The Art of Public Speaking Book Summary in Hindi (PART – 2)

The Art of Public Speaking Book Summary in Hindi – द आर्ट आफ पब्लिक स्पीकिंग (The Art of Public Speaking) में आज हम जानेंगे कि किस तरह से आप पब्लिक स्पीकिंग की कला में माहिर बन सकते हैं।

अगर आप एक बेहतर पब्लिक स्पीकर बनना चाहते हैं, या लोगों को प्रभावित करने के तरीके सीखना चाहते हैं, या फिर एक अच्छे लीडर बनना चाहते हैं तो किताब सिर्फ आपके लिए ही है।

दोस्तों ये इसकी PART – 2 है, अगर आपने इसके पहला पार्ट नहीं पढ़ा तो आप पहले PART – 1 को पढ़ लीजिये।

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The Art of Public Speaking Book Summary in Hindi (PART – 2)

लेखक

डेल कार्नेजी (Dale Carnegie) अमेरिका के एक लेखक और लेक्चरर थे। वे लोगों को सिखाते थे कि किस तरह से वे खुद में सुधार कर सकते हैं, किस तरह से वे कुछ बेच सकते हैं और कैसे वे बोलने की कला में माहिर बन सकते हैं। आज 100 साल के बाद भी लोग उनकी किताबों को बहुत पसंद करते हैं।

जोसेफ बर्ग एसेनवीन (J.B. Esenwein) अमेरिका के एक एडिटर, लेक्चरर और लेखक थे। उन्होंने दुनिया के सबसे बेहतरीन लिट्रेचर की लाइब्रेरी में अपना योगदान दिया था, जिसके लिए वे जाने जाते हैं।

अपनी आवाज को अच्छा बनाने के लिए अपने गले और फेफड़ों का खयाल रखिए।

जब हम बोलते हैं तो हमारे फेफड़ों से हवा हमारे गले तक जाती है जिससे कि आवाज बाहर निकलती है। दूसरे शब्दों में, हम जब बोलते हैं तो हमारे फेफड़ों पर प्रेशर पड़ता है और ज्यादा ज़ोर से काफी देर तक बोलते रहने पर सीने में दर्द हो सकता है। इसलिए यह जरूरी है कि आप अपने फेफड़ों का और अपनी सेहत का अच्छा खयाल रखें।

लेखक एक ऐसे पब्लिक स्पीकर को जानते थे जो बोलने की प्रैक्टिस भागते हुए करता था। इससे उसके फेफड़ों में ज्यादा हवा जाती थी और उसकी कसरत होती थी, जिससे कि स्टेज पर वो लम्बे समय तक बोल पाता था। आप चाहें तो यह तरीका अपना सकते हैं या फिर एक दूसरे तरह से भी कसरत कर सकते हैं, जो कि नीचे दिया गया है।

सबसे पहले अपने हाथों को अपने कमर पर रखिए और एक हाथ की उंगली को दूसरे हाथ ही उंगली से छूने की कोशिश कीजिए। इससे आप अपने फेफड़ों को दबा रहे है जिससे कि सारी हवा बाहर निकल रही है। इसके बाद अपने कंधों को ऊपर उठाए बिना आप साँस अंदर खींचिए । इसे बार बार दोहराइए।

फेफड़ों के अलावा आपका गला भी अच्छे से बोल पाने के लिए बहुत जरूरी होता है। इसकी कसरत करने के लिए अपनी गर्दन को फिक्स कर के अपने सीने को लेफ्ट राइट घुमाइए। ऐसा करते वक्त अपने सिर को आगे की तरफ झुकाइए। इससे आपके गले को राहत मिलेगी।

गले को खोलने के लिए आप अपने मुँह को खोलिए और उसे पूरी तरह से खुला रखकर बोलने की कोशिश कीजिए। इससे आपकी आवाज की क्वालिटी अच्छी हो जाएगी।

लेकिन आवाज अच्छी होने का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि वो तेज हो। इसका मतलब यह भी है कि वो साफ हो और स्टेज के पीछे जो लोग बैठे हैं वो भी आपकी बात को अच्छे से और साफ साफ सुन पाएं। अगर आपकी आवाज साफ होगी तो आपके फुस्फुसाने पर भी लोग आपको अच्छे से समझ पाएंगे।

ऐसा कर पाने के लिए आप अपने हाथ को अपने मुंह के पास लगाइए और यह शब्द जोर जोर से बोलिए। ‘क्रेश”, “डेश”, “व्हिल”, “बज्ज़ इन शब्दों को तब तक बोलते जब तक आप इनके वाईब्रेशन को अपने हाथों पर महसूस ना करने लगें।

अपने सुनने वालों को एक भीड़ में इकठ्ठा कीजिए ताकी आप अपनी बात को लोगों तक अच्छे से पहुंचा सकें।

क्या आपने कभी यह देखा है कि किसी सेमिनर में एक व्यक्ति ताली बजाता है और फिर सारे ही लोग अचानक से तालियाँ बजाने लगते हैं? क्या आपके साथ कभी यह हुआ है कि आपके ग्रुप में सारे लोग अचानक से ऊपर देखने लगते हैं और आप भी उसी वक्त ऊपर देखने लगते हैं?

इंसानों की इस खूबी को कोन्टेजियन कहते हैं, जिसका हिन्दी में मतलब होता है एक व्यक्ति के विचार या रोग का दूसरे व्यक्तियों तक पहुंचना इसका आसान सा मतलब होता है एक चीज़ का फैलाव।

इसका मतलब यह है कि अगर आप अपने सुनने वालों को एक भौड़ में इकट्ठा कर लेंगे, तो आप अपने विचारों को उन तक आसानी से पहुंचा सकते हैं। भीड़ में विचारों को इंफेक्शन बहुत तेजी से फैलता है। अगर एक भीड़ भरी जगह पर एक व्यक्ति अचानक से चिल्लाने लगे “आग, आग, भागो भागो”, तो सारे लोग पागलों की तरह भागने लगेंगे।

इसलिए अगर आप चाहते हैं कि सब लोग आपके विचारों को सुनें, तो उन्हें अलग अलग मत बैठने दीजिए। उन सभी को एक भीड़ में इकट्ठा कर लीजिए।

यह करने के लिए आप सबसे पहले उन अलग बैठे लोगों के पास चलते हुए जाइए और उनकी जरूरतों के बारे में, डर के बारे में और भावनाओं के बारे में बातें कीजिए। एक बार जब उन अलग बैठे लोगों को लगने लगेगा कि यहाँ पर उनके जैसे विचार वाले लोग बैठे हैं, तो वे भीड़ में जाकर मिल जाएंगे और आपकी बात को अच्छे से सुनेंगे।

लेकिन बहुत से लोग इस बात को नहीं मानते कि भीड़ में बैठने पर सारे लोग एक तरह से सोचते हैं। अगर आपको इस बात पर अब भी कोई शक है, तो इतिहास के इस एक्ज़ाम्पल पर एक नजर डालिए। 19वीं शताब्दी में सोवियत की सरकार ने यह नियम लागू किया कि कोई भी कहीं भी भीड़ नहीं लगाएगा।

उन लोगों की इस बात का डर रहता था कि अगर सारे लोग एक साथ आने लगेंगे तो सरकार से बगावत करने की चाहत अचानक फैलने लगेगी और उन लोगों को हड़ताल का सामन करना पड़ सकता है।

इसलिए आपको भीड़ इकट्ठा करने की काबिलियत अपने अदर विकसित करनी होगी। क्योंकि इसमें वो ताकत है जिससे सरकारें गिराई जा सकती हैं।

अपने बहस करने की ताकत को बढ़ाइए।

बहुत बार हम कुछ ऐसी बातें बोल देते हैं जिसे साबित कर पाने में हमें परेशानी होती है। कभी कभी हम अपनी राय देने लगते हैं और बहुत से लोग उस राय को नहीं मानते। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि आप जो भी बोलें, उसे साबित करने की ताकत भी रखें, वरना आपकी कही गई बात को आपके खिलाफ इस्तेमाल किया सकता है।

साथ ही अगर आप अपनी बात को साबित नहीं कर पाएंगे, तो लोग आप पर भरोसा नहीं करेंगे। इसके अलावा अगर आपकी कभी किसी से बहस हो जाए तो आपको उसकी बात का जवाब देना भी आना चाहिए। अपनी बात को साबित करना, और दूसरों से बहस करना, यह दोनों ही जरूरी है।

इसलिए आपको यह भी सीखना होगा कि किस तरह से आप अपनी बात को सही साबित कर सकते हैं और यह भी सीखना होगा कि किस तरह से आप अपने विरोधियों की बात को गलत साबित कर सकते हैं।

इसके लिए आपको चार बातों पर ध्यान देना होगा यो बात जिस पर बहस हो रही है, उस बात को साबित करने के सबूत, उस बात के और फोन से मतलब हो सकते हैं और उस बात के नतीजे नीचे दिए गए 8 सवालों की मदद से आप इन पहलुओं पर ध्यान देकर वो दोनों काम कर सकते हैं।

जिस बात पर बहस हो रही है, उसे अच्छे से समझने के लिए आप खुद से पूछिए कि क्या उसे साफ साफ शब्दों में कहा गया है। दूसरा सवाल खुद से यह पूछिए कि जो कुछ भी कहा गया है क्या उसे पूरी तरह से कहा गया है। क्या पूरी जानकारी दी गई है? कहीं उस जानकारी में कुछ कमी तो नहीं है?

इसके बाद आप उस बात को साबित करने के सबूत पर ध्यान दीजिए। खुद से यह सवाल पूछिए उस बात को किस एक्सपर्ट ना कहा है? क्या वो व्यक्ति वाकई में एक (एक्सपर्ट है? क्या वो सही से सोच समझ सकता है? दूसरा सवाल यह पूछिए क्या सारे फैक्ट्स पर ध्यान दिया जा रहा है? क्या वो सारे फैक्ट्स एक ही बात कह रहे हैं या अलग अलग? क्या वो सच में फेक्ट्स हैं या फिर किसी की राय है?

इसके बाद बारी आती है यह समझने की कि उस बात के और कौन कौन से मतलब हो सकते हैं। जिन फैक्ट्स के आधार पर उस बात को कहा जा रहा है, कहीं उसका कुछ दूसरा मतलब तो नहीं निकल सकता? दूसरा सवाल यह कि आप जो बात कह रहे हैं. उसे गलत साबित करने के लिए कौन कौन सी बात कही जा सकती है।

इसके बाद अंत में आता है कही गई बात के नतीजे क्या हो सकते हैं। इसमें आप खुद से यह पूछष्टि कि कहीं आपने कुछ ऐसा तो नहीं कहा है जो सबूतों पर आधारित नहीं है? और दूसरा सवाल यह कि क्या सारे सबूत एक ही बात की तरफ इशारा कर रहे हैं?

अपने सुनने वालों को एक कहानी सुनाइए ताकि वे कल्पना कर सकें।

ज्यादातर लोगों को जानकारी, नंबर्स और स्टैटिस्टिक्स नहीं पसंद हैं। लोगों को यह जानने में बिल्कुल मजा नहीं आता कि पिछले 10 सालों में सिगरेट या शराब पीने से कितने लोगों की मौत हुई। अगर आप अपने टापिक में बहुत सी जानकारी डाल देंगे, तो वो एक दम सूखी हुई लगेगी। उसमें रस भरने के लिए आपको उसे मजेदार बनान होगा।

किसी भी चीज को मजेदार बनाने के लिए कहानियों का इस्तेमाल कीजिए। कहानियाँ सुनने पर हम कल्पनाएँ करने * लगते हैं, हम अपने दिमाग में अलग अलग जगहों पर जाने लगते हैं और इस तरह से हम बोलने वाले की बात को कुछ ज्यादा ध्यान से सुनते हैं।

इसलिए अगर आप अपनी उसी बात में एक शराबी की कहानी के जरिए लोगों को इससे होने वाले नुकसान के बारे में बताएंगे, तो लोग उसे कुछ ज्यादा अच्छे से सुनेंगे। आप उनसे बताइए कि किस तरह से वो व्यक्ति रोज शराब पीकर अपनी पत्नी से झगड़ा करता था, अपने बच्चों को मारता था। इस तरह की कहानियाँ लोगों की भावनाओं के साथ खेलती हैं और उन्हें आप से चिपका कर रखती हैं।

इसके बाद आप खुद भी अपनी कल्पना का इस्तेमाल कीजिए। अपनी स्पीच को तैयार करते वक्त यह कल्पना कीजिए कि आपके सामने बहुत से लोग आपको सुनने के लिए बैठे हैं और वे आपको सुन रहे हैं। यह सोचने की कोशिश कीजिए कि आप उनके सामने किस तरह से बोलेंगे और आपकी बात को सुनने के बाद उनके क्या हाव भाव होंगे।

जब आप अपने दिमाग में अपने सुनने वालों को साफ साफ अपने सामने देखने लगें, तो यह कल्पना कीजिए कि आप उनके सामने बोलने पर कौन से गेस्चर का इस्तेमाल करेंगे। यह सोचिए कि उस गैस्चर का आपके सुनने वालों पर क्या असर होगा। किस तरह से आप अपने वाक्यों को कहेंगे।

पब्लिक स्पीकिंग का काम भी एक कवि या लेखक के काम की तरह होता है। अगर आप अपनी बात के जरिए लोगों के दिमाग में चित्र बना सकते हैं, तो आप भी एक अच्छे पब्लिक स्पीकर बन सकते हैं।

Conclusion

तो दोस्तों आपको आज का यह The Art of Public Speaking Book Summary in Hindi कैसा लगा ?

दोस्तों क्या आपको भी सपना है एक बेहतरीन पब्लिक स्पीकर बनना है ?

अगर आपके मन में कुछ सवाल या सुझाव है तो मुझे नीचे कमेंट करके जरूर बताये।

आपका बहुमूल्य समय देने के लिए दिल से धन्यवाद,

Wish You All The Very Best.

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