Vivekananda Book Summary in Hindi – स्वामी विवेकानंद जी की जीवनी

Vivekananda Book Summary in Hindi – भगवान् क्या है और कैसा दिखता है ? जब स्वामी विवेकानंद बच्चे थे तो कुछ इसी तरह के सवाल वो पूछा करते थे. उन्होंने दुनिया की हर सुख सुविधा देने वाली चीज़ को छोड़ दिया था. सिर्फ एक डंडे और कटोरे के साथ उन्होंने पूरे इंडिया की सैर कर ली थी. वो भगवान् को देखना चाहते थे और वो जल्दी ही इसमें सफल भी हो गए.

इस बुक समरी में आप स्वामी विवेकानंद के लाइफ के बारे में पढेंगे. उनमें ऐसा क्या था जो अमेरिका में सब उन्हें इतना पसंद करते थे ? क्या है उनकी कहानी, और क्यों उन्हें आज भी इतना याद किया जाता है?

 

ये बुक स्वामी निखिलानंद जी ने लेखी है।

 

 

Vivekananda Book Summary in Hindi – स्वामी विवेकानंद जी की जीवनी

 

Introduction

 

क्या आपने भगवान् को देखा है ? कुछ इसी तरह के सवाल स्वामी विवेकानंद पूछा करते थे जब वो बच्चे थे. उन्होंने दुनिया की हर सुख सुविधा देने वाली चीज़ को छोड़ दिया था. सिर्फ एक डंडे और कटोरेके साथ उन्होंने पूरे इंडिया की सैर कर ली थी. वो भगवान को देखना चाहते थे और वो जल्दी ही इसमें सफल भी हो गए.

 

इस बुक में आप स्वामी विवेकानंद के लाइफ के बारे में पढेंगे. वो जब बच्चे थे तो कैसे थे? वो कैसे इतने महान लीडर बने ? उनमें ऐसा क्या था जो अमेरिका में सब उन्हें इतना पसंद करते थे ? क्या है उनकी कहानी, उनके गोल्स और क्यों उन्हें आज भी इतना याद किया जाता है?

 

इस बुक में आप ये सब और भी बहुत कुछ जानेंगे. अपनी खोज में स्वामी विवेकानंद ने अक्सर खुद को अकेला, भूखा और किसी ना किसी सोच में खोया हुआ महसूस किया. उनके पास बस उनका विश्वास था कि उन्हें जो चाहिए वो उन्हें ज़रूर मिलेगा.

 

और एक दिन उन्होंने भगवान को देख लिया. उन्हें अपनी लाइफ का गोल मिल गया था, उन्हें साफ़ पता था कि उन्हें क्या चाहिए और जल्द ही उन्होंने उसे अचीव भी कर लिया था. स्वामी विवेकानंद ने हमेशा अच्छा काम ही किया था शायद इसलिए उनके पास खुद अच्छी चीजें आ जाती थीं.

 

 

अर्ली इयर्स (Early Years)

 

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 में मकर संक्रांति के दिन हुआ था (मकरसंक्रांति जो एक फेस्टिवल है). उस दिन गंगा नदी के किनारे बहुत से लोग पूजा करने आते थे. स्वामीजी के घर से उन सब की पूजा और आरती की आवाज़ सुनाई दे रही थी.

 

उनकी मदर भगवान् पर विश्वास करती थीं. वो बहुत पूजा पाठ किया करती थीं ताकि उन्हें एक ऐसा बेटा मिले जो उनके फेमिली का नाम ऊँचा कर सके. एक दिन उनकी मदर भुवनेश्वरी देवी ने सपने में भगवान् शिव को देखा. उन्होंने देखा भगवान् उनसे कह रहे थे कि वो उनके बेटे के रूप में जन्म लेंगे. ये सुन कर वो बहुत खुश हो गयी, उनके आँखों में खुशी के आंसू आ गए थे.

 

इसीलिये भुवनेश्वरी अपने बेटे का नाम विरेश्वर (vireswar), जोकि भगवान् शिव का एक और नाम है, रखना चाहती थी लेकिन उनके फैमिली ने स्वामीजी का नाम नरेन्द्रनाथ रखा. उन्हें सब प्यार से नरेन कह कर बुलाते थे. किसे पता था कि नरेन बड़े हो कर “स्वामी विवेकानंद” बनेंगे जिनकी सब इतनी रिस्पेक्ट करेंगे. हिन्दू रिलिजन के लिए उनका लगाव बचपन से ही साफ़ साफ़ दिखाई देता था.

 

उनका जन्म कलकत्ता के दत्ता परिवार में हुआ था. उनके परिवार में सब बहुत इंटेलीजेंट और पढ़े लिखे थे और हमेशा दूसरों की मदद करते थे जिसकी वजह से उनका बहुत नाम था, सब उनको बहुत मानते थे. नरेन के फादर कलकत्ता हाई कोर्ट में लॉयर थे.

 

नरेन अपने फादर की तरह कम और अपने ग्रैंड फादर की तरह ज्यादा थे.

 

उनके फादर को सब सुख सुविधाएं अच्छी लगती थी मगर नरेन को साधु के जैसे सिंपल रहना पसंद था. उनके जीवन की पहली टीचर उनकी मदर थीं. उन्होंने नरेन को अल्फाबेट और कुछ इंग्लिश के वर्ड्स सिखाए थे. वो उन्हें रामायण और महाभारत की कहानियाँ भी सुनाती थी. छोटे नरेन को राम जी की कहानी बहुत पसंद थी. उन्हें राम एक हीरो की तरह लगते थे जिन्होंने अपनी वाइफ सीता को बचाने के लिए लड़ाई तक कर ली थी.

 

नरेन सब बच्चों से अलग थे शायद इसलिए उन्हें सपने भी सबसे अलग आते थे. उन्हें लगता था कि हर बच्चे को ऐसे सपने आते होंगे और इसमें कोई बड़ी बात नहीं है. एक बार उन्हें सपने में एक चमकता हुआ बॉल दिखाई दिया जिसमें से बहुत रौशनी निकल रही थी और जिसका रंग बदलता जा रहा था.

 

वो बॉल धीरे धीरे और बड़ा हो रहा था और एक पॉइंट पर आकर वो फूट गया. फिर उससे निकलने वाली वाइट रौशनी उनके ऊपर गिरने लगी और उन्हें पूरी तरह से ढक लिया.

 

छोटी उम्र में भी वो लोगों पर अलग अलग रिलिजन जैसे हिन्दू मुस्लिम और अमिर गरीब में भेदभाव करने के लिए सवाल उठाते थे. एक दिन उन्होंने अपने फादर के ऑफिस में टबैको पाइप का एक बॉक्स देखा. ये उनके फादर के क्लाइंट्स के लिए था.

 

अलग अलग हिन्दू कास्ट के लिए एक बॉक्स और मुस्लिम के लिए अलग बॉक्स रखा था. नरेन् ने हर बॉक्स में से टबैको पाइप लेकर ट्राय किया. उनके फादर ने जब ये देखा तो उन्हें बहुत डांटा पर नरेन् के कहा “मुझे तो इनमें कोई फर्क दिखाई नहीं देता”.

 

नरेन् को हमेशा हर बात जानने की इच्छा रहती थी. एक बार उन्होंने अपने फादर से पूछा “आपने मेरे लिए क्या किया है”? उनके फादर बहुत समझदार थे. उन्होंने नरेन् को दर्पण में खुद को देखने के लिए कहा और बोले “अपने आप को इस दर्पण में देखो तो समझ जाओगे की मैंने तुम्हारे लिए क्या किया है”.

 

उन्होंने फिर एक दिन पूछा “पिताजी मुझे अपनी कैसी इमेज को दुनिया के सामने रखना चाहिए”? उनके फादर ने कहा “बेटा, कभी किसी चीज़ को देख कर सरप्राइज मत होना”.

 

यही कारण था कि नरेन् ने सीखा- सबकी रिस्पेक्ट करनी चाहिए और किसी को हर्ट नहीं करना चाहिए. जब वो मोंक (मोंक मतलब जो साधू के जैसे रहते हैं) बन गए तब चाहे वो किसी राजा के महल में जाते थे या किसी गरीब के घर में, वो हमेशा एक जैसा व्यवहार रहते थे, उन्हें अमीर गरीब से कोई फर्क नहीं पड़ता था.

 

 

ऐट द फीट ऑफ़ रामकृष्ण (At the Feet of Ramakrishna)

 

नरेन् जब छोटे थे तो एक दिन उन्हें दो तरह के सपने आए. पहला, एक बहुत पढ़ा लिखा आदमी है जिसके पास बहुत पैसा है और सोसाइटी में उसका नाम बहुत ऊँचा है. उसके पास एक बहुत सुन्दर घर भी है, उसकी वाइफ और प्यारे प्यारे बच्चे हैं.

 

दूसरा, एक मोंक जो एक जगह से दूसरी जगह घुमते रहते हैं. उन्हें सिंपल लाइफ पसंद है. पैसा और दूसरी सुख सुविधा देने वाली चीजें उन्हें खुश नहीं करती, उनकी बस यही इच्छा है कि वो भगवान् को जानें और उनके और पास चले जाएं.

 

नरेन् जानते थे कि वो इनमें से कुछ भी बन सकते थे. उन्होंने बहुत गहराई से सोचा और उन्हें एहसास हुआ कि वो एक मोंक की तरह ही जीना चाहते थे. दुनिया में क्या क्या नया इन्वेंट हो रहा है, क्या नया अचीवमेंट हो रहा है इसमें तो उन्हें कोई इंटरेस्ट नहीं था.

 

उनके पास एक क्लियर गोल था, उन्हें भगवान् को देखना था, उन्हें एक्सपीरियंस करना था कि भगवान् से मिलना कैसा लगता होगा. वो चाहते थे कि कोई ऐसा इंसान उन्हें रास्ता दिखाए जिन्होंने खुद ये एक्सपीरियंस किया हो, जिन्होंने खुद भगवान् को देखा हो.

 

अपनी इसी खोज में उन्होंने ब्रह्म समाज को ज्वाइन किया. एक दिन उन्होंने इस ग्रुप के लीडर से पूछा “सर क्या आपने भगवान् को देखा है?” उनकी बात सुनकर देवेन्द्रनाथ बहुत सरप्राइज हुए. उन्होंने नरेन् का मन बहलाने के लिए कहा कि “बेटे तुम एक साधू के जैसे हो, तुम्हें ज्यादा मैडिटेशन करना चाहिए”.

 

उनकी बात सुन कर नरेन् उदास हो गए, उन्हें लगा जैसा टीचर वो चाहते हैं ये वैसे नहीं हैं. उन्होंने बहुत सारे लोगों से पूछा, बहुत पता लगाया लेकिन उन्हें जो चाहिए था वो उन्हें नहीं मिल रहा था. फिर उन्होंने रामकृष्ण के बारे में सुना, जिनका मन इतना साफ़ था और जो इतनी गहराई से मैडिटेशन करते थे कि उन्होंने भगवान् को महसूस किया था.

 

नरेन् श्री रामकृष्ण से दक्षिणेश्वर मंदिर में मिले थे. वो नरेन् से मिल कर बहुत इम्प्रेस हुए. नरेन् ने पूरे मन से भजन गा कर सुनाए. रामकृष्ण समझ गए कि नरेन् दूसरे बच्चों से अलग है. ऐसा लगता था जैसे नरेन् की आँखें हमेशा मैडिटेशन में ही लीन रहती थी. वो अपने कपड़ों या वो कैसे दिख रहे हैं उस पर बिलकुल ध्यान नहीं देते थे.

 

मास्टर रामकृष्ण बहुत खुश थे कि फाइनली उन्हें एक ऐसा स्टूडेंट मिला जिसके साथ वो अपने विचार को शेयर कर सकते थे. रामकृष्ण को छोड़ कर कभी किसी टीचर ने नहीं कहा था कि उन्होंने भगवान् को सच में देखा है. अब नरेन् को विश्वास हो गया था कि वो जिन्हें खोज रहे थे वो उन्हें मिल गए हैं. एक दिन उन्होंने पूछा “मास्टरजी क्या आपने भगवान् को देखा है”? मास्टरजी ने कहा “हाँ मैंने भगवान् को देखा है. जैसे मैं तुम्हें देख पा रहा हूँ वैसे ही मैं भगवान् को भी देख सकता हूँ.

 

भगवान् को देखा जा सकता है, उनसे बातें की जा सकता है. लोग अपने फैमिली, पैसा, प्रॉपर्टी के लिए रोते हैं मगर भगवान् की एक झलक देखने की इच्छा किसी में नहीं है, कोई उन्हें देखने के लिए आंसू नहीं बहाता. अगर कोई सच में भगवान् को देखना चाहता है तो वो उन्हें देख सकता है”. ये सुन कर नरेन् के मन को बहुत शान्ति मिली.

 

 

ट्रेनिंग ऑफ़ द डिसाईपल (Training of the Disciple)

 

रामकृष्ण की डेथ के बाद सारे मोंक बेघर हो गए. नरेन् अब 23 साल के हो गए थे. अब ये उनकी रेस्पोंसिबिलिटी थी को वो नए मोंक का ध्यान रखें और उन्हें पढाएं. रामकृष्ण के एक फोल्लोवर ने उन सब को रेंट पर एक घर देने का ऑफर दिया.

 

यहीं से बारानगर मठ की शुरुआत हुई. नरेन् पूरे मन से नए स्टूडेंट्स को पढ़ाने में लग गए. घर में सबसे बड़े होने के कारण वो दिन भर अपनी फैमिली की तरफ अपनी ड्यूटी पूरी करते और रात को मठ में अपने स्टूडेंट्स और भाइयों को सिखाने चले जाते.

 

बारानगर में रामकृष्ण के स्टूडेंट्स एक दूसरे के साथ बहुत घुल मिल गए थे, वो सब बहुत प्रेम से रहते थे. रामकृष्ण की सिखाई हुई बातों ने उन सब को जैसे एक धागे में मोतियों की तरह एक साथ जोड़ कर रखा हुआ था. सारे स्टूडेंट्स ने साधू के जैसा जीवन पूरी तरह से अपना लिया था.

 

वो अपना पूरा दिन पूजा, पढाई, मैडिटेशन में और भजन गाने में बिताते थे. इन सब में वो इतने खो जाते कि कभी कभी खाना तक भूल जाते थे. ये सब करना उन्हें इतना पसंद था कि उन्हें भूख का भी ध्यान नहीं रहता था. पर जब भी वो कुछ खाते तो सिर्फ राइस और उसमें वो स्वाद के लिए नमक तक नहीं डालते थे. इन सब के बाद भी सारे मोंक बहुत खुश थे, उन्हें किसी चीज़ की कमी नहीं लगती थी.

 

उनका मानना था कि किसी भी चीज़ का शौक हमें इस दुनिया में फंसा कर रखता है, भगवान् से दूर ले जाता है और टेस्टी खाना इनमें से एक है जिसकी आदत वो नहीं लगाना चाहते थे. कई बार वो महीनों तक सिर्फ बॉयल्ड राइस खाया करते थे. कभी कभी उसमें बस थोडा सा नमक या कोई हर्ब मिला देते थे.

 

वो सब सिंपल कपडे पहनते थे. हर मेम्बर के पास बस दो जोड़ी कपडे थे. वो जब कभी मठ बाहर जाते तो एक दूसरे के साथ कपडे शेयर करते थे. सोने के लिए वो ज़मीन पर स्ट्रॉ मैट बिछा कर सोते थे. उनके कमरे की दीवार पर भगवान् और साधुओं की फोटो लगी हुई थी.

 

नरेन् चाहते थे कि उनके साथ जितने भी लोग हैं, जितने भी भाई हैं उन्हें हर चीज़ के बारे में पूरी नॉलेज हो. वो उनके साथ बहुत सी बातें शेयर करके उनकी नॉलेज को बढाते थे. दुनिया की अलग अलग जगहों के बुक्स पढ़ कर के सुनाते थे. नरेन् उन्हें दूसरी कन्ट्रीज के हिस्ट्री और पोलिटिकल सिस्टमके बारे में भी बताते थे.

 

उन्होंने उन सब को प्लेटो, एरिस्टोटल, बुद्ध, हेगेल, केंट और भी बहुत से लोगों के बारे में बताया. उन्होंने कर्म, योग, भक्ति और ज्ञान के बारे में समझाया और सिखाया जिससे उनकी नॉलेज लाइफ के हर एरिया में बहुत अच्छी हो गयी थी. अगर वो सब कभी थक जाते तो भजन गा कर खुद को रिलैक्स कर लेते थे.

 

 

ऐज़ अ वांडरिंग मोंक (As a Wandering Monk)

 

एक टाइम आया जब नरेन् खुद के अन्दर की शक्ति को टेस्ट करना चाहते थे. वो चाहते थे कि सारे मोंक इंडिपेंडेंट बनना सीखें. इसलिए वो इस जर्नी पर निकल पड़े. उनकी हमेशा से इच्छा थी कि वो एक साधू की तरह हर जगह घूम सके, अब उनकी विश पूरी होने वाली थी.

 

उनके पास सिर्फ एक डंडा और एक कटोरा था. बस वो ऐसे ही चलते रहे, आगे बढ़ते रहे. इसी ने उन्हें एक सिंपल मोंक से स्वामी विवेकानंद बना दिया जिन पर हिन्दुओं को इतना गर्व है.

 

सबसे पहले वो वाराणसी गए जिसे इंडिया का सबसे पवित्र जगह माना जाता है. ये वही जगह है जहां बुद्ध और शंकराचार्य जैसे संतों को भगवान् से ज्ञान मिला. नरेन् को यहाँ आ कर बहुत अच्छा लगा मानो जैसे उनमें एक नयी एनर्जी भर गयी हो.

 

तभी एक दिन नरेन् वाराणसी में घूम रहे थे कि तभी बंदरों की फौज उनके पीछे पीछे चलने लगी और उन पर अटैक करने लगी . नरेन् जितना तेज़ हो सकता था भागने लगे. तभी वहाँ एक बूढ़े मोंक ने चिल्ला कर कहा “इनका सामना करो, इनका सामना करो”.

 

ये सुन कर नरेन् पीछे घूमे, पूरी हिम्मत करके उन्होंने उन बंदरों को गुस्से से देखा, ऐसा लगा जैसे वो उन्हें मारने वाले हों और सच में बन्दर डर कर भाग गए. स्वामी जी ने ये लेसन दूसरे लोगों को भी सिखाया कि लाइफ में आने वाली प्रोब्लम्स का सामना करना सिखना चाहिए. वो हमें कितना भी डरा रहा हो पर हमें उससे भागना नहीं चाहिए बल्कि पूरी हिम्मत से उसका सामना करना चाहिए.

 

वाराणसी से नरेन् अयोध्या चले गए, जो भगवान् राम का घर है. वहाँ से वो लखनऊ गए जो मुस्लिम पैलेसेज और गार्डन के लिए फेमस है. इसके बाद उन्होंने ताज महल देखा जिसकी सुन्दरता देख कर उनकी आँखों में आंसू आ गए. फिर वृन्दावन में वो भगवान् कृष्ण की कहानी से बहुत ही inspire हुए.

 

इंतना लम्बा सफ़र नरेन् ने नंगे पैर और बिना पैसों के तय किया. एक दिन एक अछूत (untouchable) टोबैको पाइप पी रहा था, नरेन् ने उससे पाइप माँगा. मगर उसने देने से मना कर दिया क्योंकि ये हिन्दू रिलिजन के खिलाफ था. नरेन् का मूड खराब हो गया और उन्होंने खुद से कहा कि कितने शर्म की बात है कि हम इतने बुरे कास्ट सिस्टम में फंसे हुए हैं.

 

नरेन् वापस उस आदमी के पास गए और उससे टोबैको पाइप माँगा, उसने फिर मना कर दिया पर अब नरेन् नहीं मानने वाले थे और आखिरकार उन्होंने उससे पाइप लेकर पी ही लिया. अगले कुछ समय तक नरेन् नार्थ इंडिया में रहे.

 

वो आर्यावर्त या आर्यन की पवित्र जगह थी. यही वो जगह है जहां से इंडिया की स्पिरिचुअल ट्रेडिशन की शुरुआत हुई थी. हमें उपनिषद् और वेद यहीं से मिले थे . दूसरे कल्चर जैसे हंस, ग्रीक, मुग़ल ने भी इन पवित्र बुक्स को लिखने में मदद की थी. इसी तरह से तंत्र और पुराण बने. इंडिया सच में एक अनोखा देश है जो इतने अलग अलग रिलिजन और कल्चर से बना है.

 

 

ट्रिप टू अमेरिका (Trip to America)

 

ये अपने आप में कितना अमेजिंग है कि स्वामी विवेकानंद ने कन्याकुमारी या केप कोमोरिन तक ट्रेवल किया. एडवेंचर की इच्छा ने उन्हें नार्थ इंडिया से साउथ इंडिया तक पहुंचा दिया था. रामेश्वरम में स्वामीजी की मुलाक़ात राजा रामनाद से हुई . वो भी उनके स्टूडेंट बन गए. वो रामनाद ही थे जिन्होंने स्वामीजी को अमेरिका में शिकागो जाने के लिए कहा ताकि वो पार्लियामेंट ऑफ़ रिलिजन में हिन्दू रिलिजन के बारे में सबको बता सकें.

 

राजा ने सारा खर्च उठाने का वादा किया. स्वामीजी ने केप कोमोरिन में स्विमिंग भी की, वो अपनी जर्नी पूरी होने से बहुत खुश थे. पूरे इंडिया में घूम कर वो और भी ज्यादा समझदार और जानकार हो गए थे. और सबसे ज़रूरी बात, उन्हें इंडिया में रहने वाले लोगों की गरीबी और तकलीफ के बारे में पता चला.

 

ज्यादातर लोग बहुत गरीब थे. लैंडलॉर्ड, रूलर्स और पुजारियों ने बहुत अत्याचार कर रखा था. कास्ट सिस्टम ने लोगों का जीना बहुत मुश्किल कर दिया था. स्वामीजी जानते थे कि क्योंकि वो संत हैं, उनकी ड्यूटी है भगवान् की सेवा करना.

 

मगर स्वामीजी को ये एहसास हुआ कि भगवान् तो हर इंसान में है, उन्हें अगर भगवान् की सेवा करनी है तो पहले लोगों की सेवा करनी होगी. इसलिए स्वामी जी ने फैसला किया कि वो अपनी नॉलेज और गुणों को लोगों की सेवा करने में यूज़ करेंगे.

 

पर वो ये कैसे कर पाएँगे ? उनके पास कुछ नहीं था, उनके सारे फोल्लोवर्स भी गरीब थे. तब उनको लगा कि उन्हें दुनिया से मदद मांगनी चाहिए, वो इंडिया की गरीबी और तकलीफ को वेस्टर्न कन्ट्रीज के लोगों के साथ शेयर करना चाहते थे.

 

स्वामीजी को अमेरिका में एक होप और ओप्परोचुनिटी दिखाई दी. वहाँ कोई कास्ट सिस्टम नहीं था. पार्लियामेंट ऑफ़ रिलिजन एक बहुत अच्छा मौका था इंडिया के लिए मदद मांगने का. स्वामीजी से उन्हें इंडिया का ancient नॉलेज और ज्ञान मिल सकता था और बदले में इंडिया उनसे मॉडर्न टेक्नोलॉजी के बारे में सीख सकता था. केप कोमोरिन से स्वामी जी मद्रास चले गए. अब तक लोग उन्हें पहचानने लगे थे. लोगों ने उन्हें वहाँ पर वेलकम किया.

 

स्वामीजी ने उनको अमेरिका जाने का कारण बताया. स्वामीजी को लोग बहुत मानते थे इसलिए मद्रास में उनके बहुत से फोल्लोवर्स बन गए. स्वामीजी की ट्रिप के लिए उन सब ने मिल कर पैसा जमा किया. मद्रास में स्वामीजी ने कुछ सालों बाद प्रॉपर प्लानिंग के साथ काम शुरू किया था. जब लोगों ने उनको पैसे दिए तो स्वामीजी ने लेने से मना कर दिया और कहा कि उसे गरीबों में बाँट दिया जाए.

 

हैदराबाद में स्वामीजी ने पहली बार लोगों के सामने लेक्चर दिया. इसका नाम उन्होंने “माय मिशन टू द वेस्ट” रखा. बहुत सारे लोग उनको सुनने के लिए आये थे. उनकी समझ और नॉलेज से वो बहुत इम्प्रेस हुए. पहली बार स्वामीजी को ये पता चला कि वो लोगों के सामने बहुत अच्छे से बोल सकते थे.

 

एक दिन उन्होंने एक सपना देखा. रामकृष्ण समुद्र की तरफ बढ़ रहे थे, वो स्वामीजी को उनके पीछे आने के लिए कह रहे थे. उन्होंने सारदा देवी को भी “जाओ” बोलते हुए सुना. उन्हें ऐसा लगा कि ये उस लैटर का जवाब है जो उन्होंने अमेरिका वाली ट्रिप के बारे में लिखा था. अब उन्हें समझ में आ गया था की रामकृष्ण और माँ सरदा देवी की ब्लेस्सिंग उनके साथ है. उन्हें विश्वास हो गया था कि ये वही है जो उन्हें करना है और वो सही रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं.

 

 

द पार्लियामेंट ऑफ़ रिलिजनस (The Parliament of Religions)

 

बॉम्बे से शिकागो की जर्नी बहुत लम्बी थी. स्वामीजी समुद्र के रूट से ट्रेवल कर रहे थे. ये जर्नी उनके लिए बहुत adventurous थी. उनकी मुलाक़ात कुछ इंटरेस्टिंग लोगों से हुई. उन्होंने हांगकांग और सिंगापुर के सी पोर्ट्स देखे. वो चाइना और जापान के टेम्पल्स में भी गए. शिप पसिफ़िक ओसियन को क्रॉस कर चुका था. स्वामी जी ने शिकागो जाने के लिए वेंकुवर, कनाडा से ट्रेन ली. स्वामीजी को पता चला कि वो एक महीने पहले ही पहुँच गए हैं.

 

यहाँ तक आने में जितने लोगों ने उनकी मदद की थी उनमें से किसी को भी इस बारे में कुछ पता नहीं था. अमेरिका के लोग स्वामी जी के ऑरेंज कपड़ों और टर्बन को देख कर हैरान थे, उन्होंने ऐसे कपडे कभी नहीं देखे थे. जब वो रास्ते पर चलते थे तो छोटे बच्चे उनको फॉलो करने लगते थे.

 

वहाँ ऐसा भी समय आया जब स्वामी जी रास्ता भूल जाते थे, उनके पास खाने, रहने और ट्रेवल करने के लिए पैसे नहीं होते थे. मगर उन्हें कोई ना कोई स्ट्रेंजर हमेशा हेल्प कर देता था. स्वामी जी को लगता था जैसे भगवान् उनके साथ ही हैं और हमेशा उनको देख रहे हैं, वो इन strangers को उनकी मदद करने के लिए भेज रहे हैं ताकि उनका मिशन ठीक से पूरा हो सके.

 

पार्लियामेंट ऑफ़ रिलिजन september 1893 में खोला गया. ये एक मेले जैसा था जो “वर्ल्ड स कोलमबियन एक्सपोसिशन” (World’s Columbian exposition) नाम के एक इवेंट का पार्ट था. जब क्रिस्टोफर कोलंबस ने अमेरिका को खोजा था ये उसे सेलिब्रेट करने के लिए मनाया गया था.

 

इसका मकसद ये दिखाना था कि वेस्टर्न कन्ट्रीज साइंस और टेक्नोलॉजी में कितना आगे बढ़ गया है. क्योंकि रिलिजन भी हमारे लाइफ का एक इम्पोर्टेन्ट हिस्सा है इसलिए उसे भी शामिल किया गया था.

 

उस हॉल में कम से कम 7,000 लोग जमा हुए थे. पूरी दुनिया से रिलीजियस लीडर्स आये थे. हर रिलिजन को पेश करने के लिए एक लीडर को भेजा गया था, ये रिलिजन थे इस्लाम, क्रिश्चियनिटी, शिन्तोइस्म, कन्फूशियनिस्म, बुद्धिज़्म, हिंदूइस्म और जैनिज़्म. हर एक लीडर को सामने आ कर स्पीच देना था. स्वामीजी बहुत नर्वस थे, उन्होंने कोई स्पीच नहीं लिखी थी.

 

उन्हें पता नहीं था की उन्हें इसकी ज़रुरत पड़ेगी. वो पहली बार इतने सारे लोगों के सामने स्पीच देने वाले थे. उन्होंने वहाँ काम करने वाली टीम से कहा कि उन्हें सबसे लास्ट में बुलाया जाए. आखिर, उनके बोलने की बारी आ गयी. उनके पहले वर्ड्स थे “ब्रदर्स एंड सिस्टर्स ऑफ़ अमेरिका”. उनके वर्ड्स ने वहाँ सभी लोगों का दिलजीत लिया,उन के खड़े हो कर उनके लिए तालियाँ बजाई. सबको लगा की कोई अलग आया है जिसने पूरे मन से ये कहा और जिनकी बातों में सच्चाई है.

 

वो सबसे ये कहना चाहते थे कि हमें एक दूसरे को accept करना सीखना होगा. हमें एक दूसरे को समझने की और शान्ति बना कर रखने की ज़रुरत है, कोई हमसे अलग है तो क्या हुआ हमें सबकी रिस्पेक्ट करना चाहिए. उन्होंने बताया की कैसे पुराने समय में इंडिया ने ज़ोरास्त्रियन और इजराइल के लोगों को सहारा दिया था और इंडिया में रहने की जगह दी थी.

 

वो समझा रहे थे कि अलग अलग रिलिजन के लोग छोटी छोटी नदी की तरह हैं, जो अलग तो हो सकतेहैं मगर सब अंत में समुद्र में जा कर मिल जाते हैं, एक हो जाते हैं और वो समुद्र है भगवान्. उन्होंने सिर्फ अपने रिलिजन के बारे में बात नहीं की बल्कि दुनिया के सारे रिलिजन के बारे में बताया.

 

उनकी यही बात और सोचने का तरीका उन्हें भीड़ में सबसे अलग बनाती थी. समय के साथ दुनिया बहुत मॉडर्न हो गया था और इसी मॉडर्न दुनिया से उन्होंने रिक्वेस्ट किया कि हमें भेदभाव को ख़त्म करना होगा. हर जाती, रंग और कास्ट को accept करना होगा. स्वामीजी ने कहा कि हम सब बिलकुल एक जैसे हैं इसलिए ये भेदभाव बंद होना चाहिए.

 

स्वामीजी की वो ख़ास बात जो उन्हें दूसरों से अलग बनाती थी वो ये थी कि उन्होंने कभी किसी दूसरे रिलिजन की बुराई नहीं की. उन्होंने कभी किसी एक रिलिजन को सही और बाकी सबको गलत प्रूव करने की कोशिश नहीं की. उनका मानना था कि सब रिलिजन हमें भगवान् तक ले जाने का रास्ता है. वो कहते थे कि किसी मकान के अन्दर जाने के बहुत सारे दरवाज़े हो सकते हैं.

 

पार्लियामेंट के लास्ट डे उन्होंने कहा कि पार्लियामेंट ऑफ़ रिलिजन ने ये प्रूव कर दिया है कि हर रिलिजन दान करने, मदद करने में विश्वास करता है. उन्होंने कहा कि “अगर एक भी ऐसा रिलीजियस लीडर है जो अपने रिलिजन को ऊपर रख कर दूसरों को दबाना चाहता है, तो मुझे उस पर दया आती है”. उन्होंने कहा कि जल्द ही हर रिलिजन का एक ही स्लोगन होगा “शांन्ति और प्रेम, तोड़ फोड़ और विनाश नहीं.

 

एक रात में ही स्वामीजी जैसे एक सेलेब्रिटी बन गए थे. लोग उनकी बातों को और उनकी सच्चाई को बहुत पसंद करते थे. पूरे शिकागो में स्वामीजी की फोटो के बड़े बड़े पोस्टर लगे हुए थे. उनकी फोटो के नीचे लिखा था “द मोंक विवेकानंद”, जो भी उनकी फोटो के सामने से गुज़रता था वो वहाँ रुक कर सिर झुका कर जाता था. पार्लियामेंट ऑफ़ रिलिजन के बारे में इंडिया में खबर आने लगी.

 

न्यूज़पेपर और मैगज़ीन में स्वामीजी की स्पीच छपने लगी. सारे हिन्दुओं को बहुत प्राउड फील हो रहा था. मठ में जो उनके भाई थे उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि ये वही नरेन् हैं जिनका इनका नाम हो गया है. जब स्वामीजी ने उनको लैटर लिखा तब जा कर उन्हें विश्वास हुआ.

 

अमेरिका में स्वामीजी की लोग बहुत मदद करते थे लेकिन वो उन पर डिपेंडेंट नहीं रहना चाहते थे इसलिए वो अमेरिका में जगह जगह लेक्चर देने लगे ताकि उन्हें कुछ पैसे मिल सकें. हर जगह उन्होंने दया और सबको accept करने वाली सोच को फैलाने की कोशिश की.

 

स्वामीजी ने न्यू यॉर्क, बोस्टन, वाशिंगटन और कैंब्रिज में लेक्चर दिया. उनका जो गोल था वो अब जा कर पूरा हुआ था. उन्होंने पूरी दुनिया को हिन्दू रिलिजन और उसके विचारों के बारे में बताया था और इसी वजह से अब वो इंडिया में गरीब लोगों की मदद कर सकते थे.

 

 

वेदांत इन अमेरिका (Vedanta in America)

 

गरीब स्टूडेंट्स के एक ग्रुप ने न्यू यॉर्क में एक सस्ता फ्लैट रेंट पर लिया. उन्होंने पैसा जमा करना शुरू किया ताकि स्वामी जी वहाँ रेगुअल लेक्चर दे सकें. वो ज़मीन पर बैठते थे और लोगों को जहां जगह मिल जाती थी वो वही खड़े हो जाते थे. वहाँ का दरवाज़ा हमेशा खुला रहता था.

 

स्वामी जी फ्री में लेक्चर देते थे, एक बार सुबह और एक बार शाम को. स्वामी जी को इन स्टूडेंट्स को पढ़ाना बहुत अच्छा लगता था, ये सब कुछ नया जानना और सीखना चाहते थे. उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था की भीड़ हो गयी है या उनके पास बैठने की जगह नहीं है. वो बस ध्यान से स्वामी जी की बातें सुनते थे.

 

स्वामीजी ने उन्हें ज्ञान योग के बारे में सिखाया ताकि वो वेदांत के सच के बारे में जान सकें. वेदांत हमें ये सिखाता है कि हम सब के अन्दर भगवान् है, इसलिए रिलिजन का सही मतलब होता है अपने अन्दर के भगवान् को ढूंढना और उसे पहचानना.

 

उन्होंने उन्हें राज योग भी सिखाया ताकि वो कंसंट्रेशन, मैडिटेशन और सेल्फ कण्ट्रोल में मास्टर बन सकें. उनके स्टूडेंट्स उनके सिंपल लाइफ को फॉलो करने की कोशिश करते थे. वो भी स्वामीजी की तरह किसी गलत सोच या काम से बचने की कोशिश करते थे.

 

कई स्टूडेंट्स ऐसे थे जो इन सब को लेकर बहुत सीरियस थे, उनके साथ स्वामीजी रोज़ मैडिटेशन किया करते थे. उन्होंने ये भी सिखाया कि कैसे डीप कंसंट्रेशन से हम अपने बॉडी से अलग होकर भी खुद को फील कर सकते हैं.

 

अमेरिका में स्वामी जी ने अपनी लिखी हुई बुक्स को पब्लिश किया जो बहुत फेमस हुई और जिन्हें आज भी पढ़ा जाता है. वो हैं राज योग, ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्म योग. उनके फोल्लोवर्स को ये बुक्स बहुत पसंद आए. इसमें प्रोफेस्सर्स, डॉक्टर्स, बिजनेसमैन और चर्च के लीडर्स भी शामिल थे.

 

 

रिटर्न टू इंडिया (Return to India)

 

हज़ारों लोग पोर्ट पर स्वामी जी के आने का वेट कर रहे थे. जब उनके कपडे की एक झलक दिखाई दी तो वो सब बहुत खुश हो गए. सब उनका नाम ले कर चीयर कर रहे थे. उनको रिस्पेक्ट देने के लिए वो सब ज़मीन पर बैठ गए.

 

स्वामीजी को सीलोन के लीडर्स ने वेलकम किया. उनके लिए एक बड़ा जुलूस निकाला गया. एक इंडियन बैंड उनके लिए म्यूजिक बजा रहा था, उनके ऊपर फूल बरसाए जा रहे थे और रोज वाटर और गंगाजल डाला जा रहा था. हवा में अगरबत्ती की खुशबू थी. लोग उन्हें फ्रूट्स और गिफ्ट्स दे रहे थे.

 

इस खुशी और जोश को देख कर स्वामीजी ने इसकी बहुत तारीफ की. लोगों ने उनके लिए जो किया उन्होंने बड़े प्रेम से उसे accept किया. उन्होंने हिन्दुओं को भगवान् में विश्वास करने और उनकी भक्ति के लिए उनकी तारीफ की.

 

स्वामी जी ना तो कोई राजा थे, ना रिच थे, ना वो आर्मी में थे फिर भी सब उनकी बहुत रिस्पेक्ट करते थे. वो तो एक मोंक थे जिनके पास न तो पैसे थे और ना ही घर. लोग उनको उनके ज्ञान और उनकी सोच के लिए पसंद करते थे और ये अपने आप में बहुत बड़ा अचीवमेंट था, वो इन सब के लिए ग्रेटफुल थे.

 

स्वामीजी पहले मद्रास गए फिर कलकत्ता. वो जहां भी जाते लोग उन्हें वेलकम करने के लिए वेट करते थे. लोगों में उन्हें देखने और उनकी बातें सुनने की बहुत इच्छा थी. एक बार उनके एक फोल्लोवर ने उनसे पूछा “क्या आप इन सब से थक नहीं जाते”, स्वामी जी ने कहा “भगवान् का काम करने में थकान नहीं होती है”.

 

कुछ लोग ऐसे भी थे जो उनके साथ डिबेट करने आते थे या वो जो सिखाते थे उस पर सवाल उठाने आते थे. कुछ ऐसे लोग भी आते थे जो उनकी नॉलेज को टेस्ट करना चाहते थे. स्वामीजी सब से मिलते थे मगर उनका ध्यान ज्यादा उन स्टूडेंट्स पर रहता था जो सच में कुछ सीखना चाहते थे. स्टूडेंट्स को पढ़ाना उन्हें सबसे ज्यादा पसंद था.

 

एक दिन उनके पास एक आदमी आया जो बहुत परेशान था. उसने कहा कि उसने सब कुछ करके देख लिया लेकिन वो भगवान् को नहीं ढूंढ पा रहा है. उसके टीचर जैसा कहते थे वो वैसा ही करता था. भगवान् की मूर्ति की पूजा करता था, आँखें बंद करके अपने रूम में मैडिटेशन करने की कोशिश करता था फिर भी उसे मन की शान्ति नहीं मिलती. “मैं क्या करूँ”? उसने स्वामीजी से पूछा.

 

स्वामीजी को उस पर दया आ गयी, उन्होंने कहा “अपने दरवाज़े, अपनी आखें खोलो, अपने चारों तरफ देखो”.

 

उन्होंने उसे अपने आस पास गरीब और कमज़ोर लोगों को देखने को कहा और बोले कि उसे पूरी मेहनत और मन से उनकी मदद करनी चाहिए. “अगर वो भूखे हैं तो उन्हें खाना दो, अगर वो बीमार हैं तो उन्हें दवाई दो, अगर वो पढ़े लिखे नहीं हैं तो उन्हें पढाओ. पूरे मन से उनकी सेवा करो तभी तुम्हें शान्ति मिलेगी”.

 

 

इन नॉर्दर्न इंडिया (In Northern India)

 

स्वामीजी को अस्थमा हो गया था, डॉक्टर्स ने उन्हें नार्थ इंडिया जाने के लिए कहा क्योंकि वहाँ क्लाइ मेट अच्छा रहता था. नार्थ के लोग बहुत समय से स्वामीजी को बुला रहे थे इसलिए स्वामी जी मान गए . अपने फ्रेंड को लिखे लैटर में उन्होंने कहा कि वो बहुत थकान महसूस करते हैं.

 

उनके लैटर में लिखा था “मैं खुश हूँ, मैंने कुछ लोगों में भलाई करने की इच्छा को जगाया है. मैं बस यही तो चाहता था. मैंने अपना काम कर दिया, अब डेस्टिनी को अपना काम करने दो. मैंने ज़िन्दगी को देख लिया, मुझसे जितना अच्छा हो सका मैंने किया, मैं खुश हूँ.’

 

स्वामीजी ने नार्थ इंडिया के हर स्टेट में लेक्चर दिया. वो अल्मोरा, जम्मू, लाहौर और भी बहुत सी जगह गए. सब जगह उन्होंने इसी बात पर जोर दिया कि हर एक को खुद को अच्छा इंसान बनाना होगा. एक एक करके सब अच्छे होते जाएँगे तो पूरा देश अच्छा और स्ट्रोंग बन जाएगा. उन्होंने कहा कि लाइफ में आप किसी भी रास्ते पर चलें लेकिन खुद को एक अच्छा इंसान बनाना सबसे इम्पोर्टेन्ट है.

 

अपने अन्दर प्यार, सेल्फ रिस्पेक्ट, हिम्मत और दूसरों की मदद करने की भावना जैसी क्वालिटीज़ को डेवेलप करना चाहिए क्योंकि ये आपको बहुत स्ट्रोंग बना देता है. उन्होंने लोगों से संस्कृत लैंग्वेज को प्रमोट करने के लिए भी कहा ताकि हिन्दू रिलिजन कहीं ख़तमे ना हो जाए.

 

स्वामीजी एकता को बढ़ावा देने के लिए एक कास्ट का दूसरे कास्ट में शादी करने की बात भी करते थे. उन्होंने यूनिवर्सिटीज को भी कहा कि स्टूडेंट्स को सिर्फ क्लर्क, लॉयर या डिप्लोमेट ना बनाए बल्कि उन्हें अपने देश की सेवा करने और अपने देश से प्यार करना भी सिखाये.

 

उन्होंने हमें ये भी सिखाया कि इंडिया में दोनों रिलिजन इस्लाम और हिन्दू साथ मिल कर रह सकते हैं. कुरान और वेद दोनों ही इंसान को आगे बढ़ने का रास्ता दिखा सकते हैं. बहुत से यंग लोग स्वामीजी से इंस्पायर हो कर उनकी तरह संत बन कर रहना चाहते थे. वो उनके पास सीखने और ट्रेनिंग लेने आते थे. स्वामीजी उन्हें सिखाने में जुट गए कि भगवान् को कैसे पाया जा सकता है और कैसे हमें दूसरों की मदद और सेवा करनी चाहिए.

 

स्वामीजी के वेस्टर्न फ्रेंड्स ने एक नए मठ को बनाने में मदद की, इसका नाम बेलूर मठ था. ये रामकृष्ण के फोल्लोवेर्स के लिए हेड क्वार्टर बन गया. हर रोज़ बहुत से लोग स्वामीजी से मिलने आते, उन्हें हज़ारों लेटर्स भी आते थे. लोग भगवान को पाने में उनकी मदद लेना चाहते थे, उनसे सीखना चाहते थे.

 

 

टुवर्ड्स द एंड (Towards the End)

 

अंत में स्वामीजी बेलूर मठ में रहने लगे. उनका अस्थमा और खराब होता जा रहा था. डॉक्टर्स ने उन्हें सब काम छोड़ कर रिटायर होने के लिए कहा. स्वामीजी अब ज्यादा समय मठ के अन्दर ही रहते थे.

 

कभी कभी वो वॉक करने निकलते थे, कभी किचन में जा कर देखते कि सब काम ठीक से चल रहा है ना. कभी कभी तो खुद भी खाना बना लिया करते थे. कभी नए मोंक्स के साथ भजन गाने लगते थे. स्वामीजी ने स्टडी करना चालु रखा और खुद को उसमें बिजी कर लिया.

 

हमारी जो सेक्रेड बुक्स हैं वो उनके बारे में भी लेक्चर दिया करते थे. दिन ब दिन उनकी बॉडी वीक होती जा रही थी मगर उनका माइंड अभी भी बहुत शार्प था. अगर कोई मोंक उन्हें रेस्ट करने के लिए कहता तो वो मानते नहीं थे.

 

स्वामीजी को इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका बहुत पसंद आई. एक मोंक ने कहा कि इस बुक के सारे 25 वॉल्यूम को याद करना बहुत मुश्किल है पर स्वामीजी तब तक 11th वॉल्यूम शुरू कर चुके थे.

 

उन्होंने उस मोंक से कहा कि जो 10 वॉल्यूम वो पढ़ चुके हैं उनमें से वो कुछ भी पूछ सकता है. वो मोंक बहुत सरप्राइज हुआ ये देख कर कि स्वामीजी को सारे जवाब आते थे. यहाँ तक की उन्होंने उन बुक्स की कुछ लाइन्स भी बोल कर दिखाई.

 

बेलूर मठ के पास कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था. वहाँ काम करने वाले गरीब और अनपढ़ वर्कर्स को स्वामीजी ने देखा. ऐसा लगा जैसे सोसाइटी को इन लोगों से कुछ मतलब ही नहीं था. स्वामीजी को उन पर बहुत दया आई. वो उनसे बातें किया करते और उनकी लाइफ की कहानी पूछा करते थे.

 

एक दिन उन्होंने उन लोगों के लिए अच्छा खाना बनवाया, ऐसा जैसा उन लोगों ने कभी नहीं खाया होगा. खाने के बाद स्वामीजी ने उनसे कहा कि वो सब “नारायण” हैं, मतलब भगवान् विष्णु का रूप. उन्होंने कहा वो बहुत खुश हैं क्योंकि उन्होंने भगवान् को खाना खिलाया है. स्वामीजी ने अपने स्टूडेंट से कहा “मैंने सच में इन लोगों के अन्दर भगवान् को देखा, देखो ये कितने सिंपल और सच्चे हैं”.

 

स्वामीजी को महसूस हो गया था कि वो 40 की ऐज तक नहीं पहुँच पाएँगे, उनकी ऐज उस समय 39 साल 5 महीने हो चुकी थी. उन्होंने पंचांग भी देखा ये कैलकुलेट करने के लिए कि उनकी डेथ कब होने वाली है.

 

स्वामीजी ने अपने सीनियर मोंक को बता दिया था कि अपना अंतिम संस्कार वो कहाँ चाहते थे. वो उसी मठ के ग्राउंड में एक जगह थी. फ्राइडे शाम 7 बजे बेल बजी, पूजा का समय हो गया था. स्वामी जी अपने रूम में पूजा और मैडिटेशन करने चले गए. उन्होंने अपने सेवक से कहा कि वो एक घंटे रूम में रहेंगे और कोई उन्हें डिस्टर्ब ना करे.

 

उसके बाद स्वामीजी ने अपने सेवक को मदद के लिए बुलाया. रूम के सभी विंडोज को खोला गया ताकि फ्रेश हवा आ सके. स्वामीजी बेड पर लेट गए, उनके सेवक ने सोचा की वो सो गए हैं.

 

वो वैसे ही लेटे रहे. उनके चेहरे पर बहुत शान्ति थी, वो लम्बी सांसें ले रहे थे. फिर उनके हाथ कांपने लगे. उनके नाक, आँख और मुँह से ब्लड निकलने लगा. “योग” बुक में बताया गया है कि एक महान और पवित्र संत की आत्मा सिर से बाहर निकलती है, जिसकी वजह से ब्लीडिंग होती है. ये घटना रात 9 बजे हुई. डॉक्टर्स ने बताया इसका कारण एपोप्लेक्सी या अचानक सुनना बंद हो जाने से ऐसा हुआ था.

 

लेकिन दूसरे मोंक समझ गए थे कि स्वामीजी ने जान बूझकर समाधि ले ली है. उन्होंने उनके शरीर को ऑरेंज कपडा उढ़ा दिया और उनके चारों तरफ फूल बिछा दिए. उनका अंतिम संस्कार अगले दिन किया गया. सारे मोंक्स उनके शरीर को उस पेड़ के पास ले गए जहाँ स्वामीजी के कहा था. वो सब प्रे कर रहे थे और फिर उनकी चिता को आग दे दी गई. उन्हें स्वामीजी की कही हुई बात याद आ रही थी.

 

“एक समय आएगा जब मैं अपने शरीर को एक पहने हुए कपडे की तरह छोड़ दूंगा, मगर ये मुझे काम करने से रोक नहीं पाएगा. मैं हमेशा लोगों को इंस्पायर करता रहूँगा, तब तक जब तक वो समझ नहीं जाते कि वो उस भगवान् का ही एक पार्ट हैं.”

 

“हो सकता है मैं बार बार जन्म लूं, हो सकता है मैं पैदा होने के बाद बहुत सारे दुःख को झेलूं. इस तरह मैं उस भगवान् की हमेशा पूजा कर पाउँगा जिनपर मुझे सबसे ज्यादा विश्वास है, वो भगवान् एक ही है जिनमें हम सबकी आत्मा मिल जाती है.”

 

 

Conclusion

 

स्वामीजी हर इंसान में भगवान को देखते थे. वो समझ गए थे कि भगवान् को पाने और उनकी सेवा करने के लिए हमें गरीब और कमज़ोर लोगों की मदद और सेवा करनी चाहिए.

 

उन्होंने अपनी आवाज़ और अपनी सोच को गरीबों के लिए मदद माँगने में लगा दिया था. वो पूरी कंट्री में घूमे और हर जगह उन्हें यही गरीबी दिखाई दी. उन्होंने अपने स्पेशल गिफ्ट को लोगों की सेवा करने में लगा दिया. उनके इसी क्लियर गोल ने उन्हें इतना सक्सेसफुल बनाया. उनके इसी पक्के इरादे के कारण उन्हें यूरोप और अमेरिका में इतनी रिस्पेक्ट मिली.

 

आपने स्वामी विवेकानंद के बारे में जाना और सीखा. आपने उनकी सच्चाई, उनके विश्वास और वो कितने दयालु थे ये जाना. वो सच में एक महान इंसान थे जिनकी जीतनी भी तारीफ की जाए वो कम है. उन्होंने प्यार, शान्ति बना कर रखना और एक दूसरे को accept करने की बात पर हमेशा जोर दिया है. अब ये हमारी ड्यूटी है कि हम इसे हमेशा याद रखें और इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों को बताएं.

 

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आपका बहुमूल्य समय देने के लिए दिल से धन्यवाद,

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