Unstoppable Book Summary in Hindi – मारिया शारापोवा की आत्मकथा (Part – 1)

Unstoppable Book Summary in Hindi – मारिया शारापोवा की आत्मकथा: Hello दोस्तों, अनस्टॉपेबल (Unstoppable) दुनिया की सबसे महान कही जाने वाली टेनिस खिलाड़ी मारिया शारापोवा की आत्मकथा है। इस किताब में हम पढ़ेंगे कि किस तरह से शारापोवा रुस के एक गरीब घर से निकल कर अपने पिता के साथ अमेरिका आई और किस तरह से उन्होंने दुनिया पर अपनी एक छाप छोड़ी।

अगर आप टेनिस में दिलचस्पी रखते हैं, और एक खिलाड़ी हैं या बनना चाहते हैं, तो आपको मारिया शारापोवा के बारे में जानना जरुरी है।

 

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मारिया शारापोवा (Maria Sharapova) दुनिया की नंबर वन टेनिस खिलाड़ियों में से एक हैं। उन्होंने अब तक 5 ग्रैंड स्लैम जीते हैं। वे 2001 से डब्लुटीए के साथ टेनिस में प्रतियोगिता कर रही हैं और कुल मिला कर 21 हफ्तों तक दुनिया की नंबर वन चैंपियन रही हैं।

 

Unstoppable Book Summary in Hindi – मारिया शारापोवा की आत्मकथा (Part – 1)

 

 

यह बुक समरी आपको क्यों पढ़ना चाहिए?

 

दुनिया में बहुत से महान लोग पैदा हुए।

जिन्दगी में असंभव से दिखने वाले हालातों से लड़ाई की और सबसे ऊपर पहुंचे।

हर एक व्यक्ति की कहानी अपने आप में बहुत शानदार है।

इन लोगों ने दुनिया को अपने काम से प्रेरित किया कि जिन्दगी चाहे कितनी भी मुश्किल हो, हम इसे बेहतर बनाने के लिए हमेशा कुछ ना कुछ कर सकते हैं।

यह किताब एक ऐसी ही व्यक्ति की आत्मकथा है।

 

मारिया शारापोवा की इस कहानी में हम जानेंगे कि किस तरह से वे दुनिया की नंबर वन खिलाड़ी बनीं।

यह किताब हमें उनकी जिन्दगी के हर उस पहलू के बारे में बताती है जिसने इस महान पद को हासिल करने में उनकी मदद की।

उन्होंने किस तरह से अपने कैरियर की शुरुआत की।

उन्होंने किस तरह से तरह तरह की समस्याओं को अपने पिता की मदद से पार किया।

उन्हें क्यों टेनिस से बैन कर दिया गया था।

 

 

मारिया शारापोवा बचपन से ही टेनिस खेलने लगीं थीं।

 

मारिया शारापोवा का जन्म 19 अप्रैल 1987 को साइबेरिया के न्यागन नाम के शहर में हुआ था।

वैसे तो वे रशिया की रहने वाली थीं, लेकिन जब 1986 में वहाँ पर चेर्नोबिल न्युक्लीयर अटैक हुआ तो उनका परिवार साइबेरिया चला गया।

लेकिन कुछ समय के बाद वे ब्लैक सी के किनारे एक घर में रहने के लिए चले गए।

वे अब सोची शहर में रहने लगे।

 

एक दिन शारापोवा के भाई ने उन्हें मजाक में एक टेनिस रैकेट दे दिया और उनके पिता उन्हें अपने साथ एक टेनिस कोर्ट में ले आए।

उनके पिता का नाम यूरी था।

जब 4 साल की शारापोवा के पिता अपने टेनिस की प्रैक्टिस कर रहे थे,

तो शारापोवा ने भी अपने रैकेट उठा लिया और दिवार पर बॉल मार कर खेलने लगीं।

 

यह वो वक्त था जब उनके पिता ने पहली बार उनकी काबिलियत को देखा।

वो उस खेल पर बहुत अच्छे से ध्यान लगा पा रहीं थीं।

उनके पिता को लगा कि शारापोवा के हुनर को निखारने के लिए उसे एक कोच की जरूरत पड़ेगी।

इसलिए शारापोवा को 4 साल की उम्र में उनका पहला कोच मिला।

 

बचपन में शारापोवा टेनिस खेलने के अलावा अपने दोस्तों के साथ बहुत वक्त बिताया करती थीं।

वे अपनी माँ येलीना के साथ कहानियां लिखा और पढ़ा करती थीं।

उनकी माँ उन्हें रशिया के अक्षर पढ़ना और लिखना सिखाया करत थीं और इसके अलावा वे उन्हें अलग अलग तरह की कविताएं भी पढ़ने के लिए कहती थीं।

 

कुछ वक्त के बाद शारापोवा अपना पूरा ध्यान टेनिस को देने लगीं।

उनके पिता अब उन्हें टूर्नामेंट खेलने के लिए भेजा करते थे।

लेकिन इसके अलावा उन्हें घर से बाहर निकलने की आजादी नहीं थी।

वे अक्सर अपने घर से ही सारे बच्चों को बाहर खेलते हुए देखा करती थीं।

 

 

शारापोवा के परिवार को यह एहसास हुआ कि उन्हें उनका हुनर निखारने के लिए अमेरिका जाना होगा।

 

शारापोवा प्राकृतिक रुप से टेनिस खेलने के लिए ही पैदा हुई थीं।

वे घंटों तक बिना थके और बिना अपना ध्यान भटकाए टेनिस खेला करती थीं।

एक बार जब उनके हाथ में रैकेट पकड़ा दिया जाता तो वे बिना रुके बहुत देर तक सिर्फ प्रैक्टिस किया करतीं थीं।

 

उनकी इस खासियत को उनके कोच युडकिन ने देखा।

लेकिन शारापोवा के सबसे पहले कोच थे।

वे अपनी गलियों के चैंपियन थे।

जब उन्होंने देखा कि शारापोवा का हुनर वाकई लाजवाब है तो वे सीधा उनके पिता के पास गए।

 

उन्होंने शारापोवा के पिता से कहा कि अगर वे वाकई उनके हुनर को निखारना चाहते हैं तो उन्हें किसी ऐसी जगह पर जाना होगा जहां पर उन्हें अच्छे कोच मिल सकें।

रशिया अभी अभी सोवियत यूनियन से अलग हुआ था और वहाँ पर ऐसी सुविधाएं नहीं थीं।

इसलिए अब उन्हें अमेरिका जाना होगा।

 

इसके अलावा जब एक सेक-अमेरिकी टेनिस चैंपियन मार्टिन नवरैतिलोवा ने जब रशिया में एक रैली की तो वहाँ पर शारापोवा को अपना हुनर दिखाने का एक मौका मिला।

नवरैतिलोवा ने जब शारापोवा को खेलते हुए देखा तो वे दंग रह गयीं।

वे भी उनके पिता के पास गई और उनसे कहा कि शारापोवा को एक अच्छे कोच की जरुरत है।

 

शारापोवा के पिता ने तुरंत अपनी जिन्दगी के सारे प्लान बदल दिए।

अब अगर उन्हें किसी चीज़ के लिए जीना था तो वो था शारापोवा का भविष्य बनाना।

उन्होंने फैसला किया कि वे उन्हें किसी भी हाल में अमेरिका लेकर जाएंगे।

 

 

अमेरिका पहुँच पर यूरी और शारापोवा को बहुत परेशानियाँ उठानी पड़ी।

 

यूरी अब पूरे मन से शारापोवा को एक अच्छा कोच दिलवाने के लिए काम कर रहे थे।

वे चाहते थे कि शारापोवा को रशियन टेनिस फेडेरेशन की जूनियर टीम में दाखिला मिल जाए।

उस समय यह टीम फ्रोरिडा के रिक मस्सी टेनिस अकैडमी में एक टूनामेंट की प्रैक्टिस कर रही थी।

 

रशियन टेनिस फेडेरेशन में उन बच्चों को दाखिला मिलता है जो 12 साल या उससे ज्यादा के होते हैं।

शारापोवा अभी 6 साल की थीं और उनके पिता जानते थे कि उन्हें आसानी से वहाँ पर दाखिला नहीं मिलेगा।

लेकिन फिर भी उन्होंने उनके कोच को एक चिठ्ठी लिखी।

उसमें उन्होंने लिखा कि किस तरह से नवरैतिलोवा और युडकिन ने कहा कि शारापोवा को अगर अच्छा कोच मिल जाए तो वे बहुत ऊपर तक जा सकती हैं।

 

हैरानी की बात यह थी कि यूरी के पास कोच का जवाब आया और उसने कहा कि वे उनके यहाँ फ्लोरिडा में आकर प्रैक्टिस कर सकते हैं।

अब एक समस्या खत्म हो चुकी थी और दूसरी समस्या पैदा हो गई।

 

उन दिनों रशिया से अमेरिका के लिए जा पाना लगभग नामुमकिन था।

लेकिन यूरी किसी तरह से मास्को में अमेरिकन एम्बैसी गाए और वहाँ से उन्होंने दो वीज़ा बनवाये जो कि तीन साल के थे।

अब वे शारापोवा की माँ येलीना को छोड़कर अमेरिका के लिए रवाना हुए।

 

उसके बाद वे दोनों मियामी में उतरे।

लेकिन जब वे बोका रैटन में उस टीम के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि कोच वहाँ पर नहीं थे।

उन्होंने बाकी सबको समझाने की कोशिश की लेकिन किसी ने उनकी कहानी पर भरोसा नहीं किया।

वे लोग इस बात पर यकीन नहीं कर रहे थे कि एक रशियन सिर्फ 700 डालर के साथ अमेरिका आया है और वो भी अपनी बेटी का हुनर साबित करने के लिए।

 

लेकिन वहाँ पर शारापोवा को अपना हुनर साबित करने का मौका दिया गया।

उसका हुनर देखने के बाद वहाँ के लोगों ने कहा कि जब तक वहां का मालिक रिक मस्सी नहीं आ जाता तब तक वे वहाँ पर रह सकते हैं

और उसके बाद वे फैसला करेंगे कि वे शारापोवा को टीम में लेंगे या नहीं।

 

लेकिन यूरी अब बहुत सुन चुके थे।

उन्होंने मना कर दिया और वे अपनी बेटी को ब्रेडेंटन, फ्लोरिडा में ले आए जहाँ पर फेमस कोच निक बोलेटीरी अपनी बोलेटीरी टेनिस अकैडमी चलाते थे।

 

 

शारापोवा ने बहुत जल्द अपने आप को नए माहौल में ढाल लिया।

 

अमेरिका की जिन्दगी बहुत मुश्किल थी।

यूरी को वहां की भाषा नहीं आती थी जिसे वो सीखने की पूरी कोशिश कर रहा था।

इसके अलावा वो शारापोवा के लिए टेनिस के बारे में हर तरह की जानकारी इकठ्ठा कर रहा था ताकि वो उसे आगे के लिए गाइड कर सके।

 

यूरी रोज सुबह 5 बजे उठकर अपनी बेटी को अकैडमी लेकर जाता था जहां पर वो सारा दिन प्रैक्टिस किया करती थी।

इसके बाद वो कहीं भी जाकर छोटा मोटा काम किया करता था ताकि वो उसका पेट भर सके और रहने के लिए किराया चुका सके।

यूरी का एक ही मकसद था- अपनी बेटी को दुनिया का सबसे महान टेनिस चैंपियन बनाना।

 

दूसरी तरफ शारापोवा कम उम्र की होने की वजह से दूसरों से लम्बाई के मामले में बहुत छोटी थीं।

उन्हें एक अलग तरह का रैकेट इस्तेमाल करना पड़ता था जो कि उनके कोच ने उनके लिए ला कर दिया था।

उनके कोच के शारापोवा के मुफ्त के खाने का और मुफ्त में प्रैक्टिस करने का इंतजाम कर दिया था।

 

शारापोवा के ऊपर जितनी भी मेहनत की जा रही थी वो सब कुछ समय के बाद रंग लाने लगी।

शारापोवा पहले से बेहतर बनने लगीं।

वो किसी से दोस्ती नहीं करती थीं क्योंकि वे हर किसी को अपने प्रतिद्वंद्वी की तरह देखती थीं।

 

कुछ साल के बाद उनके एक कोच – थामस हाग्सटेड ने दूसरे खिलाड़ियों से कहा कि वे मैच से पहले या मैच के दौरान शारापोवा की आँखों में ना देखें।

उनकी आँखों में टेनिस को लेकर जो जुनून था उससे हर कोई डर जाता था।

वहाँ पर जाने के बाद शारापोवा की काबिलियत बहुत तेजी से बढ़ने लगी।

उनके ध्यान लगाने की काबिलियत और ज्यादा हो चुकी थी।

 

 

समस्याओं ने यूरी और शारापोवा का साथ नहीं छोड़ा।

 

शारापोवा जिस अकैडमी में टेनिस की प्रैक्टिस किया करतीं थीं वहाँ पर अमीर लोगों के बेटे टेनिस खेलने आया करते थे।

हर कोई यह देखकर हैरान रहता था कि रशिया की यह छोटी सी लड़की किस तरह से उनके बच्चों को हरा रही है।

इसलिए बहुत जल्दी ही उन्हें बोलेटीरी की अकैडमी से निकाल दिया गया।

 

इसके बाद शारापोवा ने सीकोउ बंगोउरा के यहां ट्रेनिंग शुरु की।

बंगोउरा भी एक टेनिस चैंपियन था जिसने काफी समय तक बोलेटीरी के साथ काम किया था।

कुछ समय के बाद उसने अपनी खुद की अकैडमी शुरु कर दी।

लेकिन इस नयी अकैडमी में शारापोवा को मुफ्त में ट्रेनिंग और मुफ्त में खाना नहीं मिलता था ।

यूरी के पास इतने पैसे नहीं थे कि वो शारापोवा की फीस भर सके।

इसलिए वो भी एक कोच की तरह बंगोउरा के यहां काम करने लगा।

लेकिन बंगोउरा चाहता था कि वो शारापोवा को अपने हिसाब से काबू कर सके।

इसलिए उसने यूरी को काम से निकाल दिया।

 

इसके बाद यूरी को फिर से वो छोटे मोटे काम करने पड़े जिससे वो फीस नहीं भर पा रहा था।

मजदूरी कर कर के एक दिन उसके कमर में चोट आ गई और वो कई हफ्तों तक काम पर न जा सका।

उनकी मकान मालकिन ने किराए के लिए उन्हें घर से निकाल दिया।

इस बीच बंगोउरा ने मौके का फायदा उठाना चाहा।

 

उसने यूरी से कहा कि या तो वो शारापोवा की फीस भरे, या फिर वो एक कान्ट्रैक्ट साइन करे जिसमें वो उसे यह अधिकार दे कि वो शारापोवा को अपनी देख रेख में रख सके।

यूरी ने साइन नहीं किया और इसके बाद उन्हें सड़कों पर आ जाना पड़ा।

 

 

समय के साथ हालात फिर से अच्छे होने लगे।

 

यूरी के कुछ दिन अस्पताल में जाने की वजह से उन्हें घर से भी निकाल दिया गया था और साथ ही शारापोवा को टेनिस अकैडमी से निकाल दिया गया था।

लेकिन इसके बाद यूरी अपने जक दोस्त बॉब केन के पास रहने के लिए चला गया।

वे वहाँ पर एक साल तक रहे।

वे उनके साथ खाना खाते थे और शारापोवा उनका टेनिस याई इस्तेमाल किया करतीं थीं।

 

इस बीच बंगोउरा से आजाद होने के बाद शारापोवा बहुत अच्छा महसूस कर रहीं थीं।

वे पूरे हफ्ते प्रैक्टिस किया करतीं थीं और संडे के दिन भी प्रैक्टिस करतीं थीं।

इसका नतीजा यह हुआ कि वे ज्यादातर टूर्नामेंट जीतने लगीं और अमेरिका के टॉप खिलाड़ियों में उनका नाम आने लगा।

 

दूसरी तरफ बंगोउरा शारापोवा का इस्तेमाल कर के अपनी अकैडमी का एडवर्टाइजमेंट कर रहा था।

और जब उधर बोलेटीरी ने देखा कि शारापोवा एक के बाद एक मैच जीते जा रहीं हैं तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ।

उसने उन लोगों को ऑफर दिया कि वो वापस आ कर स्कालरशिप पर उनके यहाँ ट्रेनिंग कर सकती हैं।

शारापोवा उस वक्त 11 साल की थीं और उन्होंने इस आफर को अपना लिया।

वे वहाँ पर ट्रेनिंग करने के लिए चलीं गईं और उनके पिता केन के साथ रहने लगे।

 

Part – 2 पढ़ें।

 

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आपका बहुमूल्य समय देने के लिए दिल से धन्यवाद,

Wish You All The Very Best.

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