर चलिए और अपना What (प्रोडक्ट) establish कीजिये। अपने व्हाई को फजी न होने दे।

जो आप सोच रहे है, कर रहे है, कम्युनिकेट कर रहे उस पर ध्यान दे। ध्यान रहे कि ये सब आपके पर्पज के साथ मैच करे।

याद रखिये जिनका पर्पज उनसे बड़ा होता है वही ग्रेट सक्सेस हासिल करते है।

 

तो दोस्तों आपको आज का हमारा यह Start With Why Book Summary in Hindi कैसा लगा ?

अगर आपके मन कुछ भी सवाल या सुझाव है तो मुझे नीचे कमेंट करके जरूर बताये।

 

आपका बहुमूल्य समय देने के लिए दिल से धन्यवाद।
 
Wish You All The Very Best.

 

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